हॉलीवुड में इन दिनों चमकते रेड कार्पेट से ज्यादा चर्चा अदालतों, आरोपों और पुराने घावों की हो रही है। मीटू आंदोलन के कई साल बाद भी मनोरंजन उद्योग में यौन उत्पीड़न, शक्ति के दुरुपयोग और चुप्पी की संस्कृति से जुड़े मामले खत्म नहीं हुए हैं। फर्क इतना है कि अब ये मामले सिर्फ गॉसिप कॉलम तक सीमित नहीं, बल्कि मुकदमों, स्टूडियो जांचों और सार्वजनिक जवाबदेही में बदल रहे हैं।
सबसे बड़ा प्रतीक अब भी हार्वे वाइनस्टीन का मामला है। मई २०२६ में न्यूयॉर्क में उनके तीसरे रेप ट्रायल में जूरी सर्वसम्मति पर नहीं पहुंची और मुकदमा मिसट्रायल में बदल गया। वाइनस्टीन पर आरोप है कि उन्होंने अपने हॉलीवुड प्रभाव का इस्तेमाल महिलाओं के यौन शोषण के लिए किया, हालांकि वे आरोपों से इनकार करते रहे हैं। वे दूसरे मामलों में दोषसिद्धि के कारण जेल में रहेंगे।
संगीत और फिल्म जगत से जुड़े शॉन ‘डिडी’ कॉम्ब्स का मामला भी उद्योग की छवि पर गहरी चोट है। २०२५ में उन्हें सबसे गंभीर रैकेटियरिंग और सेक्स ट्रैफिकिंग आरोपों से बरी किया गया, लेकिन वेश्यावृत्ति के लिए परिवहन से जुड़े दो मामलों में दोषी पाया गया और अक्टूबर २०२५ में चार साल दो महीने की सजा सुनाई गई।
नई पीढ़ी के सितारों में ब्लेक लाइवली और जस्टिन बाल्डोनी विवाद ने सेट पर सुरक्षा, प्रतिशोध और पीआर युद्ध की बहस को तेज किया। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, लाइवली ने कुछ दावों का निपटारा किया, जबकि दोनों पक्ष अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं।
मुद्दा केवल अपराध का नहीं, कार्यस्थल की संस्कृति का भी है। आरोपों के बाद स्टूडियो, प्रोडक्शन हाउस और कलाकारों की टीमों पर यह दबाव बढ़ा है कि वे कॉन्ट्रैक्ट, इंटीमेसी कोऑर्डिनेशन, शिकायत तंत्र और सेट पर शक्ति-संतुलन को पारदर्शी बनाएं। हॉलीवुड की मुश्किल यह है कि वह बराबरी और संवेदनशीलता की बात पर्दे पर करता है, लेकिन पर्दे के पीछे पुराने समीकरण बार-बार बेनकाब हो रहे हैं। यही कारण है कि सेक्स स्वैंâडल्स अब सिर्फ सितारों की निजी बदनामी नहीं, बल्कि पूरी मनोरंजन व्यवस्था की विश्वसनीयता का संकट बन गए हैं।
