राजन पारकर
सूत्रों के अनुसार, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं का आंदोलन स्थल पर जाना केवल संवेदना व्यक्त करना नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संदेश की तैयारी माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि विपक्ष छात्र आंदोलन को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। दूसरी ओर सत्ता इसे विपक्ष द्वारा प्रायोजित आंदोलन बताने में लगी है। चर्चा यह भी है कि अगर यह आंदोलन लंबा चला तो संसद से लेकर राज्यों तक इसका असर दिखाई देगा। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि युवाओं की नाराजगी किसी भी चुनावी गणित को बदलने की क्षमता रखती है। दिल्ली की सत्ता में बैठे रणनीतिकार अब केवल एक मंत्री का बचाव नहीं कर रहे, बल्कि सरकार की साख बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। सवाल यह है कि क्या संवाद का रास्ता खुलेगा या टकराव ही आगे बढ़ेगा? जब राजसत्ता छात्रों से डरने लगे, तब समझ लीजिए कि सत्ता के महलों की नींव में कंपन शुरू हो चुका है। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, आने वाले दिनों में केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के भीतर भी कई चेहरे असहज दिखाई दे सकते हैं। चर्चा है कि कुछ नेताओं की जिम्मेदारियों पर सवाल उठ सकते हैं और कुछ अफसरों की कुर्सियां भी हिल सकती हैं।
छात्रों का गुस्सा और सत्ता का अहंकार!
दिल्ली में छात्रों का आंदोलन अब केवल परीक्षा या एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं रहा है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि यह आंदोलन सरकार की कार्यशैली, जवाबदेही और युवाओं के भविष्य को लेकर बढ़ते असंतोष का प्रतीक बनता जा रहा है। सत्ता इसे कानून-व्यवस्था का विषय बताने में जुटी है, जबकि विपक्ष इसे लोकतंत्र और युवाओं के अधिकारों की लड़ाई बताकर राजनीतिक धार देने में लगा है। सूत्रों के अनुसार, आने वाले दिनों में यह आंदोलन संसद से लेकर राज्यों की राजनीति तक असर डाल सकता है।
…तो लोकतंत्र किसके भरोसे चलेगा?
राजनीति में शब्द कभी-कभी गोलियों से भी ज्यादा घातक साबित होते हैं। चर्चा है कि छात्रों को आतंकवादी कहने वाले बयान ने सत्ता समर्थक खेमे को भी असहज कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि यह बयान जितना छात्रों पर हमला था, उससे कहीं ज्यादा लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रश्नचिह्न था। जब सत्ता के पास तर्क खत्म हो जाते हैं, तब वह विरोध करने वालों को देशद्रोही, गुंडा या अराजक घोषित करने लगती है। आज वही दृश्य दिखाई देता है। सवाल पूछने वाला छात्र अगर आतंकवादी कहलाने लगे, तो फिर विश्वविद्यालयों में किताबों की जगह हथकड़ियां ही बांट दीजिए। सूत्रों के अनुसार, सत्ता के भीतर भी कुछ लोग मानते हैं कि ऐसे बयान चुनावी दृष्टि से नुकसानदायक हो सकते हैं। युवाओं के आक्रोश को अपमान में बदलना किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं माना जाता। चर्चा यह भी है कि आने वाले दिनों में इस बयान से दूरी बनाने की कोशिशें शुरू हो सकती हैं। क्योंकि वोट की राजनीति में युवा सबसे बड़ा निर्णायक वर्ग है और अपमानित युवा चुप नहीं बैठता।
लाठी से आंदोलन नहीं रुकते, इतिहास बनते हैं!
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि दिल्ली में छात्रों पर हुई कार्रवाई ने सरकार की छवि पर ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब केवल प्रेस कॉन्प्रâेंस से नहीं मिलेगा। सूत्रों के अनुसार, आंदोलनकारियों पर बल प्रयोग की तस्वीरें देशभर में तेजी से फैल रही हैं। सत्ता यह संदेश देना चाहती है कि कानून सर्वोपरि है, लेकिन विपक्ष इसे लोकतंत्र पर हमला बताकर जनमत तैयार करने में जुट गया है। इतिहास गवाह है कि लाठी से आंदोलन खत्म नहीं होते। वे और व्यापक हो जाते हैं। जयप्रकाश आंदोलन से लेकर अनेक छात्र आंदोलनों तक सत्ता ने यही भूल बार-बार दोहराई है। चर्चा है कि प्रधानमंत्री के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि नाराज युवा हैं। अगर संवाद की जगह केवल शक्ति प्रदर्शन होगा, तो यह असंतोष आने वाले चुनावों में भी दिखाई दे सकता है।
