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मुस्लिम वर्ल्ड : ट्रंप की धमकियां बेकार… कोई नहीं थामेगा इजरायल का हाथ!

सूफी खान

ईरान-अमेरिका समझौते के खिलाफ और जंग पर आमादा हुए जा रहे इजरायल को मनाने के लिए ट्रंप ने एक नया शिगूफा छोड़ा है। उन्होंने अरब देशों पर इजरायल के साथ अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होने का दबाव बढ़ा दिया है। लेकिन क्या अरब और मुस्लिम देश राष्ट्रपति ट्रंप के इस फरमान को मानेंगे?
दरअसल, ट्रंप ने चेतावनी दी है कि ईरान के साथ कोई भी समझौता इस बात पर निर्भर करेगा कि पाकिस्तान, मिस्र, तुर्की, कतर और सऊदी अरब अब्राहम समझौते पर दस्तखत करने के लिए तैयार होते हैं। मिडिल ईस्ट में अब्राहम समझौता साल २०२० में डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के आखिर में पेश किया गया था। इसका नाम हजरत इब्राहिम के नाम पर रखा गया है, जिन्हें यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्मों में पैगंबर माना जाता है। इसके तहत अरब देशों और इजरायल के बीच संबंधों को सामान्य बनाने पर जोर दिया गया है। इस समझौते के तहत संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन, इजरायल के साथ संबंध स्थापित करने वाले पहले खाड़ी देश बने थे। सऊदी ने शुरू में दिलचस्पी दिखाई थी, लेकिन फिर सोच-विचार कर हालात भांपकर पीछे हट गया था।
लेकिन मिडिल ईस्ट की सियासत पर करीब से नजर रखने वाले एक्सपर्ट कहते हैं कि अरब और मुस्लिम देश अब किसी भी हालत में इजरायल को स्वीकार नहीं करेंगे। ट्रंप कितना भी प्रेशर बना लें। क्योंकि अब्राहम समझौते से हासिल कुछ नही हुआ है। जिस यूएई ने इजरायल के साथ ये समझौता कर रखा है, उसकी ४० दिनों की जंग में ईरान के हाथों बुरी पिटाई हुई। पांच साल पहले यूएई ने इजरायल को अब्राहम समझौते में मान्यता तो दे दी, मगर हकीकत ये है कि यूएई आज भी खुलकर इजरायल के साथ अपने संबंधों को नहीं दिखाता। पिछले दिनों जब इजरायल की सरकार ने खुद घोषणा की थी कि ४० दिनों की जंग के बीच नेतन्याहू खुफिया तौर पर यूएई गए थे तब यूएई ने इजरायल के इस बयान को सिरे से खारिज किया था और अपने ही दोस्त इजरायल पर झूठ बोलने का आरोप लगाया था।
ट्रंप के अब्राहम समझौते के बाद भी लेबनान से लेकर सीरिया के गोलान हाइट्स तक इजरायली कॉलोनियां और कंट्रोल बढ़ता ही रहा है। ऐसे में अरब देश ये मानते हैं कि इजरायल को मान्यता देना मतलब उसे और पैâलने का मौका देना है। सऊदी की शुरू से शर्त है कि इजरायल फिलिस्तीन को मान्यता दे और अलग फिलिस्तीन देश की बात करे तब वो इजरायल से समझौता कर लेगा। लेकिन इजरायल फिलिस्तीन के विचार को ही खारिज करता है। ऐसे में सऊदी तब तक इजरायल से नहीं जुड़ेगा जब तक फिलिस्तीन का मुद्दा न सुलझ जाए। ऐसे ही पाकिस्तान जैसे देश तो इजरायल को कभी स्वीकार नहीं करेंगे चाहे ट्रंप कितना भी दबाव डाल दें, इसकी वजह भी है पाकिस्तान की सांप्रदायिक राजनीति में इजरायल विरोध एक बड़ा मुद्दा हमेशा से रहा है।

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