सामना संवाददाता / नासिक
सैय्यद पिंपरी स्थित केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नासिक परिसर तथा नासिक शिक्षण प्रसार मंडल, एच.पी.टी.महाविद्यालय और संस्कृत भारती नासिक के संयुक्त तत्वाधान में संस्कृत पक्ष समोरह का उदघाटन किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में गुरुजी रुग्णालय नासिक के पूर्व वैद्य डॉ विनायक गोविलकर ने कहा कि संस्कृत भाषा के विकास के लिए नासिक में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना की सोच एक प्रशंसनीय कदम है। जिसके लिए हार्दिक शुभकामना है।
डॉ गोविलकर ने कहा कि क्या भाषा संवाद का विषय है। एक दूसरे से बातचीत करने के लिए भाषा को समझना ज़रूरी है ना कि बोलना ज़रूरी है। संस्कृत भाषा का वर्तमान समय में ज्ञान जरुरी है। क्योंकि संस्कृत भाषा लेखन और आचरण में एक जैसी है जबकि अंग्रेजी भाषा लेखन और आचरण में एक जैसी नहीं है। तकनीकी दुनिया के संगणक विज्ञान में उपयोगिता की दृष्टि से संस्कृत सबसे उपयुक्त भाषा सिद्ध हुआ है। अंग्रेजों ने भ्रम फैलाया की भारत कोई देश नहीं था। जिसे अंग्रजी हुकूमत ने बनाया जबकि यह गलत प्रचार था और है। भारत की पहचान पहले से ही था, है और आगे भी रहेगा। इसमें संस्कृत भाषा का विशेष योगदान है क्योंकि संस्कृत ही एक ऐसी भाषा है जो कर्नाटक, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र , असम, तथा मेघालय की संस्कृति को जोड़ कर अखंड भारत के रूप में संजोए रखी, जो संस्कृत भाषा की ताकत है।
सूचना प्रौद्योगिकी क्रान्ति के क्षेत्र में संस्कृत भाषा चंचल मन को स्थित करने वाली भाषा साबित होगी। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में श्रीरामतीर्थ गोदावरी न्यास परिषद नासिक के मुकुंद खोचे ने कहा कि संस्कृत भाषा का ज्ञान तथा सीखने से ज्यादा ज़रूरी आचरण में लाना है। क्योंकि संस्कृत भाषा में पहले से ही दया, क्षमा, विनम्रता, अहिंसा, शांति तथा योग शास्त्र का ज्ञान का शास्त्रों में मंत्रों के द्वारा उल्लेख किया गया है। जिसका पालन करके हर भारतीय सामाजिक आर्थिक और धर्मिक विकास कर सकता है।
इस अवसर पर कार्यकर्म की अध्यक्षता करते हुए परिसर के निदेशक प्रो नीलाभ तिवारी ने कहा कि संस्कृत केवल ज्ञान विज्ञान शास्त्रों की संरक्षण करने वाली भाषा नही है, बल्कि भारत केंद्रित राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए भारतीय ज्ञान परंपरा तथा भविष्य निर्माण करने वाली भाषा है। इसका विकास करने के लिए नासिक परिसर में मल्टी डिसप्लिनरी स्टडी एवम रिसर्च सेंटर के लिए प्रारंभ किया गया है। जिसमे शोध करने के लिए के लिए नासिक में अपरंपार संभावनाएं है। नासिक परिसर विभिन्न कोर्स के अतिरिक्त डिप्लोमा कोर्स भी प्रारंभ किया गया है जिसका लाभ स्थानीय छात्र ज्यादा उठा सकते है।
संस्कृत भाषा का केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व स्तर पर प्रचार करने के लिए एक कारगर अभियान चलाना होगा तभी संस्कृत भाषा के महत्व की जानकारी होगी और वैश्विक स्तर पर स्थान प्राप्त कर सकेगी। परिसर के एक वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में एक परिसर के उतरोतर विकास तथा निरंतर प्रगति के लिए परिसर निदेशक प्रो नीलाभ तिवारी की अध्यक्षता में भगवान शिव का प्रातः काल में गणेश पूजन के साथ रुद्राभिषेक किया गया। पूजन परिसर के सहायक आचार्य डॉ रविकांत त्रिपाठी, सहायक आचार्य डॉ शिवार्चित मिश्र तथा डॉ शिवप्रसाद शुक्ल ने मंत्रोचार विधि से आराधना करते हुए किया।
इस अवसर पर ही परिसर के निदेशक प्रो नीलाभ तिवारी की अध्यक्षता में संस्कृत संभाषण वर्ग समापन समारोह का अयोजन भी किया गया। जिसके संयोजक साहित्य विभाग के डॉ संदीप जोशी तथा परिसर के पूर्व छात्र तथा के वी विद्यालय ओझर के शिक्षक केयूर कुलकर्णी ने दस दिवसीय प्रशिक्षण देकर छात्रों को संस्कृत भाषा में प्रशिक्षित करने का कार्य किया। परिसर के प्रशिक्षित प्राक शास्त्री, शास्त्री एवम शिक्षा शास्त्री के विद्यार्थियो ने संस्कृत सीखने का अपना अपना अनुभव संस्कृत भाषा में गीत, अभिनय तथा पद्य के माध्यम से श्रेया, देवश, तनमय, चारुहास, कृष्णा, दर्शन, आकाश, नंदलाल, पार्थ, वेनुन्नाद, यश शुक्ल, सौरभ, संविधा, हितांशु, हरिओम, रितिका, आर्या, मुग्धा, विवेक, कार्तिकी, ईश्वरी तथा सुधा माधुरी आदि ने ऊतम प्रस्तुति दी। इस अवसर पर स्वागत भाषण शिक्षा शास्त्र के विभागाअध्यक्ष तथा संस्कृत पक्ष के संयोजक डॉ कुमार ने, धन्यबाद, साहित्य विभाग की डॉ मंजू ठेमदेव चने ने जबकि मंच संचालन साहित्य विभाग के डॉ संदीप जोशी ने किया। समारोह अवसर पर सभी शिक्षक, कर्मचारी तथा छात्र उपस्थित थे।
