मुख्यपृष्ठधर्म विशेषजिह्वाग्रे वसते नित्यं ब्रह्मरूपा सरस्वती

जिह्वाग्रे वसते नित्यं ब्रह्मरूपा सरस्वती

शीतल अवस्थी

बसंत पचंमी के दिन किसी भी समय सरस्वती पूजा की जा सकती है, परंतु पूर्वाह्न का समय पूजा के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। सभी विद्यालयों और शिक्षा केंद्रों में पूर्वाह्न के समय ही सरस्वती पूजा कर माता सरस्वती का आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है। अगर आप भी घर-परिवार, नौकरी, धन या जीवन से जुड़ा कोई भी शुभ काम बनाना चाहते हैं या बड़े दिनों से नहीं बन पा रहे हैं तो बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती के १२ नाम मंत्रों का स्मरण कर हर काम सिद्ध कर सकते हैं। ये १२ नाम ‘सरस्वती द्वादश नामावली’ के नाम से भी प्रसिद्ध है-
प्रथमं भारती नाम द्वितीयं च सरस्वती।
तृतीयं शारदा देवी चतुर्थ हंस वाहिनी।।
पञ्चम जगतीख्याता षष्ठं वागीश्वरी तथा।
सप्तमं कुमुदी प्रोक्ता अष्टमें ब्रह्मचारिणी।।
नवमं बुद्धिदात्री च दशमं वरदायिनी।
एकादशं चंद्रकान्ति द्वादशं भुवनेश्वरी।।
द्वादशैतानि नामानी त्रिसंध्यं य: पठेन्नर:।
जिह्वाग्रे वसते नित्यं ब्रह्मरूपा सरस्वती।।
सनातन धर्म की कण-कण में बसे भगवान की भावना उजागर करती है कि मां सरस्वती ही बुद्धि व विवेक शक्ति हैं। महासरस्वती की महाकाली व महालक्ष्मी के साथ पूजा के पीछे भी यही सूत्र है कि ताकत व धन की सार्थकता बुद्धि व विवेक के साथ ही है। व्यावहारिक नजरिए से जीवन के हर निर्णय में सही और गलत की समझ अहम होती है। पंचमी के दिन को माता सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। एक किंवदंती के अनुसार, इस दिन ब्रह्माजी ने सृ्ष्टि की रचना की थी। ज्ञान की देवी सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए अनेक मंत्र, स्तुति आदि की रचना की गई है। उन्हीं में से एक हैं मां सरस्वती की द्वादश नामावली स्तुति। यह स्तुति सुविख्यात है। दिन की तीन संध्याओं में इनका पाठ करने से भगवती सरस्वती अति प्रसन्न होती है। ज्योतिष विद्या में पारंगत व्यक्तियों के अनुसार बसंत पचंमी का दिन सभी शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है। इसी कारण से वसंत पंचमी का दिन अबूझ मुहूर्त के नाम से प्रसिद्ध है और नवीन कार्यों की शुरुआत के लिए उत्तम माना जाता है।
सरस्वती या कुन्देन्दु देवी सरस्वती को समर्पित बहुत प्रसिद्ध स्तुति है, जो सरस्वती स्तोत्रम का एक अंश है। इस सरस्वती स्तुति का पाठ वसंत पंचमी के पावन दिन पर सरस्वती पूजा के दौरान किया जाता है।
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा।
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्।।

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