हिमांशु राज
भाषा केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कारों का दर्पण है। जब आशुतोष राणा ने हाल के विवाद में शब्दों की गरिमा पर बात रखी, तो उन्होंने केवल एक बयान का खंडन नहीं किया—बल्कि एक सभ्य समाज की मूलभूत सीख दोहराई: जो बोलते हैं, वही उनकी पहचान बनते हैं।
कंगना रनौत ने युवा प्रदर्शनकारियों के लिए “गटरछाप” जैसे शब्द इस्तेमाल किए, जिस पर व्यापक आलोचना हुई। इसी पृष्ठभूमि में आशुतोष राणा ने भाषा-मर्यादा, शब्दों के सम्मान और सावधानीपूर्वक बोलने की आवश्यकता पर अपनी राय रखी।
राणा ने स्पष्ट किया कि “शेर दहाड़ता है, हाथी चिंघाड़ता है, कुत्ता भौंकता है… किसी भी जीव की पहचान उसके कंठ से निकलने वाले स्वर से होती है।” यह केवल काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक चेतावनी है: शब्द इंसान को गरिमा दिलाते हैं, पर वही शब्द अमर्यादित हो जाएँ तो प्रतिष्ठा भी खो सकते हैं।
कंगना रनौत को एक ही बात सीखनी चाहिए कि भाषा कब और कैसे बोली जाए; हर एक व्यक्ति का विरोध करना इस विषय में अनुचित नहीं है। सार्वजनिक जीवन में शब्दों का चयन सोच-समझकर करना चाहिए, क्योंकि शब्दों से ही सम्मान बनता है और शब्दों से ही संकट भी।
जहां तक आशुतोष राणा की बात है, उन्होंने साहित्य, ललित कला, लेखन और मंचन के सभी आयामों पर अपनी विशेषता सिद्ध की हुई है। अभिनय के मामले में आशुतोष राणा कंगना रनौत जैसी अदाकारों को बहुत पीछे छोड़ते नजर आते हैं। जब आप अपनी बात रखने के लिए व्यक्तिगत रूप से आरोप लगाने लगें और किसी की सकारात्मक आलोचना भी आपको गलत लगने लगे, तो सत्ता-संज्ञान का लोप कर देती है-यह बात स्मरण रहे।
“हमारे राम” जैसे नाटक का मंचन देश-दुनिया में करके भारत की संस्कृत व आध्यात्मिक तस्वीर को पूरी मजबूती से प्रस्तुत करने वाले आशुतोष राणा के बारे में कंगना रनौत जैसी अदाकारा को कुछ भी बोलने से पहले विचार करना चाहिए।
जब कोई सार्वजनिक हस्ती बोलती है, तो उसके शब्द केवल व्यक्तिगत नहीं रहते-वे समाज के एक वर्ग को प्रभावित करते हैं, विशेषकर युवाओं को। ऐसे में आशुतोष राणा का आग्रह कि भाषा में संयम और गरिमा होनी चाहिए, लोकतांत्रिक संवाद के लिए अनिवार्य है।
राणा की बातचीत में एक और महत्वपूर्ण पहलू है: वे नैतिक ऊंचाई पर खड़े होकर नैतिकता की सीख दे रहे हैं, न कि व्यक्तिगत प्रतिशोध की। यही वह सकारात्मक पक्ष है जो बहस को ऊर्जावान बहस से उठाकर संस्कारवान संवाद की ओर ले जाता है।
आशुतोष राणा का पक्ष केवल “विवाद का जवाब” नहीं, बल्कि एक सभ्य समाज की बुनियादी आवश्यकता की ओर संकेत है: भाषा में गरिमा, संवाद में संयम, और सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी। यही वह सकारात्मक स्वर है, जो बहस को ऊर्जा से ऊपर उठाकर संस्कृति की ओर ले जाता है।
