-गविष्ठि यात्रा के दौरान जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से विशेष बातचीत
रोहित माहेश्वरी
जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती इन दिनों अपनी 81 दिवसीय “गविष्ठि यात्रा-गो रक्षार्थ धर्मयुद्ध” को लेकर पूरे उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर में चर्चा के केंद्र में हैं। गोरखपुर से प्रारंभ हुई यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गौ माता को राष्ट्रीय सम्मान दिलाने के उद्देश्य से चलाया जा रहा एक व्यापक जनजागरण अभियान है। यात्रा का उद्देश्य गांव-गांव और शहर-शहर पहुंचकर गौ संरक्षण के प्रति समाज को जागरूक करना तथा सरकारों और जनप्रतिनिधियों का ध्यान इस विषय की ओर आकर्षित करना है।
यात्रा के प्रारंभ से ही शंकराचार्य के तेवर बेहद मुखर रहे हैं। उन्होंने अनेक मंचों से कहा है कि गाय भारतीय संस्कृति की आत्मा है और जिस देश में उसे माता का स्थान प्राप्त है, वहां उसकी उपेक्षा स्वीकार नहीं की जा सकती। यही कारण है कि उन्होंने इस अभियान को “धर्मयुद्ध” का नाम दिया है।
गोरखपुर से शुरू हुई यह यात्रा पूर्वांचल के अनेक जिलों, गांवों और कस्बों से गुजरते हुए अब बुंदेलखंड क्षेत्र तक पहुंच चुकी है। जहां-जहां यात्रा पहुंची, वहां श्रद्धालुओं, गौभक्तों और स्थानीय नागरिकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। यात्रा के साथ चल रहे सैकड़ों वाहनों के काफिले और हजारों लोगों की मौजूदगी यह बताती है कि गौ रक्षा का विषय आज भी समाज के बड़े वर्ग की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इसके प्रति जनसमर्थन भी बढ़ता दिखाई दे रहा है।
शंकराचार्य का कहना है कि यह किसी दल या सरकार के विरोध का अभियान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा की रक्षा का आंदोलन है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि जो सरकार गौ माता के संरक्षण के लिए गंभीर कदम नहीं उठाएगी, उससे जनता सवाल अवश्य पूछेगी।
इसी यात्रा के दौरान मुझे शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से विस्तार से बातचीत करने का अवसर मिला। बातचीत में उन्होंने गौ रक्षा आंदोलन, युवाओं की भूमिका, संत समाज और अपने भविष्य के कार्यक्रमों को लेकर खुलकर अपने विचार रखे।
प्रश्न: यदि सरकार आपकी मांगों को पूरा नहीं करती, तो आगे क्या करेंगे?
शंकराचार्य जी: यह आंदोलन किसी एक यात्रा तक सीमित नहीं है। यदि हमारी मांगों पर ध्यान नहीं दिया जाता, तो हम पुनः इसी प्रकार का अभियान चलाएंगे। गौ माता के सम्मान और संरक्षण के लिए संघर्ष जारी रहेगा। समाज को जागृत करना हमारा दायित्व है और जब तक गौ माता को उनका उचित सम्मान नहीं मिलता, तब तक यह धर्मयुद्ध किसी-न-किसी रूप में चलता रहेगा।
प्रश्न: आज के युवाओं के लिए आपका क्या संदेश है?
शंकराचार्य जी: युवा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति होते हैं। उनमें जोश होता है, ऊर्जा होती है और परिवर्तन लाने की क्षमता होती है। देश निर्माण में युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। यदि युवा सही दिशा में अपनी शक्ति का उपयोग करें, तो भारत को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। मैं युवाओं से कहना चाहता हूं कि वे केवल अपने व्यक्तिगत जीवन तक सीमित न रहें, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति भी अपने दायित्वों को समझें। राष्ट्र निर्माण में उनकी सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
प्रश्न: आप गौ माता को राष्ट्रीय सम्मान दिलाने के लिए इतना बड़ा अभियान चला रहे हैं। क्या इस विषय पर देश के सभी संतों को एक मंच पर लाने की कोशिश करेंगे?
