मुख्यपृष्ठस्तंभसंडे स्तंभ : आज तक उलझी है राजाबाई टॉवर मिस्ट्री

संडे स्तंभ : आज तक उलझी है राजाबाई टॉवर मिस्ट्री

विमल मिश्र
राजाबाई क्लॉक टॉवर मुंबई ही नहीं, देश की सबसे सुपरिचित इमारतों में से है। तकरीबन सवा सौ साल पहले इससे गिरकर देश के प्रसिद्ध औद्योगिक घराने की दो युवतियां अपनी जान गवां बैठी थीं, जिससे मुंबई में विकराल जनाक्रोश उबल पड़ा था। अपराधों के जो अनसुलझे मामले भारत का स्कॉटलैंड यार्ड कहलाने वाली मुंबई पुलिस की फाइलों में दफन हैं, राजाबाई टॉवर मिस्ट्री उनमें सबसे पुराने मामलों में से है।

मुंबई बंदरगाह में प्रवेश करते हुए दूर से ही यह कद्दावर इमारत दिखाई देती है। अपोलो बंदर के अगाध विस्तार पर तब तक गेटवे ऑफ इंडिया का उदय नहीं हुआ था। मुंबई के स्काईलाइन पर फोर्ट का राजाबाई क्लॉक टॉवर ही छाया होता था-शहर की सबसे ऊंची इमारत। जाने-माने धनिक और मुंबई शेयर बाजार के प्रवर्तक प्रेमचंद रायचंद की मातृभक्ति की अनुपम मिसाल, जिन्होंने इस टॉवर के निर्माण के लिए दो लाख रुपए दिए ही इस शर्त पर थे कि उसका नाम उनकी मां के नाम पर रखा जाएगा।
राजाबाई टॉवर तमाम प्रेम कहानियों का प्रणय स्थल रहा तो इससे कुछ बुरी यादें भी जुड़ी रहीं। मसलन, जीवन से दु:खी और सताए हुए लोगों द्वारा इस पर से कूदकर आत्महत्या करना। इनमें सबसे चर्चित रहा सवा सौ साल से भी पहले हुआ एक हादसा, जिसमें शहर के जाने-माने धनी घराने की दो सुंदर युवतियां टॉवर से गिरकर मौत के मुंह में समा गई थीं। भारत ही नहीं, ब्रिटिश संसद में भी बहस का विषय बनी रही ये मौतें दुर्घटना की वजह से थीं या हत्या का परिणाम यह बात आज तक रहस्य के घेरे में है। मुंबईवासी न तो इसकी पुलिस जांच से संतुष्ट हुए, न अदालत के फैसले से और विरोध में सड़कों पर उतर आए।
२५ अप्रैल, १८९१ को शाम चार बजे के आस-पास का वक्त। मुंबई विश्वविद्यालय की कक्षाएं छूटने के बाद विद्यार्थी और शिक्षक घर की राह पर थे। सामने के उद्यान में कुछ कर्मचारी पौधों की साज-संभाल में लगे थे कि अचानक धड़ाम के शोर के साथ टॉवर से कुछ नीचे गिरा। भागकर देखा तो लहूलुहान दो कम उम्र युवतियां। आस-पास की जमीन खून से लथपथ थी और युवतियों की पर छाती, पैर व गर्दन पर नाखूनों की खरोंच के निशान, मानो किसी ने उनसे जबर्दस्ती करने की कोशिश की हो। घटना ने तूल इसलिए भी पकड़ा क्योंकि दोनों ही युवतियां शहर के मशहूर पारसी गोदरेज घराने की थीं। २० वर्ष की बचुबाई गोदरेज एंड ब्रदर्स के संस्थापक आर्देशिर गोदरेज की पत्नी थीं, जबकि १६ वर्षीया फिरोजबाई, उर्फ पीलू कामदिन उनकी बहन। फिरोजबाई बचुबाई की तरह ही विवाहिता थीं, हालांकि ससुराल नहीं गई थीं।
राज छिपाने की साजिश
जिस तरह का हाई प्रोफाइल केस यह था पुलिस तुरंत छानबीन में लग गई। यूनिवर्सिटी के कर्मचारी गंगाजी हीराजी व हेमचंद कचारा के साथ दो बच्चों और आत्माराम बाबाजी सहित कई लोगों ने अपराह्न में दोनों युवतियों को लगभग २०० सीढ़ियां चढ़कर क्लॉक टॉवर की गैलरी में प्रवेश करते देखा था। मूलकभाय मानिकभाय, सैयद लाल व प्रभाशंकर समेत कई लोग तो घटना के समय टॉवर के ऊपर ही मौजूद थे। पुलिस ने घटनास्थल पर मौजूद मानेकजी असलजी नामक युवक को बलात्कार व हत्या का आरोप लगाते हुए गिरफ्तार कर लिया। उस समय वहां मौजूद मेसर्स कानराय एंड ब्राउन सालिसिटर्स फर्म में कार्यरत क्लर्क इंटी ने पुलिस को बताया कि मैंने टॉवर की दूसरी मंजिल पर इन युवतियों का दो लोगों के साथ झगड़ा होते हुए देखा था। मानेकजी ने बीच-बचाव की कोशिश की, जिसमें उसका कोट फट गया था। विश्वविद्यालय शिक्षक चार्ल्स शोन के साथ रतनजी आगा व भगवानदास रणछोड़दास भी इस घटना के चश्मदीद गवाह थे।
