मुख्यपृष्ठस्तंभसटायर: असली जेन-जी हम हैं

सटायर: असली जेन-जी हम हैं

-डाॅ. रवीन्द्र कुमार

आजकल जो है सो ज़ेन-जी का बहुत बोलबाला है। जित देखो तित ज़ेन-जी के धमाल का शोर है। उन्ही की चर्चा हो रेली है। ऐसे में मेरा और मेरे जैसे अन्य असली खालिस ज़ेन-जी का परेशान होना, ‘नैगलेक्टड फील’ करना ‘बट-नैचुरल’ है। यह तो ‘कूल’ नहीं। आगे दो-चार लाइन्स में ही मैंने ‘प्रूव’ कर देना है। देखिये! मैं और मेरे जैसे रिटायर्ड लोगों को ‘एक्स’ क्यों कहते हैं। बोले तो ! ये जो भी भूतपूर्व हैं उन्हें ‘एक्स’ कहा जाता है। रिटायर होने के पाँच-दस साल तलक आप ‘वाई’ समझते और कहलाते हो। अब इस ‘वाई’ के अनेक अर्थ हैं। जैसे अपने को अभी भी ‘वाई’ से यंग समझना। यूथ समझना। वैसे ही टाइट टी-शर्ट पहन कर
चहल-कदमी करना। घर में भी ये ‘वाई’ वाले सबको टोकते-रोकते हैं। कोई बात हो इनकी ज़ुबान पर ‘वाई’ (क्यों) रहता है। बात-बात में बल्कि हर बात में ‘वाई’ (क्यों) इसकी क्या ज़रूरत है? पंखा क्यों चल रहा है? ए.सी. बंद क्यों नहीं किया? ये इतना महंगा खरीदने की क्या ज़रूरत? इन शॉर्ट ! सब जगह ‘वाई’ (क्यों-क्यों) का ग़दर मचाये रखते हैं। लेकिन ये ज्यादा नहीं चलता।
दस साल बाद यानि की जब आप सत्तर के लपेटे में आ जाते हो तो आप असली ‘ज़ेड’ तक आन पहुँचते हैं। देखिये जब आप रिटायर हो गए तब से आप ‘अल्फाबेट’ के ‘एक्स’ हो जाते हो। उसके दस साल तलक आप ‘वाई’ रहते हो और फिर अंग्रेजी वर्णमाला के आखिरी ‘अल्फाबेट’ ज़ेड तक आ जाते हो। बस उसके बाद कभी भी चला-चली की वेला रहती है। अब आप ना ‘एक्स’ हैं ना ‘वाई’। अब आप ‘ज़ेड’ हो। इसीलिए मैं हुआ आप हुए (अगर आप सत्तर के ऊपर के हो) इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप ‘अर्ली सेवेंटीज़’ में हो या ‘लेट सेवेंटीज़’ में आप हो तो ज़ेन-जी ही।
अब आप समझे! मैं क्यों अपने को और अपने जैसे ‘स्वीट सेवेंटी’ वाले सभी लोग को ज़ेन जी कहता-समझता हूं। असली ‘ज़ेन-जी’, खालिस ‘ज़ेन-जी’। आप बिंदास हैं क्यों कि आपके पास खोने को कुछ नहीं। आप तो वैसे ही ‘डिपार्चर-लाउंज’ में बैठे हैं। न जाने कब आपकी फ्लाइट एनाउंस हो जाए। अकबर इलाहाबादी का एक शेर है:
उन किताबों को हम काबिले-जब्ती समझते हैं जिन्हें पढ़ कर बेटे बाप को खब्ती समझते हैं
अब इसमें दो बातें हैं। पहली तो ये कि अकबर
इलाहाबादी अब रहे नहीं। नहीं तो पता नहीं वो अपना नाम अकबर प्रयागराजी कहलाना पसंद करते क्या? दूसरा, ये कि अगर बेटे (बेटी इन्क्लुडिड) बाप को खब्ती समझते हैं तो ‘डेफ़िनिटली’ ज़्यादातर बाप निश्चय ही खब्ती हैं। खब्ती इंसान अव्वल तो लॉजिक से काम लेता नहीं। वह अपने पूर्वाग्रहों से बुरी तरह ग्रस्त रहता है। दूसरे उनकी बहुत ‘स्ट्रॉंग लाइक्स’ और ‘डिसलाइक्स’ रहती हैं। देखिये कुछ भी बड़ा करने को जुनून चाहिए। मेरा सत्तर वालों से अनुरोध है कि आप अपने आप को कम न समझें। आप ‘सतर्क’ हैं। आप असली के ज़ेन-जी हैं। आपकी ‘नाॅलिज़ वास्ट’ है। तजुर्बा तो विशाल है ही। एक सीरियल आता था दूरदर्शन पर ‘हम लोग’ उसमें लाजो जी (मुख्य पात्र) एक संवाद अपने बच्चों को कहती है “मैं तब की मॉडर्न हूँ जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे”

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