अनिल तिवारी, मुंबई
पूर्वार्ध
मुंबई की ट्रैफिक समस्या का समाधान केवल चालान, सिग्नल और पुलिस तैनाती से नहीं होगा। यह समस्या इतनी गहरी हो चुकी है कि इसके लिए अल्पकालीन उपायों के साथ-साथ दीर्घकालीन सड़क-नीति की भी आवश्यकता है। आज मुंबई महानगरीय क्षेत्र में जाम का बड़ा कारण सड़क पर चलने वाले वाहनों की संख्या ही नहीं, बल्कि वाहनों का मिश्रित और अनियंत्रित स्वरूप भी है। एक ही सड़क पर कार, बस, ऑटो, बाइक, टेंपो, डंपर, साइकिल, हाथगाड़ी, फेरीवाले, पैदल यात्री, अवैध पार्किंग और सड़क मरम्मत सब एक साथ मौजूद रहते हैं। परिणामस्वरूप सड़क की वास्तविक क्षमता आधी रह जाती है और जाम कई गुना बढ़ जाता है।
अनियंत्रित मिश्रित ट्रैफिक
मुंबई को अब रोड डेडिकेशन और लेन डेडिकेशन की दिशा में गंभीरता से सोचना होगा। इसका अर्थ है कि कुछ सड़कों को निश्चित प्रकार के वाहनों के लिए प्राथमिकता दी जाए और चौड़ी सड़कों पर अलग-अलग वाहन वर्गों के लिए अलग लेन निर्धारित की जाए। जिस तरह मेट्रो के लिए अलग कॉरिडोर बनाया जाता है, उसी तरह प्रमुख महामार्गों और मुख्य शहरी मार्गों पर कार, बस, दोपहिया, आपातकालीन वाहन और मालवाहक वाहनों के लिए वैज्ञानिक ढंग से अलग-अलग प्रवाह तय करना होगा। मुंबई में कई चौड़ी सड़कें होने के बावजूद उनका उपयोग अव्यवस्थित है। तीन लेन वाली सड़क पर कभी चार तरह के वाहन समानांतर चलते हैं, तो कभी दो लेन अवैध पार्किंग और बसों के ठहराव में चली जाती हैं। ऐसे में सड़क चौड़ी होने का लाभ नहीं मिलता। यदि चौड़ी सड़कों पर स्पष्ट लेन डेडिकेशन हो, जैसे बार्इं लेन धीमी गति और सार्वजनिक परिवहन के लिए, मध्य लेन सामान्य वाहनों के लिए, दार्इं लेन तेज गति और ओवरटेकिंग के लिए तो ट्रैफिक की गति स्वाभाविक रूप से सुधर सकती है। परंतु यह व्यवस्था केवल पेंट की गई सफेद लाइनों से नहीं चलेगी; इसे वैâमरा, सेंसर, चालान, सड़क-चिह्न, डिजिटल बोर्ड और सतत निगरानी से लागू करना होगा। मुंबई के सभी प्रमुख महामार्गों पर भविष्य में डेडिकेटेड कार कॉरिडोर या नियंत्रित निजी वाहन कॉरिडोर की भी कल्पना की जा सकती है। जैसे मेट्रो कॉरिडोर में ट्रेन निर्धारित मार्ग पर बिना बाधा चलती है, उसी तरह कुछ उच्च घनत्व मार्गों पर नियंत्रित गति, सीमित प्रवेश-निकास और स्पष्ट लेन अनुशासन वाला कार कॉरिडोर बनाया जा सकता है। इसका उद्देश्य निजी वाहनों को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि अनियंत्रित मिश्रित ट्रैफिक को व्यवस्थित करना होना चाहिए। इसके साथ बस और सार्वजनिक परिवहन को भी समानांतर प्राथमिकता देनी होगी, ताकि सड़कें केवल कारों की न बन जाएं।
