पद्म भूषण से सम्मानित प्रसिद्ध भारतीय अभिनेता अनंत नाग को हाल ही में २०२४ का दादासाहेब फाल्के पुरस्कार मिला है। वरिष्ठ अभिनेता अनंत नाग को एक नहीं, बल्कि छह फिल्मफेयर (कन्नड़ फिल्म) पुरस्कार, लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार, पांच कर्नाटक राज्य पुरस्कार और कई अन्य पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। उन्हें बंगलुरु विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त हुई है । अनंत नाग के छोटे भाई शंकर नाग (अभिनेता-निर्देशक) का लोकप्रिय धारावाहिक ‘मालगुडी डेज’ बेहद लोकप्रिय हुआ था । अनंत नाग ने नामचीन निर्देशक श्याम बेनेगल की छह फिल्मों-अंकुर, मंथन, निशांत, कोंडुरा, भूमिका, कलयुग- में अविस्मरणीय भूमिकाएं निभाईं। प्रशंसक आज भी उन्हें इन्हीं किरदारों के लिए याद करते हैं। अब तक ३०० से अधिक फिल्मों में अभिनय कर चुके अनंत नाग पिछले कई वर्षों से अपने परिवार के साथ बंगलुरु के आलीशान, लेकिन कलात्मक रूप से सुंदर ‘अदिति’ बंगले में रह रहे हैं। अनंत नाग, जिन्होंने अभिनय के क्षेत्र में ५५ साल और राजनीति में (जनता दल में) ७ साल विभिन्न पदों पर काम किया है। कन्नड़, तमिल, तेलुगु, अंग्रेजी, मराठी और मलयालम भाषाओं में धाराप्रवाह हैं। उन्होंने इन सभी भाषाओं में बेहतरीन काम, लेकिन यह कड़वा सच है कि बॉलीवुड, यानी हमारा हिंदी फिल्म उद्योग, अनंत नाग की विविध अभिनय शैली का सही उपयोग नहीं कर पाया है। बेशक, उन्हें इसका कोई अफसोस नहीं है। उन्हें बस इतना लगता है कि हिंदी सिनेमा साहित्य, आम जीवन, समाज, सामाजिक मूल्यों, शैक्षिणिक मूल्यों और कला से बहुत दूर चला गया है। हिंदी फिल्म अब हिंसक और व्यावसायिक मूल्यों से भर गया है।
यह अनंत नाग के साथ पूजा सामंत की हुई एक बेबाक बातचीत का सारांश है, जिसमें उन्होंने निजी जीवन, कन्नड़ और हिंदी सिनेमा, पुरस्कार जैसे कई मुद्दों पर चर्चा की।
आपको हाल ही में फिल्म जगत के सर्वोच्च पुरस्कार, दादासाहेब फाल्के से सम्मानित किया गया है। इस अवसर पर आपकी भावनाएं कैसी हैं?
मैं केंद्र सरकार का बहुत आभारी हूं। मुझे कर्नाटक सरकार से कई पुरस्कार मिले हैं। मैंने कई फिल्मफेयर पुरस्कार जीते हैं, कई सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार भी प्राप्त किए हैं। लेकिन आज तक मुझे केंद्र सरकार से कोई पुरस्कार नहीं मिला था। दादासाहेब फाल्के पुरस्कार पाकर मुझे ऐसा लग रहा है, मानो मेरा जीवन चक्र पूरा हो गया हो। मैंने अभिनय की दुनिया में कदम रखा, यहीं मुझे आनंद मिला। मैंने ५५ वर्षों तक अभिनय के देवता की सेवा की है। मुझे लगता है कि इस पुरस्कार ने मेरी इस सेवा को मान्यता दी है।
कुछ महीने पहले जब मैं दिल्ली गया था, तब मंच पर मेरी मुलाकात प्रधानमंत्री मोदी जी से हुई। हमने एक-दूसरे का हालचाल पूछा और फिर हम अपने रास्ते रवाना हो गए। बाद में जब समय मिला तो मुझे एक पत्र के माध्यम से फाल्के पुरस्कार के बारे में सूचना मिली। फिर मुझे फोन आया, जिसमें मेरी उपलब्धता के बारे में पूछा गया। मुझे खुशी है कि ५५ वर्षों के बाद केंद्र सरकार का ध्यान मेरी ओर गया और इस पुरस्कार के माध्यम से मैं देश भर की आम जनता तक पहुंच सका।
आप इन दिनों अभिनय में सक्रिय क्यों नहीं रहे हैं? इसका क्या कारण है?