शंकराचार्य जी: नहीं, मैं ऐसा कोई प्रयास नहीं करूंगा। आज अधिकांश संत किसी-न-किसी रूप में सरकार के दबाव में हैं या सरकार से भयभीत हैं। मैं उन्हें ऐसी स्थिति में नहीं डालना चाहता, जहां उन्हें असहज महसूस करना पड़े। जो संत धर्म और गौ माता के सम्मान के लिए खुलकर आगे आना चाहते हैं, उनका स्वागत है, लेकिन मैं किसी को बुलाने या साथ जोड़ने का प्रयास नहीं करूंगा। जो व्यक्ति स्वयं अपने विवेक और साहस से इस अभियान का हिस्सा बनना चाहता है, वह स्वतः आए। धर्म और सत्य की लड़ाई किसी दबाव में नहीं, बल्कि निडर होकर लड़ी जाती है। संत समाज की भूमिका को लेकर शंकराचार्य का यह उत्तर उनकी बेबाक शैली को दर्शाता है। उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के स्पष्ट किया कि उनका आंदोलन किसी संगठन या संतों की संख्या पर नहीं, बल्कि जनसमर्थन और जनजागरण की शक्ति पर आधारित है।
प्रश्न: यात्रा को जिस प्रकार जनसमर्थन मिल रहा है, उसे आप किस रूप में देखते हैं?
शंकराचार्य जी: यह समर्थन किसी व्यक्ति को नहीं मिल रहा, बल्कि गौ माता के प्रति लोगों की श्रद्धा और आस्था का समर्थन है। समाज के भीतर इस विषय को लेकर गहरी चिंता है। लोग चाहते हैं कि गौ माता के संरक्षण और सम्मान के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। यही कारण है कि लोग स्वतः इस यात्रा से जुड़ रहे हैं।
प्रश्न: कई लोग कहते हैं कि गौ रक्षा का विषय राजनीति से जुड़ गया है?
शंकराचार्य जी: गौ माता राजनीति से ऊपर का विषय है। राजनीति समय के बदलती रहती है, लेकिन संस्कृति और सभ्यता स्थायी होती हैं। गाय भारतीय जीवन, कृषि, गांव और परंपरा का महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए इसे केवल राजनीतिक दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए।
प्रश्न: आपकी यात्रा का अंतिम लक्ष्य क्या है?
शंकराचार्य जी: हमारा उद्देश्य केवल एक यात्रा निकालना नहीं है। यह एक जनजागरण अभियान है। हम चाहते हैं कि गौ माता के सम्मान और संरक्षण का विषय देश के हर नागरिक तक पहुंचे। हमारी मांग है कि गौ माता को राष्ट्रीय सम्मान मिले और उनके संरक्षण के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए। यह यात्रा लोगों को जागरूक करने का माध्यम है। जब समाज जागेगा, तो सरकारों को भी इस विषय पर गंभीरता से सोचना पड़ेगा। हमारा लक्ष्य केवल मांग करना नहीं, बल्कि जनमत तैयार करना भी है। जब तक गौ माता को उनका उचित सम्मान नहीं मिलता, तब तक हमारा प्रयास और संघर्ष जारी रहेगा।
प्रश्न: देशवासियों के लिए आपका अंतिम संदेश?
शंकराचार्य जी: अपने धर्म, संस्कृति और परंपराओं पर गर्व कीजिए। अपने माता-पिता का सम्मान कीजिए और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखिए। जो समाज अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है, वही आगे बढ़ता है। भारत का भविष्य उसके युवाओं और जागरूक समाज के हाथ में है। बातचीत के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शब्दों में अपने उद्देश्य के प्रति दृढ़ता और आत्मविश्वास साफ दिखाई दिया। गौ माता को राष्ट्रीय सम्मान दिलाने की मांग को लेकर वे किसी प्रकार के समझौते के पक्ष में नजर नहीं आए। वहीं, युवाओं को लेकर उनका विश्वास भी उतना ही मजबूत दिखाई दिया। उनका मानना है कि यदि देश का युवा अपनी शक्ति और ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण तथा सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण में लगाए, तो भारत नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है। गविष्ठि यात्रा अब एक साधारण धार्मिक यात्रा से आगे बढ़कर जनजागरण अभियान का स्वरूप लेती दिखाई दे रही है। यात्रा के साथ बढ़ती भीड़ और जनसमर्थन यह संकेत दे रहे हैं कि गौ संरक्षण का विषय आज भी समाज के बड़े वर्ग की भावनाओं से जुड़ा हुआ है। गांवों, कस्बों और शहरों में लोगों की भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि यह मुद्दा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी रखता है। शंकराचार्य का स्पष्ट संदेश है कि गौ माता के सम्मान और संरक्षण की लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है। यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह अभियान आगे भी जारी रहेगा। फिलहाल, गोरखपुर से शुरू हुआ यह “धर्मयुद्ध” प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से गुजरते हुए आगे बढ़ रहा है और इसके साथ जुड़ने वालों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। उनके शब्दों में कहें तो, “गौ माता के सम्मान तक यह धर्मयुद्ध रुकने वाला नहीं है।”
