मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका :  क्या मुख्य न्यायाधीश की भी हो सकती है निजी राय?

पॉलिटिका :  क्या मुख्य न्यायाधीश की भी हो सकती है निजी राय?

के.पी. मलिक

लोकतंत्र में सबसे ऊंचे पद पर बैठे व्यक्ति के शब्द सिर्फ शब्द नहीं होते, बल्कि वे संस्था के चरित्र का प्रतिबिंब माने जाते हैं’
लोकतंत्र में न्यायपालिका को केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं माना जाता, बल्कि उसे नागरिकों के अधिकारों की अंतिम संरक्षक भी समझा जाता है। इसलिए जब देश के मुख्य न्यायाधीश किसी संवेदनशील सामाजिक या राजनीतिक मुद्दे पर टिप्पणी करते हैं, तो उसका असर केवल अदालत कक्ष तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह पूरे लोकतांत्रिक विमर्श को प्रभावित करता है। हाल के दिनों में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के कुछ बयानों को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ है, उसने इसी प्रश्न को फिर से सामने ला दिया है कि क्या देश के मुख्य न्यायाधीश की भी निजी राय हो सकती है और यदि हो सकती है तो उसकी सार्वजनिक अभिव्यक्ति की सीमा क्या होनी चाहिए?
युवाओं को ‘कॉकरोच’ कहे जाने वाले कथित बयान पर जिस तरह देशभर में प्रतिक्रिया हुई, वह केवल शब्दों पर नाराजगी नहीं थी। यह उस मानसिकता को लेकर चिंता थी, जिसमें बेरोजगारी, असंतोष और विरोध को संवेदनशील सामाजिक प्रश्न के बजाय ‘अव्यवस्था’ या ‘समस्या’ के रूप में देखा जाता है। इसी तरह गुजरात के पीपावाव पोर्ट मामले में पर्यावरण कार्यकर्ताओं पर की गई टिप्पणियों ने भी यह बहस तेज कर दी कि क्या जन आंदोलनों और नागरिक विरोध को अब विकास विरोधी या राष्ट्रविरोधी नजरिए से देखा जाने लगा है।
इन घटनाओं के बाद ७१ सेवानिवृत्त आईएएस और आईपीएस अधिकारियों द्वारा लिखा गया खुला पत्र केवल किसी व्यक्ति विशेष की आलोचना नहीं है। यह उस व्यापक चिंता का संकेत है जिसमें लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता, नागरिक स्वतंत्रताओं और असहमति के अधिकार को लेकर सवाल उठ रहे हैं। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। उसकी असली ताकत इस बात में होती है कि नागरिक बिना भय के सरकार, नीतियों और सत्ता संरचनाओं पर सवाल उठा सकें। यदि विरोध को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे औपचारिक ढांचे में सिमटने लगता है।
यह भी सच है कि मुख्य न्यायाधीश भी एक इंसान हैं। उनके अपने अनुभव, विचार और निजी दृष्टिकोण हो सकते हैं। संविधान उनसे मशीन जैसी निष्प्राण निष्पक्षता की अपेक्षा नहीं करता। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब निजी राय सार्वजनिक पद की गरिमा और संवैधानिक जिम्मेदारी से टकराने लगती है। एक सामान्य नागरिक की टिप्पणी और देश के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी का प्रभाव समान नहीं होता। मुख्य न्यायाधीश के शब्द केवल व्यक्तिगत विचार नहीं माने जाते, वे न्यायपालिका की संस्थागत सोच के संकेत के रूप में भी पढ़े जाते हैं।
यही कारण है कि दुनियाभर की न्यायिक परंपराओं में ‘ज्यूडिशियल रेस्ट्रेंट’ यानी न्यायिक संयम को बहुत महत्व दिया गया है। न्यायपालिका की ताकत उसकी भाषा की कठोरता में नहीं, बल्कि उसकी संतुलित और संवेदनशील अभिव्यक्ति में होती है।
अदालतें यदि जनता के दुख, गुस्से और विरोध को समझने के बजाय उसे तिरस्कार की दृष्टि से देखने लगें, तो आम नागरिक का भरोसा कमजोर पड़ सकता है।
आज भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां बेरोजगारी, महंगाई, पर्यावरण संकट और सामाजिक असमानता जैसे प्रश्न लगातार गहरे हो रहे हैं। ऐसे समय में विरोध और असहमति को लोकतंत्र के स्वाभाविक हिस्से के रूप में देखना जरूरी है, न कि व्यवस्था के लिए खतरे के रूप में। न्यायपालिका की भूमिका सत्ता और जनता के बीच संतुलन बनाने की है, न कि केवल व्यवस्था बनाए रखने की।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि मुख्य न्यायाधीश की निजी राय हो सकती है या नहीं। सवाल यह है कि क्या उस राय की अभिव्यक्ति संविधान की आत्मा, न्यायिक गरिमा और लोकतांत्रिक संवेदनशीलता के अनुरूप है। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के शब्द केवल शब्द नहीं होते, वे संस्थाओं के चरित्र का प्रतिबिंब बन जाते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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