मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गांव : गांव में गजहर और बच्चे

काहें बिसरा गांव : गांव में गजहर और बच्चे

पंकज तिवारी

खेती-किसानी में कोई भी काम मुश्किल नहीं होता। खेतों में बाढ़, बारिश, सूखा, पाला कुछ भी पड़े, वैâसी भी परिस्थिति हो किसान हर परिस्थितियों में ढाल बनकर खड़ा हो जाता है। सभी कामों को अपने अनुरूप ढाल ही लेता है। यहां भी सब कुछ अनुकूल ही तो था। अब तक आस-पास के खेतों से भी लोग अपने-अपने घरों को जाने लगे थे पर ददा थे कि उनकी बातें ही नहीं ओरा रही थीं।
कुछ लोग ददा और कका की बातों में रुचि भी लेना चाहे, रुके भी हाल-चाल भी हुआ पर अचानक से अगले पहर की सुधि हो आई कि अभी तो धान काटने फिर से आना है, सोचकर लोग आगे बढ़ गए थे।
अब पूरे सेवार भर में बस तीन ही लोग नजर आ रहे थे। वहीं पास में ही एक तालाब था जहां हमेशा लोगों की भीड़ रहा करती थी, पर अभी ठंड के प्रकोप ने ऐसा कहर ढाया था कि मजाल कोई एक भी इंसान तालाब पर दिख जाए। बस भैंस चराने वाले लोग ही कहीं-कहीं धूप का सहारा लिए बैठे थे, जबकि गोरू चरने में मगन थे। घर के काम और वापस आने के भान से काकी अब खड़ी हो गई थीं, कका की निगाह काकी पर पड़ गई बेचारे समझ गए कि अब देर करना मतलब मुश्किल में पड़ना है। सुबह का काकी वाला गुस्सा भी याद हो आया कका को, काकी से विद्रोह की बात अब वो सपनों में भी नहीं सोच सकते थे। बेचारे झट से खड़े हो गए। बिना देर किए बोल पड़े, ‘अच्छऽ त ददा अब चलथई, बहुत देर होइ गइ, अबइ फेरि आवइ के बाऽ, अबइ दुइयइ पहंटा त काटि पाए रहे…पालागी।’
‘हां-हां ठीक बाऽ, जा…जा बेटवा… जा’ कहते हुए ददा फिर से धान काटने लगे थे, जबकि कका और काकी वापस घर की तरफ चल दिए थे। रास्ते में जितने भी घर थे सबके दुआरे धान का बोझा गंजा हुआ था। पूरे गांव में सभी के यहां धान की खूब खेती होती थी। कुछ के यहां अभी भी बोझा ढोकर आ ही रहा था तो कुछ के दुआरे खटिया पर पल्ला बांधकर धान की पिटाई भी हो रही थी। खटिया के नीचे धान भरा हुआ देखकर घरवालों का मन गदगद हो उठता था। पूरे साल भर का भरोसा यही तो था। पुअरा का लेहना बनाकर बगल में ही रखा जा रहा था तो घर के बूढ़-पुरनिया आराम से मचिया पर बैठकर एक पैर पैâलाकर पुअरा की बोझिया बनाने में लगे हुए थे। छोटे-छोटे बच्चे मिल-मिलाकर दौड़-धूप कर बोझिया दुआरे के उस छोर पर एकदम किनारे रख आ रहे थे जहां अभी कुछ देर बाद गजहर बनेगा और जिस पर उछल-कूद कर बच्चे लहालोट होंगे। बच्चों का एक नया घर हो जाता है गजहर। गजहर जहां दिन-दिन भर बच्चे झूमते और इतराते रहते हैं, जिस पर उछल-कूद करते रहते हैं, जिसे बनाने में भी बड़ा मजा आता है। गोलाई में सरियाते ही चले जाना होता है, गजहर अपने आप बनती चली जाती है। बच्चे जवान से बूढ़े हो जाते हैं पर गजहर से उनकी कोई न कोई याद जरूर जुड़ी हुई होती है। एक बार तो गजब ही हो गया था‌। शेरू, मुन्ना, रमई, बिहारी सब साथ में ही लुका-छिपी खेल रहे थे, शाम हो गई थी। बिहारी चोर बना हुआ था, बाकी सभी छुपे हुए लोगों को ढूंढ रहा था और सब मिल भी गए थे। कोई उसके सिर में टीप भी नहीं मार पाया था, पर रमई को पता नहीं क्या सूझ गया था कि बिना किसी को दिखाए जाके गजहर में छिप गया ऊपर से पुअरा की कई बोझिया रखकर खुद को और ढंक लिया था‌। अब तो सभी मिलकर उसे ढूंढने लगे थे, आवाज भी दिए थे पर रमई सभी को छकाने की सोचकर नहीं बोला। जानते तो हैं कि बच्चे, बच्चे ही होते हैं। कुछ देर और ढूंढने पर भी जब रमई नहीं मिला तो सभी प्लान करके अपने-अपने घर चले गए।
क्रमश:
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

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