मुख्यपृष्ठस्तंभराज की बात : दक्षिण मुंबई में आंदोलन विरोधी सुर

राज की बात : दक्षिण मुंबई में आंदोलन विरोधी सुर

 द्विजेंद्र तिवारी, मुंबई

स्वर्णजड़ित चम्मच के साथ पैदा हुए एक सांसद ने पिछले दिनों मांग की कि दक्षिण मुंबई में धरना प्रदर्शन और आंदोलनों पर रोक लगाई जाए। मराठा आंदोलन के चलते पांच दिन दक्षिण मुंबई में व्यवस्था बाधित रही, जिसके बाद उस सांसद ने इस आशय का पत्र लिखकर राज्य सरकार से मांग की है। व्यापार में भारी घाटा होने की इसी तरह की चिंता एक व्यापारी संगठन के अगुवा ने भी जाहिर की थी। इस मांग को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं। देश की आर्थिक राजधानी होने के नाते शांति व्यवस्था बदहाल न होने देने के तर्क पेश किए जा रहे हैं।
मंत्रालय से दूर
लगभग १५ वर्ष पहले तक धरना- प्रदर्शन आंदोलन मंत्रालय के पास हुआ करते थे। बड़ी सभाएं शिवाजी पार्क और आजाद मैदान में हुआ करती थीं। तब रैलियों के दौरान पूरा चर्चगेट और नरीमन पॉइंट परिसर आंदोलनकारियों से भरा पड़ा रहता था। मुंबई में विधानसभा सत्र के दौरान कई छोटे-बड़े तंबू तन जाते थे और भीड़ कई गुना बढ़ जाती थी।
चर्चगेट और नरीमन पॉइंट आमतौर पर आर्थिक रूप से समृद्ध निवासियों वाला क्षेत्र है। नरीमन पॉइंट चर्चगेट सिटीजन एसोसिएशन ने १९९७ में हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की थी और धरना-प्रदर्शन रैलियों पर रोक लगाने की मांग की थी। याचिका में कहा गया था कि प्रदर्शनों से क्षेत्र में गंदगी, अशांति और ट्रैफिक जाम की समस्या पैदा हो जाती है। स्थानीय निवासियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। कई वर्ष की सुनवाई के बाद विकल्प के तौर पर तब अदालत ने यह अंतरिम व्यवस्था दी थी कि सारे धरना-प्रदर्शन आजाद मैदान में आयोजित किए जाएं। तब से यह व्यवस्था लागू है। हालांकि, अदालत ने राज्य प्रशासन से इस विषय पर स्थायी विचार का आदेश दिया था। इसके लिए एक समिति भी बनाई गई थी। इस समिति को ऐसी जगह बतानी थी, जहां किसी रहिवासी को भीड़ से होनेवाली परेशानियों का सामना न करना पड़े। लेकिन इस समिति का क्या हुआ, कोई खबर नहीं है।
आंदोलनों का स्वर्णिम इतिहास
अपनी विक्टोरियन वास्तुकला और औपनिवेशिक आकर्षण के साथ, अपने विशाल वित्तीय संस्थानों के लिए प्रसिद्ध दक्षिण मुंबई एक सदी से भी अधिक समय से राजनीतिक प्रतिरोध और सामाजिक परिवर्तन का केंद्र रहा है।
महात्मा गांधी ने दक्षिण मुंबई के लेबरनम रोड स्थित मणि भवन को १९१७ से १९३४ तक अपनी कर्मस्थली बनाया। यहीं से उन्होंने असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन जैसे प्रमुख राष्ट्रीय आंदोलन शुरू किए। तब लाखों लोग स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने मुंबई आते थे।
स्वतंत्रता के बाद दक्षिण मुंबई राजनीतिक मुखरता का केंद्र बना रहा। संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन (१९५५-६०) में मुंबई को राजधानी बनाकर एक अलग मराठी भाषी राज्य बनाने की मांग के दौरान दक्षिण मुंबई में बड़े पैमाने पर रैलियां और विरोध-प्रदर्शन हुए। इसी दौरान फ्लोरा फाउंटेन गोलीबारी में संयुक्त महाराष्ट्र की मांग करते हुए १०५ प्रदर्शनकारी शहीद हुए।
प्रखर समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीस ने मुंबई से १९७४ की रेलवे हड़ताल का नेतृत्व किया। इस हड़ताल ने सिर्फ मुंबई ही नहीं, पूरे देश की रेल सेवा को ठप कर दिया। शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने भूमिपुत्रों के अधिकारों के लिए कई बार दक्षिण मुंबई में आंदोलनों का नेतृत्व किया।
मुंबई से बाहर करने की तैयारी?
दक्षिण मुंबई के ये ऐतिहासिक स्थल आज भी भारत की स्थायी लोकतांत्रिक भावना के प्रतीक बने हुए हैं। यह शहर भारतीय लोकतंत्र का जीवंत स्वरूप है, जहां सामान्य जनता ने साम्राज्यों को चुनौती दी, राज्य की सीमाओं को आकार दिया, श्रम अधिकारों को पुनर्परिभाषित किया और यह सुनिश्चित किया है कि सामान्य जन की आवाज को कभी नजरअंदाज न किया जाए। लेकिन सांसद की इस मांग से अब यह आशंका पैदा हो रही है कि क्या दक्षिण मुंबई में विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने की योजना बनाई जा रही है? क्या अब सारे आंदोलनकारी मुंबई की सीमा दहिसर और मुलुंड पर ही रोक दिए जाएंगे? क्या नई मुंबई को अब आंदोलन के नए ठौर के तौर पर तय करने की तैयारी चल रही है? अगर ऐसा है तो छोटे-छोटे समूहों में चलनेवाले आंदोलनों की आवाज मंत्रालय के गलियारों तक कैसे पहुंचेगी?
(लेखक कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)

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