मुख्यपृष्ठस्तंभसाहित्य शलाका : प्रेमचंद का यथार्थवाद... दलित, किसान और शोषित वर्ग की आवाज!

साहित्य शलाका : प्रेमचंद का यथार्थवाद… दलित, किसान और शोषित वर्ग की आवाज!

प्रो. दयानंद तिवारी

हिंदी साहित्य में अगर किसी लेखक का नाम सबसे पहले स्मरण में आता है, तो वह हैं, मुंशी प्रेमचंद। उनके लेखन में जो सच्चाई, संवेदना, सामाजिक चेतना और यथार्थ का समावेश है, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उनके समय में था। लेकिन विडंबना यह है कि आज कुछ लोग उनकी आलोचना करने लगे हैं, उन्हें दलित विरोधी करार दे रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह आरोप तथ्य आधारित हैं? या फिर यह एक दुर्भावनापूर्ण प्रवृत्ति का हिस्सा है, जहां किसी को भी निशाना बनाकर सनसनी फैलाई जाती है?
प्रेमचंद क्यों हैं आज भी प्रासंगिक?
प्रेमचंद का साहित्य केवल भावनात्मक कथा-कहानियां नहीं, बल्कि समाज का दस्तावेज है। उन्होंने शोषण, जातिवाद, वर्गभेद, आर्थिक असमानता और सामंती मानसिकता के खिलाफ लिखकर साहित्य को केवल रसात्मक नहीं, बल्कि क्रांतिकारी बनाया। उनकी कहानियां ‘सद्गति’, ‘ठाकुर का कुआं’, ‘पंच परमेश्वर’, ‘कफन’, ‘नमक का दरोगा’, ‘पूस की रात’, उनके उपन्यास ‘गोदान’, ‘निर्मला’, ‘रंगभूमि’, ‘गबन’ सबमें समाज के सबसे उपेक्षित वर्गों को स्वर दिया गया। उन्होंने चमार, कुर्मी, धोबी, किसान, स्त्री, निम्नवर्गीय शिक्षकों-सभी के दु:ख-दर्द को मानवीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया।
यदि ‘सद्गति’ की बात करें, तो दुखी चमार जैसे पात्र को केंद्र में रखकर प्रेमचंद ने उस ब्राह्मणवादी व्यवस्था की परतें खोलीं, जो एक मृत व्यक्ति को भी सम्मान से दफनाने नहीं देती। क्या इससे बड़ा दलित विमर्श कोई हो सकता है? ‘ठाकुर का कुआं’ में प्रेमचंद की नायिका पानी के लिए उस कुएं पर जाती है, जो तथाकथित ऊंची जातियों का है। यह कहानी केवल पानी की नहीं, ‘अधिकार’ की प्यास की कहानी है। यह स्पष्ट संकेत है उस जातिवादी व्यवस्था के विरुद्ध, जिसने पानी तक को जाति में बांट दिया।
प्रेमचंद: पूर्वज या अपराधी?
आज कुछ साहित्यकार प्रेमचंद पर उंगली उठाते हैं कि उन्होंने ‘दलित पात्रों’ को हीन रूप में चित्रित किया, या जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया। किंतु हमें समझना होगा कि प्रेमचंद ने अपने पात्रों को यथार्थ के धरातल पर उतारा। उन्होंने समाज में व्याप्त भाषा, व्यवहार और दृष्टिकोण को जस का तस प्रस्तुत किया। क्या यही कार्य आज के कई ‘यथार्थवादी फिल्मकार’ नहीं करते? उदाहरण के लिए, ‘कफन’ में घीसू और माधव की अकर्मण्यता और शराब के प्रति आकर्षण को देखकर उन्हें दलित समुदाय का अपमान मानना, प्रेमचंद की रचना को संकुचित दृष्टि से देखना है। प्रेमचंद वहां वर्गीय दृष्टिकोण से लिख रहे हैं-यह गरीबी, विवशता और हताशा की त्रासदी है, न कि जाति की।
क्यों हो रही है प्रेमचंद की आलोचना?
