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छात्रों के हाथ में डिग्री नहीं, एफआईआर थमा रही सरकार!

-छात्र आंदोलन में शामिल करीब १,५०० लोगों पर मुंबई पुलिस ने दर्ज किए मामले

-नौकरी, पासपोर्ट और विदेश में पढ़ाई तक पर पड़ सकता है असर

सामना संवाददाता / मुंबई

प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित धांधली और पेपर लीक के खिलाफ सड़क पर उतरे छात्रों की आवाज सुनने के बजाय अब उन्हें आपराधिक मामलों के जाल में उलझाया जा रहा है। मुंबई में बीते एक सप्ताह के दौरान छात्रों के प्रदर्शनों में शामिल करीब १,५०० लोगों के खिलाफ पुलिस ने मामले दर्ज किए हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे युवाओं और विद्यार्थियों की है, जिनका इससे पहले कभी पुलिस या अदालत से सामना नहीं हुआ था।
पहले मुंबई में आंदोलनों के दौरान प्रदर्शनकारियों को कुछ घंटों के लिए हिरासत में लेकर छोड़ दिया जाता था या केवल आयोजकों के नाम एफआईआर में शामिल किए जाते थे। इस बार पुलिस ने सैकड़ों युवा प्रदर्शनकारियों को व्यक्तिगत रूप से आरोपी बनाया है। इससे सवाल उठ रहा है कि क्या एफआईआर का इस्तेमाल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए नहीं, बल्कि आंदोलन में शामिल होने वाले छात्रों को डराने के लिए किया जा रहा है।
एफआईआर के बाद क्या होगा?
अधिकांश मामले गैरकानूनी जमावड़े से जुड़ी जमानती धाराओं में दर्ज किए गए हैं। एफआईआर दर्ज होते ही तत्काल गिरफ्तारी जरूरी नहीं है, लेकिन नामजद व्यक्ति कानूनी रूप से आरोपी बन जाता है और उसे पुलिस जांच में सहयोग करना पड़ता है। पुलिस सबूत नहीं मिलने पर अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर सकती है। इसके विपरीत, आरोपपत्र दाखिल हुआ तो छात्रों को जमानती बॉन्ड भरने, अदालत में उपस्थित होने और लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है। कानून विशेषज्ञों का कहना है कि एफआईआर दर्ज होने भर से कोई व्यक्ति अपराधी नहीं बन जाता। इसके बावजूद लंबित आपराधिक मामला पासपोर्ट पुलिस सत्यापन, सरकारी अथवा निजी नौकरी की पृष्ठभूमि जांच, विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश और विदेश यात्रा में व्यावहारिक मुश्किलें पैदा कर सकता है।
क्या सरकार वापस ले सकती है मुकदमे?
महाराष्ट्र में राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों से जुड़े मुकदमे पहले भी वापस लिए जा चुके हैं। सरकारी प्रस्तावों के तहत ऐसे मामले वापस लेने की व्यवस्था रही है, जिनमें किसी की जान नहीं गई हो और सार्वजनिक संपत्ति को पांच लाख रुपए से अधिक का नुकसान न हुआ हो। वर्ष २०१९ के आरे आंदोलन और २०२० के सीएएस तथा जेएनयू हिंसा-विरोधी प्रदर्शनों से जुड़े कई मामले भी बाद में वापस लिए गए थे।
एफआईआर में नामजद छात्र बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर मामला रद्द करने की मांग कर सकते हैं। अदालतें पहले भी कह चुकी हैं कि किसी सभा में केवल उपस्थित होना आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
सवाल सरकार से
पेपर लीक करने वालों और छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ कार्रवाई कितनी तेजी से हुई, यह देश देख रहा है। लेकिन जवाब मांगने के लिए सड़क पर उतरने वाले युवाओं के खिलाफ एफआईआर की रफ्तार हैरान करने वाली है। सरकार को तय करना होगा कि वह छात्रों की समस्याओं का समाधान चाहती है या कानूनी मुकदमों का भय दिखाकर असहमति को दबाना चाहती है।

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