अरुण कुमार गुप्ता
एक कहावत काफी मशहूर है कि गांव बसा नहीं कि लुटेरे आ गए, कुछ ऐसा ही हाल इस समय महायुति के दो घटक दल भाजपा और शिंदे गुट में नजर आ रहा है। मुंबई मनपा चुनाव अभी तक घोषित नहीं हुए हैं, फिर भी महापौर पद को लेकर दोनों में तकरार शुरू हो गई है। तकरार की शुरुआत भाजपा प्रदेशाध्यक्ष रवींद्र चव्हाण के उस बयान से हुई, जिसमें उन्होंने दावा किया कि मुंबई मनपा में महायुति की सत्ता आएगी और महापौर भाजपा का ही होगा। इसके बाद शिंदे गुट के मंत्री संजय शिरसाट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि हम रवींद्र चव्हाण के बयान को कोई महत्व नहीं देते। इससे विवाद और बढ़ गया है। बताया जाता है कि भाजपा किसी भी कीमत पर मेयर का पद हासिल करने के लिए दृढ़ है, जो वह २०१७ में बाल-बाल चूक गई थी, लेकिन उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और मंत्री संजय शिरसाट के नेतृत्व वाले गुट ने स्पष्ट किया है कि रवींद्र चव्हाण के बयान का कोई महत्व नहीं है। दूसरी ओर चव्हाण के बयान के बाद शिंदे गुट के तीखे पलटवार ने महायुति की आंतरिक खींचातानी पूरी तरह उजागर कर दी है। उधर अजीत पवार गुट भी मुंबई में अपना राजनीतिक वजूद दिखाने के प्रयास के तहत निर्णायक भूमिका चाह रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि तीनों दलों की यह भिड़ंत वास्तव में जारी रहती है और विस्फोटक रूप लेती है या फिर चोंचलेबाजी तक ही सीमित रहती है।
दिल के अरमा…
सितंबर १९८२ में आई फिल्म `निकाह’ का एक गीत `दिल के अरमा आंसुओं में बह गए…’ जो अभिनेत्री सलमा आगा पर फिल्माया गया था, उस समय काफी पापुलर हुआ था। गीत का मुखड़ा वर्तमान में अजीत पवार पर बिल्कुल फिट बैठता है। अजीत पवार ने राष्ट्रीय पार्टी का सपना पाले बड़ी हसरतों के साथ बिहार विधान सभा चुनाव में १५ उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उनके १४ प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए। सबसे मजेदार बात यह सामने आई कि इन उम्मीदवारों में किसी ने ५०० वोटों का आंकड़ा पार नहीं किया। यही नहीं, दादा गुट के उम्मीदवारों में आशुतोष सिंह को २१, धर्मवीर कुमार को २५, जय प्रकाश को ४३, अनिल कुमार को ५२, मनोज कुमार सिंह को ५३ और मुन्ना कुमार को ८१ वोटों से ही संतोष करना पड़ा। इसके अलावा बाकी उम्मीदवार भी १२७ से ३७० वोटों के बीच सिमट गए। ऐसे में अजीत पवार का `राष्ट्रीय पार्टी’ बनाने का सपना चूर हो गया। दूसरी तरफ अजीत पवार गुट मतदाताओं के कठोर `आईने’ में अपनी वास्तविक तस्वीर देखने को मजबूर हो गया। यहां यह भी याद रहे कि शरद पवार के नेतृत्व में जब राकांपा एकजुट थी, तब राकांपा ने अपनी अच्छी-खासी पैठ बनाई थी। तारिक अनवर के जरिए बिहार में राकांपा की मजबूत मौजूदगी थी। हालांकि, दो हिस्सों में बंटने के बाद राकांपा ने राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खो दिया। इसलिए अजीत पवार ने इस राष्ट्रीय दर्जे को फिर से हासिल करने की उम्मीद में बिहार चुनाव में एनडीए से अलग हटकर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन अजीत पवार की उम्मीदों पर पानी फिर गया। ऐसे में अजीत पवार को लेकर अब यही कहा जा सकता कि `दिल के अरमा आंसुओं में बह गए’।
विकास गायब!
शिंदे-दादा गुट एक दूसरे को पटखनी देने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते हैं। हालांकि, दोनों में आरोप-प्रत्यारोप सरकार बनने के साथ ही शुरू है। अब महाड में दादा गुट के प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे ने शिंदे गुट पर सीधा हमला बोला है। तटकरे ने कहा कि दूरबीन लगाकर देखने के बाद भी विकास गायब है। शहर का दौरा करते हुए उन्होंने प्राथमिक स्कूल की बदहाली को भ्रष्टाचार और लापरवाही का आईना बताया, तो वहीं आरोप लगाया कि चार साल में महाड को बर्बादी की ओर धकेला गया है। तटकरे के इस आक्रामक वार ने शिंदे गुट के भरत गोगावले को सीधे कटघरे में ला खड़ा किया। इस बीच मंत्री भरत गोगावले के गढ़ माने जाने वाले महाड में भाजपा और दादा गुट ने जोरदार शक्ति प्रदर्शन करते हुए उम्मीदवारों के नामांकन दाखिल किए। महाड नगरपालिका पर कब्जा बनाए रखने के लिए दादा गुट इस बार भाजपा को साथ लेकर शिंदे गुट को मात देने की तैयारी में मैदान में उतरा है। अब यह देखना अहम होगा कि भाजपा के साथ आने के बाद शिंदे गुट को घेरने की सुनील तटकरे की रणनीति कितनी सफल होती है।