मैंने लगातार ५५ वर्षों तक काम किया है। ७-८ भाषाओं में ३०० से अधिक फिल्में की हैं। कई ऐसे किरदार निभाए हैं, जिनकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। इतनी भाषाएं, इतनी फिल्में, मेरे माता-पिता और प्रशंसकों का अटूट प्यार, ढेर सारे पुरस्कारों ने दिल भर दिया है। खुशी की कोई सीमा नहीं है। कोई पछतावा नहीं, कोई अफसोस नहीं। मैंने स्वेच्छा से अभिनय से संन्यास ले लिया है। अगर मुझे कोई दमदार किरदार नहीं मिलता, अगर मुझे इसे करने में आनंद नहीं आता, तो मैने मना कर दिया है। अगर भविष्य में मुझे सही दृष्टिकोण के साथ कोई चुनौतीपूर्ण किरदार मिलता है, तो मैं उसे करूंगा, लेकिन महज करने के लिए नहीं। जीवन में मुझे कहाँ रुकना है यह समझ आ गया है, अभिनय मेरे जीवन का एक हिस्सा है ,पूरा जीवन नहीं। जीवन के अन्य रंगों का भी आनंद मुझे लेना चाहिए।
इस समय आपकी दैनिक दिनचर्या क्या है?
अभिनय ही मेरा पूरा जीवन नहीं है, जैसा मैंने कहा। मेरा मानना है कि अभिनय मेरे जीवन का एक हिस्सा है, एक दौर है। अभिनय ने मुझे बहुत संतुष्टि, पैसा और बेतहाशा खुशी दी है। प्रशंसकों, विशेष रूप से कर्नाटक राज्य में, ने मुझे अभूतपूर्व प्रेम, आशीर्वाद और शुभकामनाएं दी हैं। यही कारण है कि हाल ही में अभिनय से विराम लेने के बावजूद मैं खूब पढ़ता हूं। मैं सैर करता हूं। मैं ध्यान करता हूं। मुझे बागवानी पसंद है। मैं समाचार देखता हूं, विश्व घटनाओं से अवगत रहता हूं। मैं खुद को नवीनतम जानकारी से अपडेट रखना पसंद करता हूं। मैं समय पर उठता हूँ, समय पर सोता हूं, अपने समय का सदुपयोग करता हूं। संस्कृत का गहन अध्ययन करने के कारण, मैं अब भी श्लोक और उपनिषद पढ़ता हूं। मेरी दिनचर्या ऐसी है कि समय की कोई कमी नहीं है। मुझे अपने परिवार का पूरा सहयोग प्राप्त है। मेरी पत्नी गायत्री पूर्वाश्रम की अभिनेत्री हैं। मेरी एक बेटी है-अदिति।
मेरे भाई शंकर (शंकर नाग, निर्देशक और अभिनेता), जो मुझसे छह साल छोटे थे, हमारा बहुत गहरा और घनिष्ठ रिश्ता था, लेकिन ३० सितंबर, १९९० को एक दुखद कार दुर्घटना में उनका निधन हो गया! मैं उन्हें आज भी नहीं भूल सकता और हां, हम सब साथ रहते थे! मुझे एक बहन है।
कन्नड़, अंग्रेजी और अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं में आपकी ३०० से अधिक फिल्में हैं, लेकिन हिंदी में इनकी संख्या बहुत कम है। क्या हिंदी फिल्मों को आपने नजरअंदाज किया है?