प्रेमचंद की आलोचना करने वाले आज उन्हें केवल ‘जाति के चश्मे’ से देखने का प्रयास कर रहे हैं। समकालीन विमर्श में जो अतिवादी पहचान की राजनीति हावी हो गई है, वह साहित्य को भी उसी कटघरे में खड़ा कर रही है। कुछ लोग साहित्यकारों से यह अपेक्षा कर रहे हैं कि वे आज से सौ वर्ष पहले भी आज के संवैधानिक और वैचारिक सिद्धांतों के अनुसार लिखते। यह न केवल इतिहासबोध की कमी है, बल्कि एक प्रकार का साहित्यिक अधैर्य है, जहां लेखक को वर्तमान दृष्टिकोण से जज किया जाता है, न कि उस कालखंड की सामाजिक संरचना से।
प्रेमचंद: दलित चेतना के पूर्वज
प्रेमचंद को दलित विरोधी कहना उतना ही हास्यास्पद है, जितना महात्मा गांधी को अस्पृश्यता समर्थक कहना। प्रेमचंद ने जब ‘सद्गति’ जैसी कहानी लिखी थी, तब उस विषय को छूने तक से हिंदी साहित्यकार डरते थे। वे पहले लेखक थे, जिन्होंने समाज के निम्नतम वर्ग को नायक बनाया, उनके दु:खों को स्वर दिया और उन पर लिखते समय किसी भी तरह का दया भाव या ‘कॉस्मेटिक करुणा’ नहीं रची। उन्होंने न केवल ‘दलितों’ को विषय बनाया, बल्कि उन पर हुए संस्थागत और धार्मिक शोषण को उघाड़ कर रख दिया। वे वर्णव्यवस्था और ब्राह्मणवाद की आलोचना करते हैं, लेकिन संयमित भाषा में। उनके शब्द क्रांति करते हैं, लेकिन शालीनता से।
प्रेमचंद की वर्तमान प्रासंगिकता
आज जब साहित्य ‘ब्रांडिंग’ और ‘फॉलोअर्स’ की दौड़ में फंस चुका है, जहां लेखक और आलोचक भी विचारधारा से ज्यादा प्रायोजित विमर्शों का हिस्सा बनते जा रहे हैं, प्रेमचंद की सादगी, ईमानदारी और प्रतिबद्धता नई पीढ़ी के लिए एक आदर्श है। उनका साहित्य हमें यह सिखाता है कि साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, समाज का पथप्रदर्शक भी है। वे बिना मंच के लेखक थे, जिन्होंने पाठकों के हृदय में घर बनाया। आज भी ‘गोदान’ का होरी हर गांव में जीवित है। आज भी ‘धनिया’ की पुकार गूंजती है। आज भी ‘सिलिया’ की पीड़ा हमें झकझोरती है।
प्रेमचंद का मूल्यांकन आधुनिक परिप्रेक्ष्य में
हमें यह समझना होगा कि प्रेमचंद को पढ़ने के लिए उनके युग, उनके समाज और उनके लक्ष्य को समझना जरूरी है। उनके पात्र, उनकी भाषा और उनकी दृष्टि, सब कुछ आज के किसी एजेंडा-प्रेरित विमर्श के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। प्रेमचंद को साहित्यिक ईमानदारी और सामाजिक उद्देश्य की कसौटी पर परखें, न कि ट्विटर ट्रेंड या मंचीय नारों की कसौटी पर। जो लोग आज प्रेमचंद की आलोचना करके स्वयं को प्रासंगिक साबित करना चाहते हैं, वे भूल जाते हैं कि प्रेमचंद को न तो पुरस्कारों की आवश्यकता थी, न मंचों की वे पाठकों की संवेदना में अमर हैं। प्रेमचंद आज भी हमारे लिए जरूरी हैं, क्योंकि वह हमें हमारे भीतर का ‘मानव’ याद दिलाते हैं। जब तक यह समाज अन्याय, असमानता और विभाजन से जूझता रहेगा, प्रेमचंद का साहित्य हमारी आत्मा को दिशा देता रहेगा।
(लेखक आचार्य एवं शोध निदेशक, श्री जे.जे.टी. विश्वविद्यालय व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी विचारक है)

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