मुख्यपृष्ठस्तंभविशेष : मेरी झोपड़ी के भाग्य खुल जाएंगे, राम आएंगे...

विशेष : मेरी झोपड़ी के भाग्य खुल जाएंगे, राम आएंगे…

धनंजय रामकृष्ण शिंदे

‘मेरी झोपड़ी के भाग्य खुल जाएंगे, राम आएंगे…’ लेकिन इस पंक्ति को अगर किसी ने सबसे ज्यादा गंभीरता से लिया है, तो वे अयोध्या में देश की करोड़ों जनता द्वारा दिए गए दान और चढ़ावे की चोरी करने वाले हैं!
‘मेरी झोपड़ी के भाग्य खुल जाएंगे, राम आएंगे…’ यह महज एक भजन नहीं था। यह करोड़ों हिंदुओं की श्रद्धा, विश्वास और उम्मीद का प्रतीक था। प्रभु श्रीराम के आगमन की खुशी में लाखों भक्तों ने तन, मन और धन से अपना योगदान दिया। किसी ने अपनी पेंशन से दान दिया, किसी ने अपनी मजदूरी के पसीने की कमाई अर्पित की, तो किसी ने अपने परिवार द्वारा सालों से सहेजकर रखे गए सोने-चांदी के सिक्के श्री राम के चरणों में समर्पित कर दिए। उन्हें पूरा भरोसा था कि उनका यह अर्पण सीधे प्रभु के चरणों तक पहुंचेगा।
लेकिन आज अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में दान और चढ़ावे की कथित चोरी और करोड़ों की वित्तीय अनियमितता (घोटाला) सामने आ रही है, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद के बड़े नेताओं और प्रधानमंत्री मोदी द्वारा नियुक्त किए गए लोगों की संलिप्तता दिखाई दे रही है। इस मामले की जांच जारी है और अंतिम सच अदालती व जांच प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा। परंतु आज पूरे देश के सामने एक अत्यंत गंभीर सवाल खड़ा हो गया है,अगर भगवान के घर का दान ही सुरक्षित नहीं है, तो फिर सुरक्षित क्या है?
इस पूरे मामले में सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि जिन्होंने सालों तक ‘प्रभु श्रीराम’ के नाम पर राजनीति की, खुद को रामभक्त और रामराज्य का सबसे बड़ा पैरोकार बताकर पेश किया, उन्हीं के कार्यकाल में राम मंदिर के दान और चढ़ावे पर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं। क्या रामराज्य का आदर्श यही है? भगवान श्री राम ने अपने पिता के वचन के लिए राजसिंहासन का त्याग कर दिया था। उन्होंने सत्ता से ऊपर सत्य को और स्वार्थ से ऊपर कर्तव्य को प्राथमिकता दी। उन्होंने कभी भी अपने नाम का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं किया।
परंतु आज ऐसा परिदृश्य दिख रहा है कि कुछ लोगों ने श्रीराम को श्रद्धा का नहीं, बल्कि राजनीति और फंड इकट्ठा करने का जरिया बना लिया है। यह सिर्फ पैसों की चोरी नहीं है; यह देश के करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास की चोरी है। अपनी हैसियत से बढ़कर दान करने वाले गरीब भक्तों के त्याग का यह अपमान है। सालों से देश को नैतिकता, संस्कृति और ईमानदारी का पाठ पढ़ाने वालों के आचरण पर ही आज सवालिया निशान लग गए हैं।
क्या वाकई होगी निष्पक्ष जांच?
इस मामले में सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय जांच होगी? क्या दोषियों की पहचान उनके पद, रसूख या राजनीतिक रपट को दरकिनार कर की जाएगी? मंदिर की दान व्यवस्था में इतनी बड़ी चूक वैâसे हुई, क्या इसका जवाब देश को मिलेगा? और सबसे महत्वपूर्ण बात, क्या जवाबदेही तय की जाएगी? आज जरूरत राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों की नहीं; जरूरत पूरी पारदर्शिता की है। राम मंदिर किसी पार्टी, सरकार या संस्था की निजी जागीर नहीं है। यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था का पवित्र केंद्र है। इसलिए वहां का हर एक लेन-देन सार्वजनिक विश्वास का विषय है।
जो लोग सालों से दूसरों से राष्ट्रवाद, संस्कृति, नैतिकता और ईमानदारी का सर्टिफिकेट मांग रहे थे, आज उनके खुद के नैतिक मूल्यों की अग्निपरीक्षा है। अगर उन्हें सचमुच श्री राम के आदर्शों पर विश्वास है, तो उन्हें सबसे पहले निष्पक्ष जांच, सार्वजनिक जवाबदेही और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग करनी चाहिए।
मौन धारण या विश्वासघात?
क्योंकि श्रीराम का नाम सिर्फ चुनावी नारों के लिए नहीं है। श्री राम सत्य, मर्यादा, न्याय और जवाबदेही के प्रतीक हैं। अगर श्री राम के मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे की सुरक्षा पर सवाल उठने के बावजूद सत्ताधारी मौन साधे रहेंगे, तो यह सिर्फ एक प्रशासनिक विफलता का मामला नहीं होगा; इसे देश की सामूहिक आस्था के साथ किया गया सबसे बड़ा विश्वासघात माना जाएगा।
प्रभु श्रीराम के नाम पर राजनीति करने वाले लोग इस कथित कलंक को भी क्या उतनी ही गंभीरता से देखेंगे? या फिर ‘मेरी झोपड़ी के भाग्य खुल जाएंगे, राम आएंगे…’ इस पंक्ति का कुछ लोगों ने यह अर्थ निकाल लिया कि ‘राम आएंगे और हमारी ही तिजोरियां भर जाएंगे!’… राम की सबसे बड़ी पूजा केवल भव्य मंदिर का निर्माण करना नहीं है; बल्कि उनकी मर्यादा, ईमानदारी और न्याय के मूल्यों की रक्षा करना है।
जय सीता राम!

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