गुरुवार आधी रात को सोनम वांगचुक ने २६ दिनों का अनशन समाप्त किया। जिस सरकार के खिलाफ वांगचुक ने अनशन का हथियार उठाया था, उसी सरकार के हाथों ‘सूप’ का कप मुंह से लगाकर उन्होंने अपना उपवास तोड़ा। वांगचुक, केंद्रीय मंत्री डॉ. नड्डा, डॉ. जितेंद्र सिंह, ये तीनों ही खुश दिखाई दे रहे हैं। अनशन खत्म करते समय आंदोलनकारियों की कौन-सी मांगें सरकार ने मंजूर कीं? तो एक भी नहीं। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा होने तक ‘जंतर-मंतर’ का मंच नहीं छोड़ेंगे, ऐसा वांगचुक कह रहे थे। उसी मंच से सरकार ने उन्हें सफेद चादर के पीछे छिपाकर घसीटते हुए हटाया, अस्पताल में बंद किया और सूप पिलाया। ‘जंतर-मंतर’ के उसी मंच पर आकर समस्त आंदोलनकारियों की मौजूदगी में किसी घायल बच्ची के हाथों वांगचुक साहब का अनशन तोड़ना अधिक तर्कसंगत होता। किसी को भी विश्वास में लिए बिना उन्होंने यह कदम उठाया। इसके बावजूद ‘जंतर-मंतर’ सहित देशभर में युवाओं का आंदोलन जारी ही रहेगा। यह आंदोलन जिस तरह भ्रष्ट शिक्षा प्रणाली के खिलाफ है, उसी तरह देश की स्वतंत्रता और लोकतंत्र को बचाने के लिए भी है। वांगचुक को यह बात मालूम ही होगी। पिछले दस वर्षों में देशभर में १५२ बार परीक्षा पेपर लीक होने की घटनाएं हुईं। उनमें से एक भी आरोपी को सजा नहीं हुई। इस अराजकता का खामियाजा साढ़े सात करोड़ विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को भुगतना पड़ा, यह जानकारी लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने दी। यह पूरा कांड मोदी के अमृत काल में हुआ। पेपर लीक का जहर साढ़े सात करोड़ विद्यार्थियों की जिंदगी में घुल गया। दस वर्षों में मोदी ने
कई शिक्षा मंत्री नियुक्त
किए और हटाए। अर्धशिक्षित स्मृति ईरानी भी शिक्षा मंत्री थीं। अब कोई एक धर्मेंद्र प्रधान हैं। दस वर्षों के प्रत्येक शिक्षा मंत्री पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। पेपर लीक पर बोलना, आंदोलन करना, इसमें भाजपा को आपराधिक प्रकृति का कृत्य दिखाई देता है। धर्मेंद्र प्रधान कहते हैं,’ ‘जंतर-मंतर’ पर विद्यार्थी नहीं बल्कि गुंडे हैं,’ तो जे. पी. नड्डा कहते हैं, ‘राहुल गांधी पेपर लीक के मामले में राजनीति कर रहे हैं। राजनीतिक फायदे के लिए राहुल गांधी माहौल बिगाड़ रहे हैं। उन्हें स्थायी समाधान निकालने के लिए संसद में विस्तृत चर्चा करनी चाहिए।’ नड्डा की बात को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। देश के सभी राजनीतिक दलों ने ‘जंतर-मंतर’ पर लड़नेवाले बच्चों के प्रति चिंता व्यक्त की होगी तो उसमें वैâसी राजनीति? आंदोलनकारी लड़के-लड़कियों को दिल्ली पुलिस ने सिर्फ जान से मारना ही बाकी छोड़ा है। आंदोलन करनेवाली छोटी बच्चियों के कपड़े पुलिस ने फाड़ दिए। इस छेड़छाड़ पर याचिका लेकर वकील सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, तब मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का व्यवहार और भाषा कानून के दायरे में बैठने वाली नहीं थी। पुलिस द्वारा विद्यार्थियों पर की गई मारपीट पर ध्यान देने से मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इनकार कर दिया। ‘ऐसे मारपीट के वीडियो देखने में समय बर्बाद मत कीजिए, हमें बिल्कुल रुचि नहीं है’, मुख्य न्यायाधीश का यह बयान अमानवीय है। पुलिस को कमर के नीचे लाठियां चलाने के निर्देश होते हुए भी लाठियों से सिर फोड़े गए, हाथ तोड़े गए, चेहरे फोड़े गए। यह गैरकानूनी है। सुप्रीम कोर्ट इस
अमानवीय कृत्य
को गंभीरता से नहीं ले रहा है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने न्याय की देवी की आंखों से पट्टी हटाई, वह क्या खुली आंखों से बच्चों पर यह अत्याचार देखने के लिए? प्रधानमंत्री अहंकार से उबल रहे हैं। गृहमंत्री निर्दयी हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट निर्दयी सरकार का गुलाम बन चुका है। कोई भी उस विद्यार्थी वर्ग की सुनने को तैयार नहीं है। पुलिस उन्हें शैतान की तरह पीट रही है। ऐसे समय में न्याय मांगने कहां जाएं? इस मुद्दे पर अहंकार और राजनीतिक स्वार्थ से मोदी सरकार मदमस्त हो चुकी है। मुख्य न्यायाधीश ने आंखों पर अंधभक्ति की पट्टी बांध ली, तो न्याय मिलेगा कैसे? फिर भी एक बात अच्छी हुई। सुप्रीम कोर्ट के वकीलों के समूह ने ‘जंतर-मंतर’ के आंदोलनकारी विद्यार्थियों को खुलकर समर्थन दिया है। सुप्रीम कोर्ट के प्रांगण में आकर संविधान की उद्देशिका पढ़कर विरोध दर्ज कराया। संविधान की प्रस्तावना, संविधान की नींव और उसकी आत्मा है। उसमें ‘हम, भारत के लोग’ इन शब्दों से भारत को एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का संकल्प लिया गया है। सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त कराने का संकल्प हमारे संविधान की प्रस्तावना में है। लेकिन हमारे संविधान की आत्मा ही पिछले १२ वर्षों में तोड़ दी गई है। लोकतंत्र के चारों स्तंभ नष्ट कर दिए गए हैं। इसलिए ‘हम, भारत के लोग’ इस अवधारणा की रोज धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। फिर भी ‘हम, भारत के लोग’ देश को बचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। बिल्कुल रहेंगे!
