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गजबे है : आइला, ऐसा, कैसा विकास?.. ‘सब पढ़ें, सब बढ़ें’, मगर पहले २० फीट चढ़ें!

उमा सिंह

आइला, क्या यही वह ‘विकास’ है, जिसकी बातें २०१४ में हर मंच और हर भाषण में सुनाई देती थीं? अच्छे दिन, महंगाई पर लगाम, काला धन वापस लाने जैसे तमाम बड़े-बड़े दावों के बीच आज विकास की जमीनी तस्वीर कुछ ऐसी है कि छत्तीसगढ़ के गरियाबंद में बच्चों को स्कूल पहुंचने के लिए २० फीट ऊंचे पिलर पर चढ़ना पड़ रहा है।
भाजपा राज में विकास के दावे भले ही आसमान छू रहे हों, लेकिन मैनपुर में नौनिहालों की मजबूरी सचमुच आसमान तक पहुंच गई है। पैरी नदी पर पांच-छह साल से अधूरा पड़ा पुल सरकारी विकास मॉडल का ऐसा ‘नायाब नमूना’ बन गया है, जिसे देखकर ‘सब पढ़ें, सब बढ़ें’ जैसे नारों की जमीन भी हिलती नजर आती है। देहारगुड़ा और खामभाठा के बीच अधूरे पुल को पार करने के लिए बच्चे लोहे की संकरी सीढ़ी के सहारे २० फीट ऊंचे पिलर पर चढ़ते-उतरते हैं। पीठ पर स्कूल बैग, नीचे नदी और बीच में जिंदगी का जोखिम। बारिश में फिसलन बढ़े तो यह स्कूल सफर पढ़ाई से ज्यादा हिम्मत की परीक्षा बन जाता है। जरा-सी चूक और किताबों के साथ बच्चा भी नदी की चपेट में आ सकता है। हैरानी यह कि पुल पांच-छह साल से बन रहा है। एक साल पहले निरीक्षण हुआ, फटकार लगी और छह महीने में काम पूरा करने का भरोसा भी मिला। मगर छह महीने बीते, साल बीता और पुल वहीं का वहीं! ग्रामीणों की शिकायतें भी जारी हैं और पुल पर निकली नुकीली सरिया भी खतरा बनी हुई है। लेकिन ये इंडिया है बॉस, यहां विकास कई बार जमीन पर नहीं, फाइलों पर दौड़ता है।

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