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पॉलिटिका : मोदी के उत्तराधिकारी होंगे योगी?..संघ लिख रहा है योगी के उभार और मोदी-शाह के उतरते प्रभाव की पटकथा!

के.पी. मलिक

लंदन के एक प्रमुख ब्रिटिश दैनिक समाचार पत्र फाइनेंशियल टाइम्स (एफटी) की एक रिपोर्ट ने भारतीय राजनीति के उस सवाल को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है, जिसे सत्ता के गलियारों में शायद अभी खुलकर स्वीकार नहीं किया जा रहा कि नरेंद्र मोदी के बाद भारतीय जनता पार्टी का चेहरा कौन होगा? इस सवाल के साथ योगी आदित्यनाथ का नाम जिस गंभीरता से सामने आ रहा है, वह महज किसी अखबारी अटकल का विषय नहीं है। इसके पीछे बदलते राजनीतिक समीकरण, नेतृत्व की स्वीकार्यता, संगठन की भावी दिशा और संघ परिवार (संघ+भाजपा) की प्राथमिकताओं को पढ़ने की जरूरत है।
मोदी युग ने भाजपा को एक असाधारण चुनावी ऊंचाई तक पहुंचाया। लेकिन हर राजनीतिक युग की तरह मोदी युग के सामने भी सबसे बड़ी चुनौती अब यही है कि उसके बाद क्या? लंबे समय तक भाजपा की राजनीति का केंद्र नरेंद्र मोदी रहे और अमित शाह को उसका सबसे प्रभावशाली रणनीतिकार माना गया। चुनावी मशीनरी, संगठनात्मक विस्तार और सत्ता के केंद्रीकरण ने मोदी-शाह की जोड़ी को बेहद शक्तिशाली बनाया। लेकिन समय के साथ वही केंद्रीकरण अब एक असहज सवाल भी पैदा करता है कि क्या संघ परिवार ने अपने भविष्य का नेतृत्व तैयार किया है या पूरी राजनीति दो चेहरों के इर्द-गिर्द सिमट गई है? दरअसल, मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता रही है। लेकिन व्यक्तिगत लोकप्रियता को हमेशा राजनीतिक उत्तराधिकार में परिवर्तित नहीं किया जा सकता। जनता के बीच किसी नेता की चमक, सरकार के प्रति संतोष, पार्टी की संगठनात्मक स्वीकार्यता और अगली पीढ़ी के नेतृत्व की विश्वसनीयता, ये चार अलग-अलग कसौटियां हैं। यही वह जगह है जहां मोदी-शाह की राजनीति के सामने सवाल खड़े होते हैं।
अमित शाह की ताकत निर्विवाद रूप से उनकी संगठनात्मक समझ, चुनावी रणनीति और सत्ता-प्रबंधन में रही है। लेकिन प्रधानमंत्री पद के लिए सिर्फ सत्ता के सबसे मजबूत रणनीतिकार होना पर्याप्त नहीं होता। राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक जनस्वीकार्यता, वैचारिक प्रतीक बनने की क्षमता और अपने पीछे एक स्वतःस्फूर्त राजनीतिक आधार खड़ा करने की योग्यता भी जरूरी होती है। यही वह कसौटी है जिस पर शाह की संभावित दावेदारी को लेकर बहस स्वाभाविक रूप से कठिन हो जाती है। इसके उलट योगी आदित्यनाथ ने पिछले वर्षों में अपने लिए एक अलग राजनीतिक पहचान बनाई है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और राजनीतिक रूप से निर्णायक राज्य में लंबे समय तक सत्ता चलाना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। योगी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने खुद को केवल प्रशासनिक मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि एक स्पष्ट वैचारिक और राजनीतिक पहचान वाले नेता के रूप में स्थापित किया है।
उनकी भगवा पहचान, हिंदुत्व के प्रति खुली प्रतिबद्धता, कठोर कानून-व्यवस्था की छवि, अपराध के खिलाफ सख्त प्रशासन का दावा और अपने समर्थक वर्ग के बीच मजबूत लोकप्रियता उन्हें भाजपा के भीतर दूसरे नेताओं से अलग करती है। उनके समर्थकों के लिए योगी एक ऐसे नेता हैं, जो पार्टी की मूल वैचारिक राजनीति को बिना किसी संकोच के सामने रखते हैं। आलोचकों के लिए यही शैली चिंता का विषय भी है, क्योंकि उनके शासन और राजनीति को लेकर अल्पसंख्यक अधिकारों, बुलडोजर कार्रवाई, कानून-व्यवस्था और राज्य की शक्ति के इस्तेमाल पर गंभीर बहस होती रही है। यही योगी की राजनीति का विरोधाभास है उनकी ताकत और उनकी आलोचना, दोनों उनकी स्पष्ट वैचारिक राजनीति से निकलती हैं। योगी की दूसरी बड़ी ताकत उनका उत्तर प्रदेश का राजनीतिक अनुभव है। उत्तर प्रदेश सिर्फ देश का सबसे बड़ा राज्य नहीं, बल्कि लोकसभा की ८० सीटों के कारण राष्ट्रीय सत्ता की राजनीति का निर्णायक मैदान है। यहां मजबूत राजनीतिक आधार बनाने वाला नेता स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय राजनीति में वजन हासिल करता है। योगी ने इसी राजनीतिक भूगोल को अपनी राष्ट्रीय संभावनाओं का आधार बनाया है।