ऑटोरिक्शा मुंबई उपनगरों की एक बड़ी परिवहन जरूरत रहे हैं, लेकिन वे ट्रैफिक की रफ्तार को असंगठित रूप से प्रभावित भी करते हैं। दक्षिण मुंबई में ऑटोरिक्शा पर ऐतिहासिक रूप से प्रतिबंध है। इसी मॉडल को चरणबद्ध और विवेकपूर्ण तरीके से आगे बढ़ाने पर विचार हो सकता है। पहले बांद्रा से आगे कुछ अत्यधिक भीड़भाड़ वाले कॉरिडोरों में ऑटो प्रवेश सीमित किया जाए फिर अंधेरी, बोरीवली और दहिसर तक जोन आधारित नियंत्रण लागू किया जा सकता है। इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि आम नागरिक की सुविधा खत्म हो। इसके लिए पहले ई-शटल, मिनी बस, मेट्रो फीडर, ई-टैक्सी और साझा सार्वजनिक परिवहन का विकल्प देना होगा। विकल्प दिए बिना प्रतिबंध जनता के लिए कठिनाई बनेगा, लेकिन विकल्प देकर लागू किया गया नियंत्रण ट्रैफिक सुधार का बड़ा साधन बन सकता है।
मुंबई की सर्विस रोड्स की दुर्दशा भी ट्रैफिक जाम का बड़ा कारण है। जिन सर्विस रोड्स का उद्देश्य स्थानीय ट्रैफिक, दुकानों, इमारतों और छोटी दूरी के वाहनों को मुख्य सड़क से अलग रखना था, वे कई जगह अवैध पार्किंग, कबाड़ वाहनों, गैरेज, फेरीवालों, निर्माण सामग्री और निजी कब्जों से भर गई हैं। परिणाम यह होता है कि स्थानीय ट्रैफिक भी मुख्य सड़क पर आ जाता है और मुख्य सड़क का दबाव बढ़ जाता है। दहिसर से लेकर दक्षिण मुंबई तक सभी प्रमुख सर्विस रोड्स का विशेष सर्वे होना चाहिए। जहां भंगार वाहन, बंद पड़ी गाड़ियां, अवैध ढांचे, गैरेज या कब्जे हैं, उन्हें हटाया जाए। सर्विस रोड्स को फिर से चलने योग्य बनाया जाए। यह काम यदि ईमानदारी से हो, तो मुख्य सड़कों पर १० से १५ प्रतिशत तक दबाव कम किया जा सकता है।
निर्माण कार्य से त्योहारों तक
निर्माण कार्य भी मुंबई के ट्रैफिक का बड़ा बॉटलनेक है। मेट्रो, पुल, सड़क चौड़ीकरण, पाइपलाइन, केबल, इमारत निर्माण और फुटपाथ मरम्मत जैसे कार्य वर्षों तक सड़क के हिस्से को घेरकर रखते हैं। कई जगह अस्थायी बैरिकेड स्थायी प्रतीक बन जाते हैं। निर्माण एजेंसियों को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वे सड़क को अनिश्चितकाल तक कब्जे में रखें। हर निर्माण स्थल के लिए स्पष्ट समयसीमा, ट्रैफिक डायवर्जन योजना, रात में कार्य की प्राथमिकता और मासिक समीक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। यदि कोई एजेंसी तय समय से अधिक सड़क घेरती है, तो उस पर दंड लगे और वह दंड नागरिक राहत कोष में जाए।
सड़क किनारे फेरीवालों और अवैध ठेलों की समस्या को भी संवेदनशील लेकिन कठोर नीति से संभालना होगा। फेरीवालों की आजीविका का प्रश्न महत्वपूर्ण है परंतु मुख्य सड़क, बस स्टॉप, जंक्शन, फुटपाथ और मोड़ पर कब्जा कर लेना स्वीकार्य नहीं हो सकता। इसके लिए वैकल्पिक फेरीवाला जोन बनाए जाएं। लेकिन नो-हॉकिंग जोन में कब्जा करने पर तत्काल कार्रवाई हो। आज कई जगह फुटपाथ फेरीवालों ने घेर रखे हैं, इसलिए पैदल यात्री सड़क पर उतरते हैं और वाहन धीमे होते हैं। यह जाम और दुर्घटना दोनों का कारण है।
