हिमांशु राज
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों माहौल कुछ ऐसा है जैसे किसी ने हल्के-फुल्के बयानबाजी के गुब्बारे में हवा भर दी हो। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के मुखिया और योगी सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने एक सभा के दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कार्यकर्ताओं को `गुंडा’ कह दिया। बस फिर क्या था, यह एक लाइन सियासी गलियारों में गूंज उठी और मीडिया चैनलों तक ने इसे चटकारे लेकर परोसा। लखनऊ में एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने राजभर के आवास पर जोरदार प्रदर्शन किया, उनके इस्तीफे की मांग उठाई और बवाल इतना बढ़ा कि पुलिस को लाठीचार्ज तक करना पड़ा। मुद्दा गर्माया तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तत्काल जांच का आदेश जारी कर दिया।
यहीं पर कहानी में नया मोड़ आया। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह मैदान में उतरे और सीतापुर से राजभर की `राजनीतिक हैसियत’ पर सीधा व्यंग्य करने लगे। उन्होंने कहा, `ऐसे हल्के आदमी की बात का मैं जवाब नहीं देता।’ उनका यह कथन राजभर के राजनीतिक वजन पर सबसे तीखा कटाक्ष माना जा रहा है। सोशल मीडिया से लेकर क्षेत्रीय मीडिया तक यह बयान घूमता रहा और चर्चा का केंद्र बन गया। बृजभूषण यहीं नहीं रुके, उन्होंने कांग्रेस पर भी तंज कसते हुए कहा कि कांग्रेस जैसी भाषा बोलकर अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार रहे हैं। अब यहां बड़ा सवाल खड़ा होता है, हल्कापन असल में किसका है? वह मंत्री का जिसने बिन सोचे समझे एबीवीपी कार्यकर्ताओं को `गुंडा’ कह दिया या फिर वे छात्र जिनके प्रदर्शन से सड़कें गरमा गर्इं या वह नेता जो सिर्फ व्यंग्य छोड़कर आगे बढ़ गया? राजनीति में यह तकरार किसी हल्के मजाक की तरह भले लगे, लेकिन असल में यह साख और पहचान का खेल है। राजभर खुद को अति पिछड़े समाज की आवाज बताते हैं और उसी प्रतिनिधित्व की राजनीति से अपनी ताकत गढ़ते हैं। मगर बृजभूषण शरण सिंह का यह तंज उनकी राजनीतिक पहचान पर सवालिया निशान जैसा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बयान कभी हवा में उड़ जाते हैं, कभी तराजू में तौल दिए जाते हैं। इस बार मामला इतना भर है कि प्रदेश की सियासत गंभीर मुद्दों से हटकर `हल्केपन’ की परिभाषा खोजने में उलझी हुई दिख रही है।