ऐसा कुछ नहीं था। श्याम बेनेगल जैसे एक बेहतरीन निर्देशक ने मुझे लगातार अपनी ६ फिल्मों में काम दिया, फिर मैंने सत्यदेव दुबे, अमोल पालेकर, एम एस सथु के साथ फिल्में कीं। अमोल पालेकर की ‘अनाहत’ जैसी फिल्मों में काम किया। मैंने जितने भी किरदार निभाए, वे सभी दमदार और प्रभावशाली थे। लेकिन मुझे एहसास हुआ कि हिंदी फिल्मों में मुझे मौका नहीं मिल रहा था, जिन किरदारों को मैं निभा सकता था, वे मुझे नहीं मिल रहे थे। हिंदी फिल्मों का माहौल मुझे रास नहीं आया। मैं हिंदी फिल्मों में फिट नहीं बैठ पाया! लेकिन मुझे इसका कोई अफसोस नहीं था, अफसोस क्षणिक था, पर मैंने उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। मैंने अपना ध्यान अपनी जन्मभूमि (कर्नाटक) की ओर लगाया, कन्नड़ भाषा में बनी फिल्मों की ओर। यह कहने के बजाय कि मैंने उस भाषा की ओर रुख किया, उन्होंने मुझे दमदार, गुणवत्तापूर्ण और अर्थपूर्ण भूमिकाएं दीं। कन्नड़ फिल्म निर्माताओं ने ऐसी प्रासंगिक फिल्में बनाईं, जिनसे दर्शक जुड़ाव महसूस कर सकें और मुझे वे भूमिकाएं दीं। मुझे इधर-उधर देखने की जरूरत महसूस नहीं हुई। ५५ वर्षों तक मैंने अखंड कन्नड़ और दक्षिण भारतीय भाषाओं में काम करना जारी रखा। मुझे अपने काम और अपनी भूमिकाओं से बहुत आनंद मिला। मैं एक कलाकार हूं, जिसने रंगमंच किया है इसलिए मैंने हिंदी रंगमंच भी किया। मैंने प्रसिद्ध नाटक ‘आधे अधूरे हयावदन’ में भी परफॉर्म किया।
हां, ‘पापी पेट का सवाल’ का सवाल जीवन में कभी न कभी हर किसी को सामना करना पड़ता है। कुछ लोग इसे स्वीकार करते हैं, कुछ नहीं। मैं इसे स्वीकार करता हूं। कुछ फिल्में, उनमें निभाए गए किरदार मेरी सोच के अनुरूप नहीं थे, लेकिन मुझे जीवन में स्थिरता चाहिए थी, मुझे पैसों की भी जरूरत थी इसलिए मैंने समझौता किया और कुछ ऐसी फिल्में कीं, जिनमें परफॉर्म कर मुझे कोई ख़ुशी नहीं मिली।
आपने अभिनय को ५५ साल, लगभग साढ़े पांच दशक दिए हैं।,अब इंडस्ट्री में क्या बदलाव आए हैं?
मैं अपने करियर से संतुष्ट हूं, लेकिन दुनिया भर में पल-पल बदलाव हो रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में, बच्चों की दुनिया में, स्कूलों, कॉलेजों, साहित्य, प्रौद्योगिकी में, हर जगह बदलाव हो रहे हैं। १० साल पहले क्या हमारे देश में मेट्रो नेटवर्क था? क्या हम चांद और मंगल पर गए थे? क्या हम बिना एक पैसा खर्च किए पूरी दुनिया की यात्रा कर सकते थे? बहुत सारे बदलाव हुए हैं। परिवर्तन निरंतर होता रहता है!
मुझे इस बात का बहुत दुख है कि हिंदी फिल्मों ने अपनी जड़ों को खो दिया है! बॉलीवुड और बॉलीवुड फिल्में पूरी दुनिया में अपना जादू बिखेरती हैं, वे बेहद लोकप्रिय हैं। यही कारण है कि हमारी हिंदी फिल्में वैश्विक स्तर पर भारतीय छवि को मजबूत करती रही है। हमारी संस्कृति, हमारी भाषा, इस भूमि की कहानियां, इन लेखकों का साहित्य हिंदी फिल्मों में अब नहीं मिलता। यह दुखद है। एक्शन फिल्में, थ्रिलर, हॉरर फिल्में, अगर नकारात्मक नहीं तो भी अप्रासंगिक मानी जाती हैं। वे कहानियां, जो हमारे भारतीय समाज की पहचान हैं, गायब हो गई हैं। इसके विपरीत, मराठी फिल्में हर तरफ तरक्की कर रही हैं। विभिन्न विषयों, समसामयिक सामाजिक परिस्थितियों और आम मुद्दों पर फिल्में बन रही हैं। मराठी, गुजराती और बंगाली फिल्मों की कहानियां देखने लायक हैं, लेकिन हिंदी में ऐसा कुछ नहीं मिलता। हिंदी फिल्मों ने अपनी मूल गरिमा खो दी है।
आपका बचपन कैसा था? क्या यह सच है कि आपने कुछ समय आश्रम में बिताया था?
