मुख्यपृष्ठस्तंभसिर्फ वोट बैंक बन कर रह गया महाराष्ट्र का उत्तर भारतीय समाज

सिर्फ वोट बैंक बन कर रह गया महाराष्ट्र का उत्तर भारतीय समाज

-2027 के यूपी चुनाव में भाजपा को सबक सिखाने की तैयारी

डॉ. मंगलेश्वर त्रिपाठी

महाराष्ट्र में करीब एक करोड़ उत्तर भारतीय रहते हैं। नागपुर, पुणे, ठाणे, नासिक, नई मुंबई से लेकर मुंबई तक इनकी बड़ी आबादी है। फिर भी 43 सदस्यीय महाराष्ट्र कैबिनेट में एक भी उत्तर भारतीय मंत्री नहीं हैं। यह आंकड़ा उत्तर भारतीय समाज की राजनीतिक उपेक्षा की कहानी खुद कह देती है।
वोट चाहिए, हिस्सेदारी नहीं
मुंबई की 36 में से 18 विधानसभा सीटों पर उत्तर भारतीय मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। ठाणे, कल्याण, भिवंडी में भी यही स्थिति है। हर चुनाव में भाजपा ‘मोदी-योगी’ के नाम पर वोट मांगती है। यूपी-बिहार के प्रवासी मजदूरों से लेकर व्यापारी तक भाजपा के लिए बूथ संभालते हैं, पर सरकार बनते ही कैबिनेट उत्तर भारतीय विहीन हो जाती है। सत्ता में भागीदारी मांगो तो जवाब मिलता है, “आपका प्रतिनिधित्व मोर्चा कर रहा है।”
संगठन में भी सिर्फ खानापूर्ति
मुंबई भाजपा की कोर कमेटी और जिलाध्यक्षों की सूची देख लीजिए। उत्तर भारतीय नाम गिनती के मिलेंगे। उत्तर भारतीय मोर्चा सिर्फ कागज पर जिंदा है। पदाधिकारी रैली में भीड़ जुटाने के लिए याद किए जाते हैं, पर रणनीति की बैठक से बाहर रखे जाते हैं। नीति बनाने में हिस्सेदारी शून्य है।
दल-बदल कर आए नेता भी ठगे गए
पहले की पार्टी छोड़कर भाजपा में आए उत्तर भारतीय नेताओं को मंत्री पद का भरोसा दिया गया था, मिला सिर्फ स्वागत का फोटो। टिकट बंटवारे में भी मुंबई की 2-3 सबसे कमजोर सीटें पकड़ा दी जाती हैं। शिवसेना ने भी संजय निरुपम और प्रियंका चतुर्वेदी को राज्यसभा, घनश्याम दुबे को विधान परिषद भेजकर सम्मान दिया। कांग्रेस और एनसीपी के दौर में उत्तर भारतीयों को सत्ता में सम्मानजनक पद मिलते थे।
2027 यूपी चुनाव में दिखेगा असर
महाराष्ट्र की इस उपेक्षा की गूंज 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में सुनाई देगी। मुंबई से गांव लौटने वाले लाखों उत्तर भारतीय अब पूछ रहे हैं, “जब यहां इज्जत नहीं तो यूपी में वोट क्यों?” समाज अब साफ कह रहा है कि उसे वोट बैंक नहीं, हिस्सेदार बनना है। कैबिनेट में मंत्री, संगठन में पद और टिकट में सम्मानजनक हिस्सेदारी चाहिए।
अगर उपेक्षा जारी रही तो 2024 में 400 पार का नारा लगाने वाला यही समाज 2027 में हिसाब चुकता करेगा, क्योंकि अब सिर्फ भीड़ नहीं, भागीदारी चाहिए।

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