मुख्यपृष्ठनए समाचार‘हिंदुस्थान की अर्थव्यवस्था दौड़ रही है’, लेकिन आम आदमी का क्या?

‘हिंदुस्थान की अर्थव्यवस्था दौड़ रही है’, लेकिन आम आदमी का क्या?

 -७.८ प्रतिशत पर सरकार ने अपनीr पीठ थपथपाई; कांग्रेस का सवाल-नौकरियां, आमदनी और महंगाई पर कब मिलेगा जवाब?

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

देश की अर्थव्यवस्था ने चाल जरूर तेज की है, लेकिन इस विकास की रफ्तार आम आदमी की जिंदगी में कितनी दिखाई दे रही है? वित्त वर्ष २०२६-२७ की पहली तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि ७.८ प्रतिशत दर्ज की गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत बताते हुए बड़ी उपलब्धि करार दिया है, लेकिन दूसरी ओर विपक्ष ने जीडीपी के आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि अगर अर्थव्यवस्था इतनी तेज दौड़ रही है तो रोजगार, आमदनी और आम परिवार की क्रयशक्ति में इसका असर कहां है? कांग्रेस नेताओं ने सरकार से पूछा है कि ७.८ प्रतिशत की वृद्धि का फायदा किसानों, युवाओं, छोटे कारोबारियों और आम परिवारों तक कितना पहुंचा।
केंद्र सरकार जिस ७.८ प्रतिशत जीडीपी वृद्धि को भारतीय अर्थव्यवस्था की बड़ी उपलब्धि बता रही है, उसी आंकड़ों पर अर्थशास्त्रियों ने अब सवाल उठाए हैं। अर्थशास्त्री और कांग्रेस नेता सलमान अनीस सोज व अर्थशास्त्री प्रो. संतोष मेहरोत्रा ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। करीब ढाई दशक तक वर्ल्ड बैंक से विभिन्न भूमिकाओं में जुड़े रहे सोज का कहना है कि चमकदार जीडीपी आंकड़ा और आम आदमी की आर्थिक हकीकत दो अलग तस्वीरें पेश कर रही हैं। वहीं दूसरी ओर अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा ने विकास के दावे पर सवाल खड़े किए हैं। रोजगार, वास्तविक मजदूरी और आमदनी की चुनौतियों के बीच सवाल है, आंकड़े चमक रहे हैं या आम आदमी की आर्थिक हालत बिगड़ रही है?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष २०२६-२७ की अप्रैल-जून तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी ७.८ प्रतिशत बढ़ी है। एक साल पहले इसी तिमाही में वृद्धि ६.९ प्रतिशत थी। सरकार इसे वैश्विक संकटों के बीच अर्थव्यवस्था की मजबूती के रूप में पेश कर रही है। लेकिन सोज का सवाल है, `यदि अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ रही है तो यह तेजी लोगों की आय, रोजगार और जीवन स्तर में उसी अनुपात में क्यों दिखाई नहीं दे रही? सोज ने वास्तविक जीडीपी निकालने में इस्तेमाल महंगाई समायोजन यानी जीडीपी डिफ्लेटर पर सवाल उठाया है। उनका तर्क है कि जिस समय खुदरा और थोक महंगाई के दूसरे संकेतक अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं, उस समय कम डिफ्लेटर से वास्तविक वृद्धि का आंकड़ा ऊंचा दिखाई दे सकता है। सरकार के पक्ष में तथ्य यह है कि पहली तिमाही में घरेलू खपत, निवेश, निर्यात, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है। इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि को पूरी तरह खारिज करना भी तथ्यों के अनुरूप नहीं होगा। लेकिन दूसरी तरफ रोजगार, विनिर्माण की हिस्सेदारी, आय वितरण और घरेलू आर्थिक दबाव जैसे सवाल भी केवल एक अच्छे जीडीपी आंकड़े से खत्म नहीं होते। इसलिए असली बहस शायद यह नहीं है कि ७.८ प्रतिशत का आंकड़ा सही है या गलत। बड़ा सवाल यह है कि इस ७.८ प्रतिशत वृद्धि का कितना हिस्सा देश के सामान्य नागरिक की नौकरी, आमदनी और जेब तक पहुंच रहा है।
‘मेक इन इंडिया’ का लक्ष्य भी अधूरा
सोज ने विनिर्माण पर भी सरकार को घेरा। ‘मेक इन इंडिया’ के दौरान विनिर्माण की हिस्सेदारी को अर्थव्यवस्था में २५ प्रतिशत तक ले जाने की महत्वाकांक्षा जताई गई थी। लेकिन सरकार के अपने दस्तावेज विनिर्माण की हिस्सेदारी करीब १६-१७ प्रतिशत के आसपास बताते हैं।

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