जंतर-मंतर से उठी आवाज
तौसीफ कुरैशी
जंतर-मंतर पर बैठी श्वेता कटारे किसी प्रतियोगी परीक्षा की अभ्यर्थी नहीं हैं। न उन्हें सरकारी नौकरी चाहिए, न किसी भर्ती परीक्षा में शामिल होना है। वे मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में असिस्टेंट डायरेक्टर हैं। उनकी दुनिया वैâमरों, सेटों और शूटिंग के बीच बसती है। फिर भी वे लगभग बारह सौ किलोमीटर का सफर तय कर दिल्ली पहुंचीं, फुटपाथ पर रात बिताई और छात्रों के साथ खड़ी हो गईं। सवाल यह नहीं कि वे क्यों आईं, सवाल यह है कि उन्हें आने की जरूरत क्यों महसूस हुई। उनका जवाब इस पूरे आंदोलन का सबसे बड़ा बयान है `मैं अपने लिए नहीं, आने वाली पीढ़ी के लिए आई हूं। आज मुझे सरकारी नौकरी नहीं करनी, लेकिन कल मेरे बच्चे या मेरे छोटे भाई-बहन इसी व्यवस्था का हिस्सा होंगे।’
यहीं से आंदोलन का अर्थ बदल जाता है। यह अब किसी एक परीक्षा, एक पेपर लीक या एक भर्ती प्रक्रिया का विरोध भर नहीं रह जाता। यह उस भरोसे की लड़ाई बन जाता है, जिस पर हर परिवार अपने बच्चों का भविष्य खड़ा करता है। जब व्यवस्था पर विश्वास डगमगाने लगता है, तब सड़क पर सिर्फ छात्र नहीं उतरते, पूरा समाज उतरता है। भारत का हर घर किसी न किसी छात्र का घर है। हर मां-बाप अपनी अधूरी इच्छाएं बच्चों की पढ़ाई में पूरी होते देखना चाहते हैं। ऐसे में यदि मेहनत की जगह अनिश्चितता और ईमानदारी की जगह धांधली का डर बैठ जाए, तो बेचैनी केवल अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहती। वह पूरे समाज में पैâल जाती है। श्वेता कटारे इसी बेचैनी की प्रतिनिधि हैं। वे उस भारत की आवाज हैं, जिसने अपनी परीक्षा दे दी है, लेकिन आने वाली पीढ़ी की परीक्षा को निष्पक्ष देखना चाहता है। यह संवेदना राजनीति से बड़ी है। यह भविष्य की चिंता है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस पीढ़ी को भ्रम नहीं है। उसे मालूम है कि किसी एक मंत्री का इस्तीफा या किसी एक अधिकारी की विदाई सारी समस्याओं का समाधान नहीं होगी। लेकिन वह यह भी जानती है कि हर बदलाव की शुरुआत किसी पहले कदम से होती है। लोकतंत्र में पहली जीत हमेशा आवाज उठाने की होती है, अंतिम जीत व्यवस्था बदलने की।
जंतर-मंतर की भीड़ में बैठी श्वेता शायद इतिहास नहीं लिख रही थीं, लेकिन उन्होंने इतिहास का एक जरूरी वाक्य जरूर कह दिया `हम अपने लिए नहीं, आने वाले भारत के लिए खड़े हैं।’ यही किसी भी जनआंदोलन की सबसे बड़ी ताकत होती है। जब संघर्ष निजी हित से निकलकर अगली पीढ़ी के भविष्य तक पहुंच जाए, तब उसे केवल आंदोलन नहीं, समाज की अंतरात्मा की आवाज कहा जाता है। सत्यमेव जयते..!
