मनमोहन सिंह
घनी काली रात थी। श्मशान की सन्नाटे भरी हवाओं के बीच राजा वीर विक्रम ने उस शव को अपने कंधे पर लादा और चलने लगे। तभी शव में बसे बेताल ने अट्टहास किया और बोला, `राजन! तेरी निष्ठा तो किसी कर्मठ प्रहरी जैसी है। चल, तेरा मार्ग सुगम करने के लिए मैं तुझे स्वर्ण-नगरी और सूर्य-नगर के एक प्रतापी शासक और उनके चाणक्य बुद्धि वाले प्रधान अमात्य की कथा सुनाता हूं।’
कथा: दो सारथियों का रथ
`सुन राजन, एक विशाल आर्यावर्त में एक ऐसी अटूट जोड़ी का उदय हुआ, जिसका डंका चारों दिशाओं में गूंजता है। कुछ समय पूर्व, जब सत्ता का महाकुंभ आयोजित हुआ, तो ऐसा लगा कि उनका विजय रथ कीचड़ में फंस जाएगा। उत्तरी राज्य के शक्तिशाली क्षत्रप और प्रधान अमात्य के बीच तलवारें खिंच गई थीं और रथ के पहिये डगमगाने लगे थे।’
`परंतु हे राजन, उस शासक और प्रधान अमात्य की चतुरता तो देख। जब उन्हें लगा कि शक्ति क्षीण हो रही है, उन्होंने बड़ी कुशलता से उन पुराने सहयोगियों को पुन: गले लगा लिया, जो कभी उनके घोर विरोधी थे। प्रधान अमात्य ने ऐसी बिसात बिछाई कि पर्वत-पुरुष को उनकी सीमाओं का ज्ञान करा दिया और दक्कन के स्वामी को नई परियोजनाओं के मोहपाश में बांध लिया। दरबार के अन्य अनुभवी वृद्ध मंत्री अब मौन हैं और धर्म-सत्ता को भी यह संदेश दे दिया गया है कि राज-सत्ता ही सर्वोच्च है।’
बेताल ने लंबी सांस ली। विक्रम ने उसकी ओर देखा। बेताल ने कहना शुरू किया, `दूसरी ओर राजन, जो विरोधी दल कल तक हुंकार भर रहे थे, वे अब बिखर चुके हैं। उनके गठबंधन की नाव में स्वयं उनके ही सेनापतियों ने छेद कर दिए हैं। पूर्वी साम्राज्य की स्वामिनी और मध्य नगरी का पूर्व नगर-रक्षक अपने-अपने खेमे में परेशान हैं। साथ ही साथियों के विरुद्ध भी मोर्चा खुल गया है। आज स्थिति यह है कि विपक्षी कुनबे के `युवराज’ अकेले ही संघर्ष कर रहे हैं। जबकि उनके साथी युवराज व सहयोगी कुमार अपनी ही दुनिया में मगन हैं। शासक और अमात्य की प्रबंध कला के आगे विपक्ष का कुप्रबंधन स्पष्ट दिखाई देता है।’
बेताल का प्रश्न
बेताल रुका और राजा के कान के पास फुसफुसाया, `अब बता राजन! क्या विजय पाने के लिए मर्यादाओं और सीमाओं को अपनी सुविधा अनुसार बदलना उचित है? क्या सत्ता का दंड केवल विरोधियों पर ही चलना चाहिए? और क्या विपक्ष की यह पराजय उनकी नियति है या उनके अपने अहं, अति-आत्मविश्वास या आत्मविमुग्धता का फल? बोल राजन, यदि तूने जानते हुए भी मौन धारण किया, तो मैं तेरे सिर के सौ टुकड़े कर दूंगा।’
विक्रम का उत्तर
राजा विक्रम अत्यंत शांत स्वर में बोले, `सुन बेताल! इस परिस्थिति का उत्तर शुक्राचार्य की कूटनीति और विदुर नीति के सार में छिपा है।’ `पहला, शासक और अमात्य ने साम, दाम, दंड और भेद की उस नीति का पालन किया है, जहां साधन से अधिक साध्य को महत्व दिया जाता है। जब शत्रु बिखरा हुआ हो, तो उसे भ्रमित करना और अपने पाले में लाना ही श्रेष्ठ राजनीति है।’
`दूसरा, यह स्थिति विदुर नीति के उस कथन को चरितार्थ करती है कि वह शासक अजेय है जिसका संगठन लोहे की दीवार की तरह एकजुट हो। विपक्ष की हार उनकी `अपरिपक्व-नीति’ का परिणाम है। वे बिना किसी सेनापति और साझा लक्ष्य के उस विशाल सेना से लड़ रहे हैं जिसके पास अटूट अनुशासन है!’
`तीसरा, राजनीति में जो समय को पहचानकर अपने सहयोगियों को साध लेता है, वही चक्रवर्ती बनता है। जब तक विपक्षी क्षत्रप अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को त्यागकर लोक-संग्रह नहीं करेंगे, तब तक इस जोड़ी का चक्रवर्ती बनना रोकना असंभव है!’ `न्यायसंगत उत्तर है राजन! अब तुमने मुंह खोला और मैं चला, परंतु एक सूत्र है सदैव स्मरण रखना। वो ये कि अत्यधिक बोलना, अत्यधिक अहंकार करना, धर्म का त्याग करना, क्रोध करना, अत्यधिक स्वार्थ रखना और मित्रों से द्रोह करना, ये छह दोष मनुष्य के लिए विनाशकारी हैं। चाहे वो राजा हो, विरोधी या फिर प्रजा इससे देवता भी नहीं बच सकते तो तुम किस खेत की मूली हो विक्रम…’ कहते हुए बेताल उड़ गया और राजा उसके पीछे-पीछे दौड़ पड़े।