बाद में जो बयान आए उनसे मामला उलझता ही गया। मानेकजी के नौकर बाला ने बयान दिया कि उसका मालिक जब विक्टोरिया से घर लौटा तो साथ में उसका एक दोस्त भी था, जो बहुत परेशान दिख रहा था। दोनों के कोट फटे थे, जिसे उसने लांड्री बास्केट में डाल दिया था। पुलिस जब पूछताछ करने के लिए मानेकजी के घर पहुंची तो उसने कपड़ों का राजाबाई टॉवर मामले से कनेक्शन का अनुमान लगाते हुए उनका बंडल बनाया और उसे एक खोजा अहमद थूर को पांच रुपए में बेचने का प्रयास किया। कपड़ों की जांच पर थूर को एक कोट की जेब से पेंसिल से लिखी एक चिट मिली, जिस पर लिखा था, ‘नैंसी पेरू व सेठ नूर मोहम्मद सुलेमान के लिए – आप शाम तीन बजे राजाबाई टॉवर आओ, ३० रुपए लेकर। चिट्ठी के धारक को एक रुपया दे दो।’ थूर ने बंडल पड़ोस में रहनेवाले मारवाड़ी व्यापारी को बेच डाला और बंडल की एवज में कुछ समय बाद बाला को पांच रुपए दिए। अगले दिन बाला ने थूर को बताया कि अगर उसके पास बंडल होता तो वह मानेकजी को ब्लैकमेल कर सकता था।
गुजराती अखबार ‘जाम-ए-जमशेद’ के संपादक जहांगीर बी. मर्जबान ने थूर से ये बातें सुनकर मामले की जांच कर रहे अधिकारी फरामजी को बता दीं। बाला गिरफ्तार कर लिया, लेकिन बंडल खरीदने वाला व्यापारी को गायब होने का मौका मिल गया, क्योंकि पुलिस ने उसके यहां जाने में ५६ घंटे फिजूल कर डाले थे।
पुन: जांच की याचिका
गिरफ्त्ाार लोगों पर सेशन कोर्ट में मुकदमा चला। १४ जुलाई को सबूतों को अपर्याप्त बताते हुए अदालत ने मानेकजी को रिहा कर दिया। मुंबई वासी इस निर्णय से उबल पड़े। दो बार में करीब एक लाख लोगों ने भारत सरकार को अर्जी देकर पुलिस सुपरिटेंडेंट मैक डारमोट पर मानेकजी से पांच हजार रुपए की रिश्वत लेकर मामला रफा-दफा करने और पुलिस अमले पर लापरवाही करने और भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए मामले की पुन: शुरू से जांच की मांग की। आत्महत्या की संभावना को मनगढ़ंत बताते हुए आर्देशिर गोदरेज ने कहा कि दोनों युवतियों के पास इसका कोई कारण नहीं था।
पुलिस के अनमनेपन पर मुंबई के लोगों ने जब अपने तईं तफ्तीश की तो मामले में बहुत से झोल निकले। बचुबाई का चश्मा, हेड ड्रेस, धार्मिक धागा व कुस्ती कहां गायब हो गए, अंत तक पता नहीं चला। युवतियों के शवों का पोस्टमार्टम करनेवाले सरकारी कोरोनर सिडनी स्मिथ ने पूर्व बयान बदलते हुए डॉक्टरों के उस पैनल से असहमति दिखाई, जिसने यौन हमले का की आशंका बताई थी। उसका तर्क था उन दोनों की छातियों पर मौजूदा खरोंच के निशान और फिरोजबाई की फटी हुई सलवार सड़क पर बिछी बजरी, पत्थर आदि और उनके बेस्टकोट में लगे चांदी के बटनों की वजह से थी। पुलिस ने शोन, इंटी, आगा, थूर व भगवानदास रणछोड़दास को शत्रुतापूर्ण गवाह करार दे दिया। विक्टोरिया चालक धनसिंह और दो खोजा गवाहों के बयान पूरी तरह से काल्पनिक और अविश्वसीय बताते हुए बिलकुल दरकिनार कर दिए गए।
अपराध के जो अनसुलझे केस मुंबई पुलिस की फाइलों में दफन हैं, राजाबाई टॉवर मिस्ट्री उनमें सबसे पुराने मामलों में से है। अस्पष्ट बयानों, दोषपूर्ण फॉरेंसिक डेटा और पलट जाने वाले गवाहों के कारण यह सनसनीपूर्ण घटना आज तक रहस्य बनी हुई है। आज तक किसी को पक्का नहीं मालूम कि २५ अप्रैल, १८९१ को आखिर हुआ क्या था?
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर
संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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