यक्ष प्रश्न मैं करता हूं सुनकर ध्यान लगा लेना
मां सरस्वती की स्मृति कर अक्षरश: अपना लेना
क्यों भूल रहे हम गुरु गरिमा, क्यों देते हैं खुद को चकमा
जीवन अर्पित जब ज्ञान-दान दिखलाओ अपनी महिमा
चिंतन करना भूल गए या अपनी राह से भटक गए
नवाचार के दिग्गज तुम गुरुमंत्र सिखाओ नए-नए
याद करो सांदीपनि को उन शिष्यों के अपनेपन को
मन अर्पित गुरु चरणों में काया छोड़ी गुरु सेवा को
गुरु वशिष्ट के शिक्षण की क्या गौरव गाथा याद नहीं
द्रोण के शिक्षा-दीक्षा की तनिक न मन पर छाप नहीं
हे आशाओं के दीप पुंज चाणक्य तुम्हें ललकार रहा
कोस रहे जो तुम्हें आज करो चमत्कृत सिखा रहा
शिक्षक स्वरूप में आजाओ जगजननी की है अभिलाषा
तुम गढ़ दो ऐसी प्रतिभाएं डिजिटल युग की जैसी आशा
हे सरस्वती के वरद पुत्र तुमने सब कुछ कर दिखलाया
गणना चुनाव और ग्राम्य सभा संपन्न कुशल कर बतलाया
कर्तव्य मूल में प्रश्न चिन्ह क्यों और कैसे आज बने
निर्माण राष्ट्र का करने में क्यों जनमत के नैराश्य बने
मौन बना शिक्षा पर जो उस शासन ने मुंह खोला है
शिक्षा शिक्षार्थी हितार्थ विद्वानों ने कुछ बोला है
शिक्षा पर बनी नई पोथी उस पोथी पर विश्वास करो
शिक्षा शिक्षार्थी चिंतन में जो सोच उसी की डगर भरो
लो मान चुनौती डट जाओ यह अवसर कभी न आएगा
सम्मान सफलता पाने का इतिहास अमिट बन जाएगा।
-बच्चू लाल दीक्षित, शिक्षक
ग्वालियर, मध्य प्रदेश
