राजन पारकर
देश बड़ा विचित्र है। यहां चुनाव के पहले जनता ‘लाडली’ होती है, चुनाव के बाद ‘ई-केवाईसी’ हो जाती है। यहां शादी के समय प्रेम अमर होता है और तलाक के समय ‘परिपक्व निर्णय’ बन जाता है। और यहां बड़े-बड़े घोटालों की फाइलें संभालने वाले अफसर अचानक ऐसी रिटायरमेंट लेते हैं कि सवालों की पूरी फौज नौकरी पर लग जाती है।
पहले आधार से रिश्ता साबित करो
सरकार ने कभी बहनों को १,५०० रुपए देकर इतना दुलारा कि मानो हर घर में लक्ष्मी उतर आई हो। लेकिन अब पता चला कि लक्ष्मीजी को भी ई-केवाईसी करवाना पड़ता है। ८० लाख महिलाओं को बताया जा रहा है कि यदि समय पर ई-केवाईसी नहीं हुई तो योजना का लाभ बंद। अर्थात पहले वोट की पर्ची काफी थी, अब ओटीपी भी चाहिए। गरीब महिला पूछ रही है ‘साहब, मैं तो वही हूं, जो पिछले महीने थी। मेरा नाम भी वही है, घर भी वही है, गरीबी भी वही है, फिर अचानक मैं अपात्र वैâसे हो गई?’ जवाब आया ‘बहन, तुम अपात्र नहीं हुई हो, तुम्हारा मोबाइल नंबर पात्र नहीं रहा!’ सरकारी योजनाओं में जनता की पात्रता अब भूख, गरीबी और जरूरत से नहीं, बल्कि नेटवर्क और सर्वर से तय होने लगी है।
पूजा भट्ट का सच: रिश्ते दिखावे से नहीं चलते
बॉलीवुड में अक्सर रिश्तों का मेकअप इतना गाढ़ा होता है कि दरारें भी रेड कार्पेट जैसी दिखाई देती हैं। लेकिन पूजा भट्ट ने कम से कम इतना साहस दिखाया कि टूटे हुए रिश्ते को ‘परफेक्ट परिवार’ का फोटो प्रâेम बनाकर दीवार पर नहीं टांगा। हमारे समाज में कई लोग विवाह को ऐसा सरकारी विभाग समझते हैं, जहां काम बंद हो जाए, संवाद खत्म हो जाए, प्रेम गायब हो जाए, लेकिन बोर्ड बाहर लगा रहना चाहिए, सब कुछ सामान्य है। पूजा भट्ट ने एक कड़वी सच्चाई कही कि दिखावे के लिए साथ रहने से बेहतर है सच्चाई स्वीकार करना। आज समाज का सबसे बड़ा संकट यही है कि लोग रिश्ते निभाने से ज्यादा रिश्तों का विज्ञापन करने लगे हैं।
ईडी अधिकारी की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति
नीरव मोदी, मेहुल चोकसी, नवाब मलिक, अनिल देशमुख, संजय राऊत जैसे चर्चित मामलों से जुड़ा अधिकारी अचानक ११ साल पहले स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ले, तो देश का आम आदमी स्वाभाविक रूप से चौंकता है। भारत में दो चीजें अचानक होती हैं, एक मानसून और दूसरी बड़े अधिकारियों की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति। जनता पूछती है, इतनी जल्दी क्या थी? सिस्टम जवाब देता है, यह उनका व्यक्तिगत निर्णय है। जनता फिर पूछती है, लेकिन कारण क्या है? सिस्टम मुस्कुराता है, यह भी व्यक्तिगत है। फिर वही पुराना भारतीय लोकतांत्रिक खेल शुरू हो जाता है – सवाल सार्वजनिक, जवाब निजी। एक तरफ बहनों से कहा जा रहा है, पहले अपनी पहचान साबित करो; दूसरी तरफ रिश्ते कह रहे हैं- पहचान बची ही नहीं; और तीसरी तरफ सिस्टम कह रहा है- कारण मत पूछो, पैâसला हो चुका है! देश में आजकल हर चीज का सत्यापन हो रहा है। बहनों को ई-केवाईसी करानी पड़ रही है, पति-पत्नी को अपने रिश्ते की केवाईसी करनी पड़ रही है, और जनता को सरकारी पैâसलों की केवाईसी कभी मिलती ही नहीं। इस देश में आदमी का दुख कम नहीं हुआ है, बस उसके प्रमाणपत्र बढ़ गए हैं। अब आंसू बहाने से पहले भी शायद किसी दिन ओटीपी डालना पड़े!
