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मुस्लिम वर्ल्ड : सुपरपावर की घनघोर बेइज्जती! …जख्म छिपाने के लिए क्या-क्या करना पड़ रहा?

सूफी खान

ईरान-अमेरिका, इजरायल युद्ध फिर शुरू होने की आशंका के बीच अब कुछ ऐसे राज भी खुल रहे हैं, जो बताते हैं कि ईरान ने अमेरिका जैसी महाशक्ति का क्या हाल कर रखा है। ट्रंप प्रशासन ने ईरान के हमलों के बाद हुए अमेरिकी नुकसान को दुनिया से छिपाने की कोशिश की थी। यह दावा खासतौर पर उस समय से जुड़ा है जब ईरान ने २८ फरवरी से मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए बड़े हमले किए थे।
बताया जा रहा है कि इन हमलों में अमेरिका को उम्मीद से कहीं ज्यादा नुकसान हुआ था। इसी के चलते ट्रंप प्रशासन ने प्राइवेट सैटेलाइट इमेजिंग कंपनियों से संपर्क किया। अब मीडिया रिपोर्ट्स बता रही हैं कि अमेरिका की सरकार ने कथित तौर पर इन कंपनियों से अनुरोध किया कि वे हमलों के बाद तबाह हुए अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सैटेलाइट तस्वीरें सार्वजनिक न करें।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम भूमिका डिफेंस हेडक्वार्टर पेंटागन की बताई जा रही है। जानकार मानते हैं कि दरअसल पेंटागन को इस बात का डर था कि यदि अमेरिकी ठिकानों की तबाही की असली तस्वीरें दुनिया के सामने आ गईं तो इससे अमेरिका की महाशक्ति वाली छवि मिट्टी में मिल जाएगी। कोल्डवॉर खत्म होने के बाद से अमेरिका लंबे समय से खुद को एक अजेय सैन्य ताकत के रूप में प्रस्तुत करता रहा है और इस तरह की तस्वीरें उस छवि को कमजोर कर सकती थीं।
बताया जाता है कि ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन को डर था कि अगर नुकसान की सटीक जानकारी सार्वजनिक हो गई, तो दुश्मन देश अमेरिकी कमजोाfरयों का फायदा उठा सकते हैं। यही वजह थी कि सैटेलाइट कंपनियों से तस्वीरें रोकने की अपील की गई। इसी तरह की सेंसरशिप इजरायल भी अपनाता है। वो भी अपना नुकसान दुनिया से या तो छिपा लेता है या फिर बहुत कम दिखाता है। यही वजह रही कि एक सैटेलाइट कंपनी ने मिडिल ईस्ट के संघर्ष वाले इलाकों की सैटेलाइट तस्वीरों को जारी करने पर अनिश्चितकालीन रोक लगा दी। बताया गया कि यह पैâसला अमेरिकी प्रशासन के अनुरोध के बाद लिया गया। इससे पहले कंपनी ९६ घंटे की देरी से तस्वीरें जारी करती थी, जिसे बाद में बढ़ाकर १४ दिन कर दिया गया था। कंपनी का कहना है कि इस तरह की रोक का मकसद दुश्मनों को संवेदनशील जानकारी मिलने से रोकना है, ताकि वे इन तस्वीरों का इस्तेमाल हमलों की योजना बनाने में न कर सकें। हालांकि, इस पैâसले ने अमेरिका की एक आजाद सोच वाले मुल्क की छवि पर भी सवाल उठाए हैं। वो अमेरिका जो हर जगह लोकतंत्र और पारदर्शिता की बातें करता है, लेकिन जब खुद पर आई तो पर्देदारी क्यों? कुल मिलाकर, यह पूरा मामला सिर्फ एक सैन्य घटना नहीं, बल्कि सूचना नियंत्रण, राष्ट्रीय सुरक्षा और दुनिया में इमेज को लेकर राजनीति का जटिल मिश्रण बन गया है। जैसे-जैसे मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ रहा है, आशंका है कि फिर से जंग होगी। इस बार तो ज्यादा भीषण और भयंकर हथियारों से होगी। ऐसे में क्या महाशक्ति मैदान में रह पाएगी? इस पर सवाल उठने लगे हैं।

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