मनमोहन सिंह
नाइट फ्रैंक की रिपोर्ट और ‘तीसरी मुंबई’ के बड़े-बड़े दावे जिस चकाचौंध को पेश करते हैं, जमीनी हकीकत उससे कोसों दूर है। ऊंची गगनचुंबी इमारतें और चमचमाते एक्सप्रेस-वे किसी शहर के ‘सस्टेनेबल’ (टिकाऊ) होने की गारंटी नहीं हैं। यदि बुनियादी ढांचा ही खोखला हो तो विकास का यह महल ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है। आज नई मुंबई इसी दोहरी मार को झेल रही है।
१. दम घोटती हवा और जहरीला पानी
नई मुंबई का टीटीसी (ठाणे बेलापुर रोड) और तलोजा एमआईडीसी क्षेत्र एशिया के सबसे बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में से हैं, लेकिन ये पर्यावरण के लिए नासूर बन चुके हैं। तलोजा और महापे जैसे इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) अक्सर ‘खराब’ श्रेणी (२०० से अधिक) में रहता है। केमिकल कंपनियों से निकलने वाली गैसें रात के समय हवा को जहरीला बना देती हैं। केवल हवा ही नहीं, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की रिपोर्ट्स के अनुसार, तलोजा की कासाडी नदी और वाशी की खाड़ियों में बिना ट्रीट किया हुआ औद्योगिक कचरा बहाए जाने के कारण जल प्रदूषण गंभीर स्तर पर है, जिससे स्थानीय जलीय जीवन पूरी तरह नष्ट हो चुका है।
२. नष्ट होते मैंग्रोव्ज और कांपता ड्रेनेज सिस्टम
उरण, बेलापुर और पाम बीच रोड के आस-पास के मैंग्रोव्ज (तटीय वन), जो शहर को बाढ़ से बचाते थे, उन्हें रियल एस्टेट माफिया और डंपिंग के जरिए धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में सैकड़ों हेक्टेयर मैंग्रोव्ज क्षेत्र को मलबे से पाट दिया गया है।
नतीजा यह है कि मानसून की पहली बौछार में ही पूरा शहर घुटनों तक पानी में डूब जाता है। वाशी, सानपाड़ा और पनवेल के कई सब-वे और सड़कें जलजमाव का शिकार हो जाती हैं। करोड़ों रुपए के ड्रेनेज प्रोजेक्ट्स कागजों पर तो दुरुस्त हैं, लेकिन पहली बारिश ही नई मुंबई महानगरपालिका (एनएमएमसी) के दावों की पोल खोल देती है।
३. पानी-बिजली का संकट और लचर स्वास्थ्य सेवाएं
शहर का विस्तार जिस रफ्तार से हुआ है, उस अनुपात में पानी और बिजली की आपूर्ति ठप है। कामोठे, खारघर और उलवे जैसे नए नोड्स में आज भी टैंकर माफिया का राज है और गर्मियों में गंभीर जल संकट देखा जाता है।
वही हाल सरकारी स्वास्थ्य और परिवहन प्रणाली का है। वाशी और ऐरोली के नगर निगम अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं, डॉक्टरों और वेंटिलेटरों की भारी कमी है, जिसके कारण गरीबों को मुंबई के सायन या केईएम अस्पताल भागना पड़ता है। सार्वजनिक परिवहन की बात करें तो एनएमएमटी बसों की अनियमितता और ऑटोचालकों की मनमानी ने आम नागरिक का जीना दूभर कर दिया है।
गगनचुंबी इमारतों का मतलब वास्तविक विकास नहीं
गगनचुंबी इमारतों का मतलब वास्तविक विकास नहीं है। जब तक नई मुंबई के नागरिकों को शुद्ध हवा, स्वच्छ पेयजल, सुदृढ़ स्वास्थ्य व्यवस्था और बाढ़-मुक्त ड्रेनेज सिस्टम जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलतीं, तब तक इसे ‘स्मार्ट सिटी’ या ‘ग्रोध कॉरिडोर’ कहना सिर्फ एक खोखला सरकारी नारा ही रहेगा।
