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श्रवण नक्षत्र का मास श्रावण

शीतल अवस्थी

सावन मास का प्रारंभ हो गया है। रिमझिम फुहारों के महीने सावन को हिंदू पंचांग में श्रावण मास कहा जाता है। सावन नाम भी इसी श्रावण शब्द से ही बना है, लेकिन इस महीने का नाम श्रावण क्यों रखा गया, यह कम लोग ही जानते हैं। दरअसल, यह पूरी तरह ज्योतिषीय गणना का मामला है। कालगणना के अनुसार ही अधिकतर महीनों और सप्ताह के सातों दिनों के नाम तय किए गए हैं। हिंदू पंचांग का आरंभ चैत्र मास से होता है। चैत्र मास से पांचवा माह श्रावण मास होता है। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार, इस मास की पूर्णिमा के दिन आकाश में श्रवण नक्षत्र का योग बनता है। इसलिए श्रवण नक्षत्र के नाम से इस माह का नाम श्रावण हुआ। इस माह से चातुर्मास की शुरुआत होती है। यह माह चातुर्मास के चार महीनों में बहुत शुभ माह माना जाता है। चातुर्मास धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्व रखता है। चातुर्मास के चार माह में श्रावण, भाद्रपद, अश्विन और कार्तिक में संत-महात्मा से लेकर आम जन तक धर्म और अध्यात्म के रंग में रंग जाते हैं। इस दौरान हिंदू धर्म के अनेक उत्सव, पर्व और त्योहार मनाए जाते हैं। इनकी शुरुआत श्रावण मास से ही होती है। इसलिए इस मास को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है।
शिव पंचाक्षर
श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र में शिवजी की प्रार्थना की गई है। ॐ नम: शिवाय पर आधारित इस श्लोक संग्रह में अत्यंत मनमोहक रूप से शिवस्तुति की गई है। इस स्तोत्र के रचयिता श्री आदि शंकराचार्यजी हैं जो महान शिव भक्त थे।
नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांगरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे ‘न’ काराय नम: शिवाय:।।
मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।
मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे ‘म’ काराय नम: शिवाय:।।
शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै ‘शि’ काराय नम: शिवाय:।।
वषिष्ठ कुम्भोद्भवगौतमाय मुनींद्र देवार्चित शेखराय।
चंद्रार्कवैश्वानर लोचनाय तस्मै ‘व’ काराय नम: शिवाय:।।
यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै ‘य’ काराय नम: शिवाय:।।
पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत् शिव सन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।।
इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम्।।
भावार्थ-
हे महेश्वर! आप नागराज को हार स्वरूप धारण करने वाले हैं। हे (तीन नेत्रों वाले) त्रिलोचन आप भष्म से अलंकृत, नित्य (अनादि एवं अनंत) एवं शुद्ध हैं। अम्बर को वस्त्र सामान धारण करने वाले दिगंबर शिव, आपके न अक्षर द्वारा जाने वाले स्वरूप को नमस्कार। चंदन से अलंकृत एवं गंगा की धारा द्वारा शोभायमान नंदीश्वर एवं प्रमथनाथ के स्वामी महेश्वर आप सदा मन्दार पर्वत एवं बहुदा अन्य स्रोतों से प्राप्त्य पुष्पों द्वारा पूजित हैं। हे म धारी शिव, आपको नमन है। हे धर्म ध्वजधारी, नीलकण्ठ, शि अक्षर द्वारा जाने जाने वाले महाप्रभु, आपने ही दक्ष के दम्भ यज्ञ का विनाश किया था। मां गौरी के कमल मुख को सूर्य सामान तेज प्रदान करने वाले शिव, आपको नमस्कार है। देवगणो एवं वषिष्ठ, अगस्त्य, गौतम आदि मुनियों द्वार पूजित देवाधिदेव! सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि आपके तीन नेत्र सामन हैं। हे शिव, आपके व अक्षर द्वारा विदित स्वरूप को नमस्कार है। हे यज्ञ स्वरूप, जटाधारी शिव आप आदि, मध्य एवं अंतरहित सनातन हैं। हे दिव्य अम्बरधारी शिव, आपके य अक्षर द्वारा जाने जाने वाले स्वरूप को नमस्कारा है।
जो कोई शिव के इस पंचाक्षर मंत्र का नित्य ध्यान करता है वह शिव के पूण्य लोक को प्राप्त करता है तथा शिव के साथ सुखपुर्वक निवास करता है। इस स्तोत्र के पांचों श्लोकों में क्रमशः न, म, शि, वा और य है अर्थात नम: शिवाय यह पूरा स्तोत्र शिवस्वरूप है।

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