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डॉक्टर बनकर देह का

डॉक्टर बनकर देह का, करते रोग निदान,
इंजीनियर रचते सदा, प्रगति भरा विधान।

कवि बनकर जो बाँटता, शब्दों का सम्मान,
सूखे मन के खेत में, भर देता अवधान।
धरती से आकाश तक, गूँजे उसका गान—
कविता केवल शब्द नहीं, मानव की पहचान।

डॉक्टर देता ज़िंदगी, पीड़ित को नव-जान,
इंजीनियर आसान करे, पथ, घर और मकान।
लेकिन कवि के शब्द में, छिपा हुआ वरदान—
पत्थर जैसे मन में जगा देता है नव-ध्यान।

गीतों से उपवन हँसे, झूमे सकल जहान,
धरती गाए प्रेम का, मधुर-मधुर अभिदान।
क्रोध पिघलकर नेह बने, मिट जाए शैतान—
कवि की वाणी कर सके, मानव का कल्याण।

शब्दों का प्रतिदान दे, कविता की पहचान,
सूने मन के गाँव में, भर दे नई उड़ान।
सौरभ कहे, कवि ही रखे मानवता की जान—
वरना पत्थर हो जाएगा, सारा हिन्दुस्तान।

—डॉ. सत्यवान सौरभ

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