अमिताभ श्रीवास्तव
भारत तप और तपस्वियों की भूमि है, यह सब जानते हैं और विश्व भी इसकी आध्यात्मिकता से प्रभावित है। यहां विश्वभर के लोग आते हैं और आध्यात्मिकता में डुबकी लगाकर भारत के ही हो जाते हैं। अब देखिए न, एक रशियन महिला इन दिनों बहुत वायरल है जो भीषण गर्मी में आग के बीच बैठी तपस्या कर रही है। वह राजस्थान के पुष्कर में करीब ४३ डिग्री गर्मी में नौ धूनि तपस्या में लीन है। पिछली ३ मई से शुरू हुई उसकी तपस्या २५ मई तक चलेगी। आखिर वो कौन है? मूल रूप से रूस की रहने वाली है वो जिसका भारत में राधिका योगिनी अन्नपूर्णा नाथ नाम है। १७ साल पहले भारत आई थी। नाथ संप्रदाय से दीक्षा ली और अब यहीं की होकर रह गई, जबकि वो टूरिस्ट वीजा पर है। पुष्कर में छोटी बस्ती स्थित श्मशान भूमि में अघोरी सीताराम बाबा के आश्रम पर २१ दिन की तपस्या में लीन है। गुरु शिष्या दोनों तप कर रहे हैं। गोबर के उपलों को प्रज्वलित कर ये तपस्या चल रही है। है न अद्भुत।
इस होड़ से सावधान!
क्रिकेट में वैभव सूर्यवंशी जरूर प्रेरणा स्रोत बने हैं, मगर इस प्रेरणा का यह मतलब नहीं कि होड़ लगा दी जाए और हर एक बच्चे को ऐसी ट्रेनिंग में झौंक दिया जाए, जो वो चाहता ही नहीं। यह मानकर चलिए कि हजारों हजार में से कोई एक ही ऐसा बच्चा निकलता है, जो वैभव सूर्यवंशी जैसा होता है। एक ही सचिन तेंदुलकर हुए हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि ऐसे खिलाड़ियों की तरह सबको बनाया जा सकता है। गॉड गिफ्ट भी कुछ होता है और हर एक बच्चों में कुछ न कुछ गॉड गिफ्ट होता ही है। जरूरत बस उसे पहचानने की है, न कि किसी होड़ में अपने बच्चों को झौंक देने की। दरअसल, यह बात तब उठी जब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में करीब १०-११ साल का एक बच्चा क्रिकेट किट पहनकर नेट्स के बाहर खड़ा दिखाई देता है। सामने बड़े उम्र के तेज गेंदबाज अभ्यास कर रहे हैं। जैसे ही उसे बल्लेबाजी के लिए अंदर ले जाया जाता है, बच्चा डर जाता है। उसकी आवाज कांपती हुई सुनाई देती है -‘नहीं मैं नहीं खेलूंगा, मुझे चोट लग जाएगी’ लेकिन इसके बावजूद एक शख्स, जिसे लोग उसका पिता या कोच मान रहे हैं, उसका हाथ पकड़कर उसे नेट्स की ओर ले जाता है। बच्चा पीछे हटने की कोशिश करता है। लेकिन उसे फिर से तेज गेंदबाज के सामने खड़ा कर दिया जाता है। इस वीडियो के बाद बहस छिड़ गई कि क्या ऐसी ट्रेनिंग की जरूरत है। कुछ लोग इसके पक्ष में खड़े दिखाई दिए तो कुछ ने विरोध किया है। बात दरअसल सही यही है कि बच्चों को आग में झौंकना गलत है। इसे बंद कर देना चाहिए। उनकी जिसमें रुचि हो, वही कराया जाए। हो सकता है वह वैभव जैसा नहीं बल्कि शतरंज के गुकेश जैसा निकल जाए।
