लिखने वाले बढ़ गए, घटते गए विचार,
बिन पढ़े ही बन रहे, मंचों के सरदार।
दो पंक्ति फेसबुक लिखी, बन बैठे विद्वान,
पुस्तक खोले बिन यहाँ, देते ज्ञान महान।
लाइक-शेयर की भीड़ में, बिकता सब बेकार—
बिन पढ़े ही बन रहे, मंचों के सरदार।
शब्दों में गहराइयाँ, अब लगती बेकार,
झूठी वाह-वाह लिए, घूम रहे बाज़ार।
सस्ता-सा साहित्य अब, पहने झूठा हार—
बिन पढ़े ही बन रहे, मंचों के सरदार।
अक्षर-अक्षर रो रहा, सूख गया संस्कार,
पढ़ने का धैर्य गया, लिखना हुआ खुमार।
कॉपी-पेस्ट के दौर में, मरता मौलिक सार—
बिन पढ़े ही बन रहे, मंचों के सरदार।
रचना कम, प्रचार अधिक— यही नया अभियान,
भीतर खोखलापन मगर, ऊपर लंबी तान।
तालियों के लोभ में, बिकता स्वाभिमान—
बिन पढ़े ही बन रहे, मंचों के सरदार।
सौरभ कहे, किताब से जिसने तोड़ा नात,
उसके शब्दों में कहाँ बच पाती औकात।
पाठक बिन साहित्य का, सूना हर दरबार—
बिन पढ़े ही बन रहे, मंचों के सरदार।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