मेरा जन्म ४ सितंबर १९४८ को मुंबई के चौपाटी इलाके में एक कोंकणी भाषी परिवार में हुआ था। मेरा मूल नाम ‘अनंत नागरकट्टे’ है। मेरी माता का नाम आनंदी और पिता का नाम सदानंद नागरकट्टे था।
श्यामला हमारी बड़ी बहन थीं और शंकर नाग हमारे छोटे भाई थे। शंकर नाग ने बाद में निर्देशक और अभिनेता के रूप में अपार प्रसिद्धि प्राप्त की।
शिक्षा और धार्मिक अनुशासन स्कूली शिक्षा: मैंने अपनी प्राथमिक शिक्षा उडुपी जिले के अजजरकाडु स्थित एक कैथोलिक स्कूल में पूरी की। उसके बाद मेरा परिवार कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के शिराली (भटकल तालुका) स्थित मेरे पैतृक गांव लौट आया। मैंने बी.कॉम की डिग्री प्राप्त की, बैंक में नौकरी की और लंबे समय तक नौकरी करने के बाद, मैं अभिनय करने लगा।
आश्रम और मठवासी अनुशासन: मेरा पालन-पोषण हिंदू में हुआ और मैं पारंपरिक हिंदू संस्कृति, वेदों और महाकाव्यों के वातावरण में पला-बढ़ा। मैंने कुछ समय दक्षिण कन्नड़ के आनंद आश्रम और उत्तर कन्नड़ के चित्रपुर मठ में अत्यंत अनुशासन के साथ बिताया। उस समय मैं प्रतिदिन आश्रम में चरखा भी चलाता था।
बाद में ये मूल्य, ये अनुशासन मेरे साथ बने रहे। आज भी मैं सूतकताई करता हूं। आश्रम में मिले मूल्यों ने मेरा जीवन बदल दिया। इसलिए आज भी अपने मूल्यों से समझौता करना मेरे स्वभाव में नहीं है!
मुंबई आगमन और रंगमंच की नींव
मुंबई वापसी: अपनी किशोरावस्था के अंतिम वर्षों में, मैं उच्च शिक्षा प्राप्त करने और भविष्य की तलाश में मुंबई लौट आया।
कला और संगीत की विरासत: आश्रम में भजन और गायन की पृष्ठभूमि ने मुझे कला के क्षेत्र में आरंभिक रूप से सहायता प्रदान की। मुंबई आने के बाद मैंने कोंकणी, कन्नड़, हिंदी और मराठी थिएटर में काम करना शुरू किया। सत्यदेव दुबे, अमोल पालेकर और गिरीश कर्नाड जैसे दिग्गजों की संगति में अभिनय के प्रति मेरी रुचि और भी गहरी हो गई।
आप कुछ समय तक राजनीति में रहे। आपका अनुभव कैसा रहा?
मैं चार-पांच साल तक राजनीति में रहा, विभिन्न राजनीतिक पदों पर काम करने के बाद मेरा मोहभंग हो गया। यह क्षेत्र मेरे लिए नहीं है। जब मुझे ऐसा महसूस हुआ, तो अभिनय ने मुझे अपनी कमियां दिखाईं और मैं फिर से अभिनय में लौट आया। मैं जनसंघ पार्टी के लिए काम करता था, जनसंघ बाद में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बन गई। मैं पार्टी को एकजुट न रहकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखरते हुए नहीं देख सका। जनसंघ एक अमीबा की तरह होता जा रहा था। मैं यह नहीं देख सका इसलिए मैं फिर से अभिनय में सक्रिय हो गया। वर्तमान में मैं सार्थक जीवन को एक महत्वपूर्ण भूमिका मानता हूं। मैं सुखी जीवन जी रहा हूं।
मैंने अभिनय को अपना पेशा बना लिया। मेरी रचनात्मकता मुझे राजनीति में रहने नहीं देती थी।