लेकिन योगी की संभावित प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को केवल हिंदुत्व या उत्तर प्रदेश की राजनीति के चश्मे से देखना भी भूल होगी। राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचने के लिए उन्हें यह साबित करना होगा कि उनकी स्वीकार्यता भाजपा के पारंपरिक वैचारिक समर्थकों से आगे कितनी है। क्या वे गठबंधन की राजनीति संभाल सकते हैं? क्या वे आर्थिक मोर्चे पर व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि प्रस्तुत कर सकते हैं? क्या वे दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत सहित उन राज्यों में राजनीतिक स्वीकार्यता बना सकते हैं, जहां भाजपा की राजनीति अलग सामाजिक समीकरणों से गुजरती है? यही उनकी अगली परीक्षा होगी। और यहीं संघ की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। भाजपा का नेतृत्व केवल चुनावी आंकड़ों से तय नहीं होता। पार्टी और संघ के रिश्तों का अपना इतिहास और राजनीतिक महत्व है। इसलिए मोदी के बाद नेतृत्व की किसी भी संभावित लड़ाई में यह देखना दिलचस्प होगा कि नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत पसंद, अमित शाह की संगठनात्मक शक्ति, योगी आदित्यनाथ की वैचारिक लोकप्रियता और संघ की संस्थागत प्राथमिकताएं किस बिंदु पर मिलती हैं और किस बिंदु पर टकराती हैं।
दरअसल, असली सवाल यह नहीं कि मोदी योगी को पसंद करते हैं या शाह को। असली सवाल यह है कि मोदी के बाद भाजपा किस तरह की राजनीति चाहती है? क्या वह एक ऐसे नेता की तलाश करेगी, जिसकी राजनीति मोदी की तरह व्यक्तिगत करिश्मे पर टिकी हो?
क्या वह शाह जैसे संगठनात्मक रणनीतिकार को आगे करेगी? या फिर ऐसा चेहरा चुना जाएगा जो संघ की वैचारिक राजनीति, हिंदुत्व की स्पष्ट पहचान और जनाधार इन तीनों को एक साथ जोड़ सके? यहीं योगी का नाम गंभीर हो जाता है। लेकिन यह भी याद रखना होगा कि उत्तराधिकारी की चर्चा और उत्तराधिकारी का तय होना दो अलग बातें हैं। आज योगी को संभावित दावेदार के रूप में देखना एक राजनीतिक विश्लेषण है, कोई अंतिम निर्णय नहीं। इसी तरह मोदी-शाह की राजनीतिक साख को ‘गिरती हुई’ घोषित करना भी एक सरलीकरण होगा। उनकी राष्ट्रीय राजनीतिक पकड़ अब भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। हां, यह जरूर है कि किसी भी लंबे राजनीतिक शासन के बाद सत्ता के सामने एंटी-इन्कम्बेंसी, नेतृत्व की थकान, सामाजिक अपेक्षाओं और नई पीढ़ी की आकांक्षाओं जैसी चुनौतियां खड़ी होती हैं।
बहरहाल, आने वाले वर्षों की सबसे दिलचस्प कहानी शायद मोदी बनाम योगी या शाह बनाम योगी नहीं होगी, बल्कि असली कहानी होगी कि भाजपा अपने भविष्य का चेहरा किस राजनीतिक दर्शन में तलाशती है। मोदी ने भाजपा को अपने व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द एक विशाल चुनावी ब्रांड में बदल दिया। शाह ने उस ब्रांड को संगठन और चुनावी रणनीति की मशीनरी से ताकत दी। योगी ने उसी राजनीतिक परिवार के भीतर अपने लिए एक ऐसा वैचारिक और जनाधारित मॉडल तैयार किया है, जो अब राष्ट्रीय चर्चा के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। मोदी युग का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि योगी आएंगे या शाह। सवाल यह है कि मोदी के बाद भाजपा को अपनी राजनीति बचानी है, उसका विस्तार करना है या उसका नया संस्करण बनाना है और अगर कभी उस निर्णायक मोड़ पर संघ को सचमुच अपनी पसंद और प्रभाव का इस्तेमाल करना पड़ा, तो संभव है कि पैâसला सिर्फ यह देखकर न हो कि कौन सबसे बड़ा नेता है बल्कि यह देखकर हो कि कौन संगठन, विचारधारा और जनाधार के बीच सबसे टिकाऊ पुल बना सकता है। यही वह मोड़ होगा, जहां से भारतीय राजनीति का अगला अध्याय शुरू होगा।
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)

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