त्योहारों के समय मुंबई का ट्रैफिक अलग रूप ले लेता है। गणेशोत्सव, डेढ़ दिन, पांच दिन, सात दिन और अनंत चतुर्दशी के विसर्जन, नवरात्रि, ईद, क्रिसमस, रक्षाबंधन, दिवाली, विवाह सीजन और बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों में घरेलू वाहनों की संख्या अचानक बढ़ जाती है। ऐसे दिनों में सामान्य ट्रैफिक नियम पर्याप्त नहीं होते। त्योहार-विशेष ट्रैफिक प्रोटोकॉल बनना चाहिए। भारी वाहनों की मुंबई में पूर्ण प्रवेशबंदी, विशेष पार्किंग क्षेत्र, मेट्रो और बसों की अतिरिक्त सेवा, वन-वे रूट, डिजिटल सूचना, एंबुलेंस कॉरिडोर और ड्रोन निगरानी जैसी व्यवस्था पहले से घोषित होनी चाहिए। गणेशोत्सव जैसे अवसरों पर ट्रैफिक योजना केवल पुलिस बंदोबस्त नहीं, बल्कि नागरिक सुविधा योजना होनी चाहिए।
सरकारी वाहन और सार्वजनिक परिवहन के चालक भी समीक्षा से बाहर नहीं रहने चाहिए। सरकारी गाड़ी चलाना विशेष जिम्मेदारी है, विशेष छूट नहीं। सरकारी वाहन चालकों, बेस्ट ड्राइवरों, राज्य परिवहन बस चालकों, स्कूल बस ड्राइवरों, पुलिस वाहनों और मनपा वाहनों के चालकों की समय-समय पर ड्राइविंग समीक्षा, स्वास्थ्य परीक्षण, दृष्टि परीक्षण, व्यवहार प्रशिक्षण और सड़क अनुशासन मूल्यांकन होना चाहिए। यदि सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े वाहन ही नियम तोड़ेंगे, तो निजी वाहन चालकों पर उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। मुंबई को अंतत: एक नई सड़क-दृष्टि चाहिए। सड़क को केवल डामर की पट्टी नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन, सार्वजनिक संसाधन और आर्थिक उत्पादकता का माध्यम माना जाना चाहिए। रोड डेडिकेशन, लेन डेडिकेशन, सर्विस रोड सुधार, अतिक्रमण हटाना, निर्माण नियंत्रण, त्योहार प्रबंधन और सार्वजनिक चालकों की समीक्षा, ये सब मिलकर मुंबई के ट्रैफिक को व्यवस्थित कर सकते हैं।
मुंबई को जाम से बचाना है तो केवल वाहन नहीं, सड़क का चरित्र बदलना होगा। जिस दिन सड़क पर हर वाहन को अपना स्थान, अपनी गति और अपनी मर्यादा मिल जाएगी, उसी दिन मुंबई की रफ्तार फिर से लौटने लगेगी।
कल पढ़ें-
सड़क अनुशासन
मुंबई की ट्रैफिक समस्या का एक बड़ा कारण सड़क पर अनुशासन की कमी है। अब स्कूलों में ट्रैफिक नियमों का पाठ अनिवार्य किया जाना चाहिए। जिस तरह बच्चों को नागरिक शास्त्र पढ़ाया जाता है, संविधान, अधिकार, कर्तव्य, स्वच्छता और पर्यावरण के बारे में बताया जाता है, उसी तरह सड़क उपयोग, यातायात नियम, सार्वजनिक परिवहन अनुशासन और पैदल यात्री सुरक्षा को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। आधुनिक जीवन में सड़क और यातायात उतने ही जरूरी हैं, जितना भाषा, गणित या नागरिकता का बोध।
