गर्मी की ऋतु में
सूरज ढलते ही
आंगन बुहरता था,
पानी का छिड़काव होता था।
एक-एक कर बहुत-सी
खाटें बिछ जाती थीं।
उन पर घर में बनीं चटक रंगों की
दरियां बिछ जाती थीं।
अपनी खाट पर बैठ
मलकियत जमाई जाती थी।
बांस की बनी हो या लकड़ी की,
अकड़ी गई हो या सीधी-सी,
मूंज-बाण की बुनी हो या निवाड़ की,
ढीली हो या किसी हुई,
सब पर नींद बहुत मीठी आती थी।
संध्या होते ही खाटें बिछ जाती थीं।
सब आस-पास बैठते थे,
बतियाते, हंसते, हंसाते,
कभी उलाहनों से उलझते थे।
हुक्के की गुड़गुड़ में शामें
साथ-साथ बिताते थे।
रूठते, मनाते, दुख-सुख सुनते और सुनाते,
नोक-झोंक भी करते थे।
ग़लतफहमियां मिटा देते थे,
कुछ परेशानियां सुलझते थे।
फिर भी सब अपने होते थे,
सबमें अपने आप को देख पाते थे।
खाटें थीं तो बिछती थीं,
छत पर भी बिछ जाती थीं।
चांदनी, अंधेरी रातों में
आकाशगंगा निहारते थे।
टूटते तारों से डर जाते थे,
कभी धूमकेतु देख
अचरज में पड़ जाते थे।
भूत-प्रेतों की कहानियां
सुनते और सुनाते थे।
खाटें थीं तो बिछती थीं।
आज शयनकक्षों में दिखते
भारी-भारी डबल बेड,
जो न हिलते हैं, न हिलाए जाते हैं।
आंगन में वह कभी नहीं बिछ पाते हैं।
अब सबको चाहिए निजता,
औरों का कुछ नहीं पता।
ऐसे ही टूट गए परिवार,
अपनत्व-भाव भी बिसर गया,
जबसे खाट को भूला संसार।
खाट को खोकर हमने
पाया नहीं बराबर,
बहुत कुछ गंवा दिया।
बेला विरदी
