मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : वक्फ संशोधन और नाराज मुसलमान

इस्लाम की बात : वक्फ संशोधन और नाराज मुसलमान

सैयद सलमान, मुंबई

अक्टूबर २०२५ के वक्फ संशोधन अधिनियम को लेकर सुप्रीम कोर्ट का हालिया अंतरिम आदेश मुसलमानों के बीच एक महत्वपूर्ण विमर्श लेकर आया है। इस कानून के खिलाफ मुस्लिम समुदाय में व्यापक असंतोष व्याप्त है। विशेषत: ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसे अधूरा और असंतोषजनक करार दिया है। कोर्ट ने कानून के कुछ विवादास्पद प्रावधानों पर रोक लगाई है जैसे कलेक्टर को विवादों का निपटारा करने का अधिकार और संपत्ति को वक्फ घोषित करने के लिए ‘पांच वर्ष तक इस्लाम प्रैक्टिस’ की शर्त को निलंबित किया है, लेकिन पूरी तरह से कानून को निरस्त नहीं किया गया है। इस वजह से मुस्लिम समाज के कई संगठन इस न्यायिक आदेश से संतुष्ट नहीं हैं।
मतभेद और समाधान
मुस्लिम समुदाय की नाराजगी कई बिंदुओं पर केंद्रित है। प्रमुख चिंता ‘वक्फ बाय यूजर’ प्रावधान के बने रहने को लेकर है, जो पुराने धार्मिक अभ्यास के आधार पर वक्फ संपत्तियों को मान्यता देता है, लेकिन नया कानून इसमें बदलाव ला रहा है। इसके अलावा वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यता की संख्या निर्धारित करने का विवाद भी है। मुस्लिम समाज का तर्क है कि वक्फ एक इस्लामिक संस्थान है इसलिए इसका प्रबंधन मुसलमानों के अधिकार क्षेत्र में होना चाहिए इसीलिए गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति पर सख्ती अपेक्षित है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दिशा में कुछ हद तक मुस्लिम पक्ष की बात को माना है, लेकिन पूरी संतुष्टि नहीं मिली है।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के पैâसले को ‘आंशिक राहत’ कहा है और इसे अधूरा मानते हुए आंदोलन जारी रखने की घोषणा की है। उनका मानना है कि यह कानून मुस्लिम समुदाय की धार्मिक संस्था वक्फ की संपत्तियों को कमजोर करने का प्रयास है और भविष्य में वक्फ संपत्तियों का नियंत्रण सरकार के हाथ में न जाने देना जरूरी है। दूसरी ओर जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे संगठन सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश का स्वागत कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि कोर्ट ने संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मुद्दों पर उचित नियंत्रण दिया है। इस मिश्रित प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट है कि मुस्लिम समाज के भीतर भी इस विषय पर विचार-विमर्श और मतभेद मौजूद हैं।
वैचारिक और कानूनी दृष्टिकोण से यह जरूरी है कि मुस्लिम समाज इस मसले पर सजग और सतर्क बना रहे। वक्फ संपत्तियां न सिर्फ धार्मिक संस्थाओं की नींव हैं, बल्कि सामाजिक कल्याण के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में पहली प्राथमिकता होगी कानूनी प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी, ताकि न्यायपालिका को सही और विस्तृत जानकारी पहुंचाई जा सके। इस मुकदमे में संवैधानिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक निष्पक्षता तीनों की रक्षा जरूरी है। मुस्लिम संगठनों को यह समझना होगा कि विरोध-प्रदर्शन के साथ-साथ कानूनी रणनीति भी मजबूत होनी चाहिए, जिसमें विशेषज्ञ कानूनी सलाह और व्यापक संवाद शामिल हो।
भौतिक अधिकार ही नहीं
साथ ही यह भी जरूरी है कि मुस्लिम समाज एकजुट होकर विवादों को सार्वजनिक रूप से सही तथ्यों के साथ अवाम को समझाए। किसी भी भावनात्मक प्रतिक्रिया से बचते हुए न्यायपालिका और सरकार के समक्ष अपने तर्कों को मजबूती से प्रस्तुत किया जाना चाहिए। यह भी समझना होगा कि कानून पूरी तरह से रद्द होने की संभावना दुर्लभ है, इसलिए संशोधन या सुधार की मांग के लिए नियम और कानून के दायरे में ही लड़ाई लड़नी होगी। विवादास्पद प्रावधानों पर कानूनी रोक का फायदेमंद उपयोग करते हुए विस्तार से अपनी बात रखने का अवसर भी तलाशना होगा।
इस पूरे प्रसंग में मुस्लिम समाज को संयम से काम लेना होगा, ताकि धर्म और कानून के रिश्ते को एक सकारात्मक मॉडल के रूप में स्थापित किया जा सके। धार्मिक स्वतंत्रता का संरक्षण लोकतंत्र की स्थिरता के लिए आवश्यक है और यह तभी संभव है जब संवाद और कानून दोनों के प्रति सम्मान बना रहे। वक्फ समितियों और बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्यों की उपस्थिति जैसे संवेदनशील विषयों पर सहमति बनाने की कोशिश भी चलनी चाहिए, लेकिन यह प्रक्रिया न्याय और समुदाय की अस्मिता का उल्लंघन न करे।
संक्षेप में कहें तो वर्तमान सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के खिलाफ मुसलमानों की नाराजगी स्वाभाविक है, क्योंकि वे बदलावों को अपनी धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं पर आक्रमण समझते हैं। लेकिन कानूनी प्रक्रिया को अपना हथियार बनाते हुए विचार-विमर्श और एकजुटता के साथ आगे बढ़ना ही समाधान का रास्ता है। मुस्लिम समाज को चाहिए कि वे निष्पक्षता, तर्कसंगत कदम और संवैधानिक अधिकारों के दायरे में रहकर इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर आगे बढ़ें, ताकि वक्फ संपत्तियों का संरक्षण भी हो और समाज का विश्वास भी प्रणाली में बना रहे।
यह लड़ाई केवल धार्मिक सौहार्द की रक्षा की नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद २५ और २६ के तहत किसी भी धर्म को अपनी आस्था और रीति-रिवाजों के पालन का मौलिक अधिकार सुनिश्चित कराने की भी है। अत: मुसलमानों का कानूनी नजरिया साफ, स्थिर और सक्रिय होना आवश्यक है, ताकि वे अपने अधिकारों के साथ-साथ लोकतंत्र में अपनी हिस्सेदारी को भी दृढ़ता से जता सकें।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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