मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गांव : अइया के घर में पूजा

काहें बिसरा गांव : अइया के घर में पूजा

पंकज तिवारी

अपने घर नई टीबी देखकर ददा एकदम से पागल से हो गये थे, उन्हें खुद पर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ये टीबी मैंने मंगाई है। टीबी बड़ी सी और शटर वाली थी। ददा वहीं खड़े, अगल-बगल के भीड़ से अनजान, खुद में ही खोए हुए से बिल्कुल देर तक निहारते रहे थे। मनोहर के घर एक बार ददा के साथ भी टीबी को लेकर बुरा बर्ताव हुआ था। लीपी-पोती बिल्कुल टिप-टॉप बखरी के ओसारे में मनोहर का पूरा परिवार ‘अलिफ लैला’ देख रहा था। सभी खटिया और कुर्सी पर बैठे हुए थे, जबकि अगल-बगल के बच्चों और लोगों को फर्श पर बैठना पड़ा था। समय ऐसा था कि घर में टीबी होना मतलब सरपंच से कम की हैसियत नहीं होती थी, उल्टा टीबी के नाम पर सरपंच भी घर में पानी भरने को तैयार हो जाते थे। सरपंच की आमदनी तब इतनी नहीं होती थी। लोगों को चाय पिलाने के लिए चीनी के जुगत में बेचारों को गेहूं-धान तक बेचना पड़ता था। ‘घरहूं क उर्द जंगेल’ में डालना होता था तब परधानी करना। घरों में चीनी का प्रवेश भी अभी नया-नया था। घर में चीनी का होना मतलब रईसता की निशानी थी। गुड़ गरीबों का मीठा माना जाने लगा था। ‘अलिफ लैला’ देख रहे मनोहर के घर ददा अचानक से पहुंच गये और लाठी पर हाथ धरे, हाथ के ऊपर अपना सिर टिकाए घंटों खड़े ‘अलिफ लैला’ देखते रहे। एक-दो बार खांस कर जताने का प्रयास भी किए कि ‘यार मनोहर तोहार खास दोस्त इंहां खड़ा बाऽ, कम से कम ओकरे बइठइ क जुगाड़ त कइ दऽ, नान्ह-नान्ह गदेले खटिया चढ़ि के बइठा हयेन अउर तूं हमरे बइठइ के जुगाड़ तक नाइ कइ पावथयऽ।’ पर कहावत है न कि सोते को जगाना आसान है पर जागते को जगाना बहुत कठिन। मनोहर जैसे ददा को देख ही नहीं रहे थे। ददा को बैठने तक को नहीं कहा गया, उल्टे मनोहर तो ऐसे दिखा रहे थे जैसे ददा को जानते ही ना हो। ये टसन होता था तब टीबी का। ददा को बहुत बुरा लगा था पर मन में ही दबकर रह गया था सारा कसक, कभी बाहर नहीं आ सका था। आज जब खुद के घर में टीबी आ गई थी, ददा के आंख से अनायास ही आंसू टपक पड़े थे। दुआरे तखत पर ही रखा गया था टीबी को जबकि फंकई बिना देर किए अंटीना का पैकेट खोल-खाल कर खपरैला और घोरई के बीच उसे सेट भी कर आया था। गांव से ही नोखई बड़ा सा बांस लिए झूठे ही उसे सेट करने का दिखावा करने में लगे हुए थे। इधर ददा आगे बढ़े, टीबी का शटर खोलने ही वाले थे कि अचानक याद हो आया- ‘बुढ़िया के हाथे कुलि काम शुभ होथऽ।’ ददा पीछे हो गये। ‘बूढ़ा आवऽ तूं खोलऽ एका, तोहरेन हाथे शुरुआत होए एकर।’ अइया तो खुशी से जैसे झूम सी उठीं और आगे बढ़ीं। शटर पर हाथ पहुंचने से पहले ददा फिर बोल उठे‌। ‘अरे महरानी केतने कष्टे से तऽ टीबी क जुगाड़ होइ पाए बाऽ, सब भगवान के किरपा से संभव भवा बाऽ त कम से कम ओन्हइ सुमिर त लेतूऽ रचिके।’ ‘अरे हां बुढ़ऊ हम तऽ भुलाइन गइ रहेऽ।’ दादी झट से घर में चली गई। गांव भर के गदेले, बूढ़-पुरनिया सब खड़े टीबी के खुलने का इंतजार कर रहे थे और इंतजार था कि धीरे-धीरे और ही लंबा होता जा रहा था। ‘कहो सटरिया के पिछवां कुलि मिला बइठा होइहंइ काऽ?’ सिर खुजलाते लपेटू, जो आज तक टीबी देखे ही नहीं थे, रमई से पूछ बैठे। रमई बड़ी जोर से हंस पड़े। सभी रमई को ही देखने लगे। बेचारे शरम के मारे बुत्त, एक चुप्प हजार चुप्प जैसे कुछ जानते ही न हों। लपेटू गमछा में मुंह दबाए सोचते ही रहे कि ‘रमइया काहें हंसा है।’ हवा मनभावन सी सभी को लुभा रही थी, बहुत तेज भी नहीं थी तो बिल्कुल कम भी नहीं। अइया टाठी में सेनुर, अगरबत्ती, माचिस, फूल और अक्षत लिए आ गईं। सभी के चेहरे खिल उठे। वैâलाश के आंखों में ईश्वर ददा का डांटना नाच उठा और वो रुआंसा सा मुंह लिए ददा से लिपट गया।
क्रमश:
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

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