प्रो. दयानंद तिवारी
िंहदी कविता की परंपरा केवल शब्द-सौंदर्य की परंपरा नहीं रही, बल्कि यह राष्ट्र, समाज, संस्कृति और लोकजीवन की चेतना की वाहक रही है। भारतीय काव्यधारा में कविता ने समय-समय पर समाज को दिशा दी, जनमानस को जागृत किया और राष्ट्रीय अस्मिता को सशक्त किया। यही कारण है कि हिंदी कविता को केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना का माध्यम माना गया। किंतु आज जब हम समकालीन हिंदी कविता को देखते हैं, तो एक गंभीर प्रश्न सामने खड़ा दिखाई देता है कि क्या कविता से राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक संवेदना और लोकचेतना धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है।
यह प्रश्न केवल भावुकता का प्रश्न नहीं, बल्कि साहित्यिक आत्ममंथन का विषय है। आधुनिक हिंदी कविता में प्रयोग, प्रतिरोध और वैचारिक बहसें तो बढ़ी हैं, लेकिन राष्ट्रप्रेम, लोकसंवेदना और सांस्कृतिक आत्मीयता के स्वर अपेक्षाकृत क्षीण होते दिखाई देते हैं। आज की अनेक कविताएं व्यक्ति की निजी व्यथा, शहरी अकेलेपन और बौद्धिक असंतोष तक सीमित होकर रह गई हैं। उनमें भारतीय जनजीवन की व्यापक धड़कन कम सुनाई देती है।
यदि हम हिंदी कविता के पूर्ववर्ती स्वरूप को देखें, तो वहां राष्ट्र केवल राजनीतिक अवधारणा नहीं था, बल्कि जनचेतना का भावात्मक केंद्र था। मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा- ‘हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी,
आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं सभी।’
यह केवल कविता नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय आत्मचिंतन का आह्वान था। गुप्त जी की कविता भारतीय समाज को उसकी ऐतिहासिक चेतना से जोड़ती थी। उसी प्रकार माखनलाल चतुर्वेदी की अमर कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ में राष्ट्रप्रेम का अद्भुत स्वर दिखाई देता है। तभी तो कवि कहता है कि-
‘मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जाएं वीर अनेक।’
इन पंक्तियों में केवल भावुकता नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए समर्पण की सर्वोच्च चेतना दिखाई देती है। यह कविता जनमानस में देशभक्ति का संस्कार जगाती थी।
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविताओं में राष्ट्रीय स्वाभिमान, संघर्ष और जनशक्ति का विराट स्वर मिलता है। उनकी पंक्तियां आज भी चेतना को झकझोरती हैं।
‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।’
दिनकर की कविता सत्ता से प्रश्न भी करती है और जनता के आत्मविश्वास को भी जगाती है। वहीं सोहनलाल द्विवेदी की कविता में राष्ट्र की सामूहिक ऊर्जा दिखाई देती है।
‘चल पड़े जिधर दो डग मग में,
चल पड़े कोटि पग उसी ओर।’
इन कविताओं में राष्ट्र केवल एक राजनीतिक सीमा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और भावनात्मक एकता और अखंडता का प्रतीक था। लोकचेतना की दृष्टि से भी पूर्ववर्ती हिंदी कविता अत्यंत समृद्ध थी। नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल और अदम गोंडवी जैसे कवियों ने गांव, किसान, मजदूर और आम जनजीवन को कविता का केंद्र बनाया। नागार्जुन की कविताओं में जनता की पीड़ा प्रत्यक्ष दिखाई देती है। अदम गोंडवी ने लिखा, ‘काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास में,
उतरा है रामराज विधायक निवास में।’
यह व्यंग्य केवल व्यवस्था पर प्रहार नहीं, बल्कि लोकजीवन की वेदना की अभिव्यक्ति है। इन कविताओं में जनता बोलती थी, समाज की धड़कन सुनाई देती थी। इसके विपरीत समकालीन कविता का एक बड़ा हिस्सा आम जनमानस से दूर होता जा रहा है। कविता अत्यधिक बौद्धिक, प्रतीकात्मक और सीमित वर्ग की भाषा बनती जा रही है। उसमें भारतीय गांवों की मिट्टी की गंध कम होती जा रही है। लोकभाषाएं, लोकगीत, पर्व-परंपराएं और सांस्कृतिक स्मृतियां धीरे-धीरे कविता के केंद्र से हटती जा रही हैं। परिणाम यह हुआ कि कविता और समाज के बीच दूरी बढ़ी है। आज ‘राष्ट्र’ शब्द को भी अनेक बार संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। राष्ट्रप्रेम को संकीर्णता से जोड़ देना साहित्यिक दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। भारतीय राष्ट्र की अवधारणा राजनीतिक आग्रह से कहीं अधिक सांस्कृतिक एकता पर आधारित रही है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ जैसे सूत्र भारतीय राष्ट्रचेतना की व्यापकता को व्यक्त करते हैं। यदि कविता राष्ट्रबोध से ही विमुख हो जाएगी, तो वह समाज की सामूहिक आत्मा से भी कट जाएगी।
इसी प्रकार भारतीय संस्कृति के प्रश्न को भी समकालीन कविता में अपेक्षित स्थान नहीं मिल रहा। भारतीय संस्कृति केवल परंपराओं का संग्रह नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों की धारा है। करुणा, सह-अस्तित्व, परिवार, प्रकृति, अध्यात्म और लोकमंगल की चेतना। आज उपभोक्तावाद और वैश्वीकरण के प्रभाव में परिवार टूट रहे हैं, सामाजिक संबंध कमजोर हो रहे हैं, लेकिन कविता में इन प्रश्नों पर गंभीर सांस्कृतिक दृष्टि अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।
यह कहना उचित नहीं होगा कि समकालीन कविता में पूरी तरह शून्यता है। अनेक कवि आज भी राष्ट्र, संस्कृति और लोकजीवन के प्रश्नों पर लिख रहे हैं। किंतु यह स्वर मुख्यधारा में उतन्ाी शक्ति से उपस्थित नहीं है, जितनी आवश्यकता है। साहित्य का दायित्व केवल विखंडन या प्रतिरोध नहीं, बल्कि समाज को जोड़ना और दिशा देना भी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी कविता पुन: भारतीय जनजीवन की मिट्टी से जुड़े। आधुनिकता का स्वागत हो, प्रयोग भी हों, लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों से विच्छेद न हो। कविता में राष्ट्र की आत्मा, लोकजीवन की धड़कन और भारतीय संस्कृति की सुगंध पुन: स्थापित करनी होगी। यदि साहित्य समाज की चेतना है, तो उसे समाज की मूल आत्मा से दूर नहीं होना चाहिए।
वास्तव में कविता तभी दीर्घजीवी होती है जब उसमें समय के साथ-साथ सभ्यता की स्मृति भी जीवित रहे। हिंदी कविता की महान परंपरा हमें यही सिखाती है कि साहित्य केवल शब्दों का कौशल नहीं, बल्कि समाज के आत्मबोध का सबसे सशक्त माध्यम है। आज समकालीन हिंदी कविता को पुन: उसी लोकमंगल, राष्ट्रचेतना और सांस्कृतिक आत्मीयता की ओर लौटने की आवश्यकता है, जिससे उसकी जड़ें जुड़ी हुई हैं।
