मुख्यपृष्ठग्लैमरलगा जैसे जिंदगी का एक चक्र पूरा हुआ

लगा जैसे जिंदगी का एक चक्र पूरा हुआ

-प्रीति जिंटा ने २००० के दशक में अपनी खूबसूरत मुस्कान और डिंपल्स से दर्शकों के दिलों पर राज किया। ‘दिल से’, ‘कोई मिल गया’, ‘कल हो ना हो’ और ‘वीर जारा’ जैसी फिल्मों से अपनी अलग पहचान बनाने वाली प्रीति ने शादी और परिवार के बाद फिल्मों से दूरी बना ली थी। इस दौरान उन्होंने क्रिकेट और बिजनेस की दुनिया में भी अपनी पहचान बनाई। अब करीब ८ साल बाद फिल्म ‘भैयाजी सुपरहिट’ के बाद वह ‘बटवारा १९४७’ से बड़े पर्दे पर लौट आई हैं। फिल्म की रिलीज के साथ प्रीति ने कहा कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है, जैसे उनकी जिंदगी का एक चक्र पूरा हो गया हो। पेश हैं, प्रीति जिंटा से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश।

-प्रीति जिंटा

फिल्म का ऑफर मिलने पर हैरानी हुई? इतने साल बाद हां कहने की वजह क्या थी?
मुझे आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि मुझे फिल्मों के ऑफर मिल रहे थे। लेकिन मैं काम नहीं करना चाहती थी, क्योंकि मैं अपने परिवार और खासकर अपने चार साल के जुड़वां बच्चों के साथ रहना चाहती थी। मैं मातृत्व का आनंद ले रही थी। जब मुझे पता चला कि ‘बटवारा १९४७’ एक ऐतिहासिक फिल्म है, तो मैं उत्साहित हो गई।
प्रीति, इतने सालों बाद फिल्मों में लौटने की वजह क्या रही?
ऐसा नहीं है कि मुझे फिल्मों की कमी महसूस हो रही थी। मैं अपने परिवार और बच्चों के साथ समय बिता रही थी और अपनी निजी जिंदगी में व्यस्त थी। मैंने कई फिल्में की हैं और मेरा करियर भी शानदार रहा है, लेकिन मेरे लिए परिवार के साथ समय बिताना सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैं अपनी पिछली फिल्मों से संतुष्ट हूं और शायद इसी वजह से इस फिल्म के किरदार से खुद को जोड़ पाई।
तो, क्या इतने समय बाद कैमरे के सामने आना साइकिल चलाने जितना आसान था?
मेरे लिए सनी किसी वरदान से कम नहीं थे। राजकुमार संतोषी के साथ मैंने पहली बार काम किया और पहले ही दिन उन्होंने मुझे सबसे मुश्किल सीन दे दिए। मैं घबरा गई थी और सोच रही थी कि ये सब कैसे करूंगी। ऐसे वक्त में सनी ने मेरा हौसला बढ़ाया और बार-बार कहा, ‘चिंता मत करो, हम संभाल लेंगे।’ उनके लिए मेरे मन में बहुत सम्मान है।
क्या आपने इस उद्योग में कोई बदलाव देखा है?
मेरे वहां रहने के दौरान बहुत ज्यादा बदलाव नहीं हुए, लेकिन लोगों के कंटेंट देखने का नजरिया जरूर बदला है। सोशल मीडिया के आने से काफी फर्क पड़ा है। आज भारत और भारतीय होने पर गर्व का एहसास बढ़ा है। पहले एनआरआई को लेकर कहानियां अलग थीं, लेकिन अब वे ज्यादा वास्तविक हैं।
आप सनी से पहली बार कब मिली थी?
पहली फिल्म के दौरान मैं सनी से बहुत डरती थी। बॉबी मेरे करीबी दोस्त थे और एक दिन दोस्तों के कहने पर मैंने उन्हें फोन किया। लेकिन फोन सनी ने उठाया और गुस्से में बोले, ‘क्या ये फोन करने का समय है?’ मैं बहुत घबरा गई थी। बाद में धीरे-धीरे मेरा डर खत्म हुआ और मुझे सनी से बहुत कुछ सीखने को मिला। ‘हीरोज’ ने भी मुझे अपनी पहचान बनाने में मदद की। मजेदार बात यह है कि १९९९ में मैं सनी को बॉबी समझकर ही फोन कर बैठी थी।

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