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प्रयागराज में चुनावी बिसात बिछनी शुरू…मुद्दों की धार पर सियासी संग्राम…किसके पक्ष में बनेगा माहौल?

राजेश सरकार / प्रयागराज

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन प्रयागराज की राजनीतिक सरगर्मी बता रही है कि सभी प्रमुख दल चुनावी मोड में आ चुके हैं। बूथ से लेकर गांव और शहर तक संगठन मजबूत करने, जातीय समीकरण साधने और जनभावनाओं को प्रभावित करने की कवायद तेज हो गई है।
इस बार नीट पेपर लीक, छात्रों के आंदोलन, राम मंदिर चढ़ावा विवाद, बेरोजगारी, महंगाई और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे सियासी विमर्श के केंद्र में हैं। विपक्ष इन्हें सरकार की जवाबदेही से जोड़कर जनता के बीच ले जा रहा है, जबकि भाजपा संगठन, सरकार के कामकाज, विकास और कानून-व्यवस्था को अपनी सबसे बड़ी ताकत के रूप में पेश कर रही है।
प्रयागराज की राजनीति हमेशा से प्रदेश की दिशा तय करने वाले जिलों में मानी जाती है। यहां शहरी और ग्रामीण मतदाताओं का मिश्रण, ब्राह्मण, पिछड़ा, दलित और मुस्लिम मतदाताओं का प्रभाव तथा छात्र राजनीति चुनावी परिणामों को प्रभावित करती है। यही वजह है कि सभी दल प्रयागराज को विशेष महत्व दे रहे हैं।
भाजपा का सबसे बड़ा दांव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार की कानून-व्यवस्था, एक्सप्रेस-वे, बुनियादी ढांचे, निवेश, धार्मिक पर्यटन और लाभार्थी योजनाएं हैं। पार्टी बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने और लाभार्थियों से सीधे संवाद पर जोर दे रही है। हालांकि नीट पेपर लीक और राम मंदिर चढ़ावा विवाद जैसे मुद्दों पर विपक्ष के हमलों का जवाब देना भी भाजपा के लिए चुनौती बना हुआ है।
समाजवादी पार्टी प्रयागराज में युवाओं, छात्रों तथा पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग को जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी नीट पेपर लीक, रोजगार, महंगाई और राम मंदिर चढ़ावा विवाद को प्रमुख चुनावी मुद्दा बना रही है। सपा का मानना है कि यदि युवा और छात्र उसके साथ मजबूती से जुड़े, तो चुनावी मुकाबला और रोचक हो सकता है।
कांग्रेस छात्र आंदोलनों, किसानों, महंगाई और संविधान जैसे मुद्दों को लेकर सक्रिय है। हालांकि संगठनात्मक मजबूती अभी भी उसके सामने बड़ी चुनौती है। प्रयागराज में कांग्रेस का पारंपरिक आधार मौजूद है, लेकिन उसे वोट में बदलना आसान नहीं होगा।
बहुजन समाज पार्टी भले ही आक्रामक राजनीतिक गतिविधियां कम करती दिख रही हो, लेकिन दलित वोट बैंक को फिर से एकजुट करने की कोशिश जारी है। यदि बसपा कुछ सीटों पर प्रभावी प्रदर्शन करती है, तो मुकाबले के समीकरण बदल सकते हैं।
प्रयागराज में कौन-से मुद्दे असर डालेंगे?
* युवाओं में रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता।
* किसानों की आय और सिंचाई संबंधी समस्याएं।
* शहर में ट्रैफिक, जलभराव और आधारभूत सुविधाएं।
* गंगा-यमुना किनारे विकास परियोजनाओं का प्रभाव।
* कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा।
* जातीय और सामाजिक समीकरण।
* धार्मिक आस्था और उससे जुड़े विवाद।
किसकी राह आसान?
फिलहाल प्रयागराज में भाजपा संगठनात्मक रूप से सबसे मजबूत दिखाई देती है, जबकि समाजवादी पार्टी विपक्ष की मुख्य चुनौती बनकर उभर रही है। कांग्रेस और बसपा की भूमिका कई सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय बना सकती है। हालांकि अभी चुनाव में समय है और उम्मीदवारों के चयन, स्थानीय नाराजगी, संभावित गठबंधन तथा चुनावी मुद्दों के आधार पर तस्वीर बदल सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रयागराज में इस बार केवल जातीय गणित ही नहीं, बल्कि युवाओं, छात्रों और स्थानीय मुद्दों पर जनता का रुख भी परिणाम तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। चुनावी माहौल बनने के साथ यह जिला एक बार फिर प्रदेश की सबसे चर्चित राजनीतिक रणभूमि बनने की ओर बढ़ रहा है।

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