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फ्रेजाइल फाइव से व्हल्नरेबल वन तक!..अर्थव्यवस्था पर पूर्व वित्त सचिव की गंभीर चेतावनी

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

पूर्व वित्त और आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत ‘फ्रेजाइल फाइव’ की छवि से बाहर निकलने के बजाय अब ‘व्हल्नरेबल वन’ यानी सबसे अधिक नाजुक अर्थव्यवस्था की स्थिति में पहुंच गया है। गर्ग का आरोप है कि सरकार की आर्थिक नीतियां दीर्घकालिक मजबूती देने में विफल रही हैं और अब वृद्धि दर, महंगाई, रुपया तथा विदेशी पूंजी प्रवाह जैसे प्रमुख संकेतक एक साथ दबाव में दिखाई दे रहे हैं। गर्ग ने हाल ही में कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था ‘फ्रेजाइल फाइव’ से ‘व्हल्नरेबल वन’ बन गई है और कोई भी बड़ी अर्थव्यवस्था आज वृद्धि, महंगाई और बाहरी झटकों के लिहाज से भारत जितनी असुरक्षित नहीं दिखती।
गर्ग का यह बयान ऐसे समय आया है जब रुपए पर लगातार दबाव बना हुआ है। २० मई २०२६ को रुपया डॉलर के मुकाबले ९६.९६ के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया था और ९ जून २०२६ को यह ९५.६३ प्रति डॉलर के आसपास कारोबार कर रहा था। रॉयटर्स के अनुसार, रुपया इस वर्ष अब तक करीब ८ प्रतिशत गिर चुका था, जिसके बाद आरबीआई और सरकार ने डॉलर प्रवाह बढ़ाने के लिए कुछ कदम उठाए।

रुपया, रोजगार और जीडीपी खतरे में… नाजुक मोड़ पर भारतीय अर्थव्यवस्था!

भारतीय मुद्रा की कमजोरी का असर केवल विनिमय दर तक सीमित नहीं है। कच्चे तेल, गैस, उर्वरक और आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ने से महंगाई तथा राजकोषीय दबाव बढ़ने की आशंका है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए पश्चिम एशिया में ऊर्जा संकट या आपूर्ति बाधा सीधे आयात बिल, महंगाई और चालू खाते पर असर डालती है। हालिया आकलनों में भारत की वृद्धि दर २०२६-२७ में ६.६ प्रतिशत तक धीमी पड़ने और महंगाई औसतन ५.१ प्रतिशत तक पहुंचने की आशंका जताई गई है। हालांकि, सरकारी आंकड़ों में अप्रैल २०२६ की खुदरा महंगाई ३.४८ प्रतिशत दर्ज की गई थी और खाद्य महंगाई ४.२० प्रतिशत रही, लेकिन मई में खाद्य और र्इंधन की कीमतों के कारण महंगाई ४ प्रतिशत के आसपास पहुंचने का अनुमान जताया गया। थोक महंगाई में भी तेज उछाल की आशंका ने आम उपभोक्ता और उद्योग दोनों के लिए चिंता बढ़ाई है।
विकास दर के मोर्चे पर सरकार यह दावा करती रही है कि भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में है। आर्थिक सर्वेक्षण २०२५-२६ में वित्त वर्ष २०२५-२६ के लिए जीडीपी वृद्धि ७.४ प्रतिशत रहने का अनुमान रखा गया था। बाद में नई जीडीपी शृंखला में २०२५-२६ के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि ७.६ प्रतिशत अनुमानित की गई। लेकिन आलोचकों का कहना है कि हैडलाइन ग्रोथ के बावजूद रोजगार, निजी निवेश, निर्यात, घरेलू खपत और रुपए की स्थिरता जैसे क्षेत्रों में कमजोरी छिपी नहीं रह सकती। बाहरी खाते में भी तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है। जनवरी-मार्च २०२६ तिमाही में भारत ने ७.१ अरब डॉलर का चालू खाते का अधिशेष दर्ज किया, लेकिन पूरे वित्त वर्ष २०२५-२६ में चालू खाते का घाटा २५.२ अरब डॉलर और भुगतान संतुलन घाटा २३.६ अरब डॉलर रहा। सेवाओं और प्रवासी भारतीयों की रेमिटेंस ने राहत दी, पर माल व्यापार घाटा और विदेशी निवेश निकासी अब भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
पूर्व वित्त सचिव गर्ग की टिप्पणी का मूल संदेश यही है कि अर्थव्यवस्था की मजबूती केवल जीडीपी वृद्धि दर से नहीं आंकी जा सकती। यदि रुपया लगातार कमजोर हो, विदेशी निवेशक बाजार से पैसा निकाल रहे हों, आयात बिल बढ़ रहा हो, महंगाई फिर सिर उठाने लगे और सरकार को अल्पकालिक उपायों से मुद्रा संभालनी पड़े, तो यह स्थिरता नहीं बल्कि असुरक्षा का संकेत है।
सरकार के समर्थक यह तर्क देते हैं कि वैश्विक युद्ध, तेल की कीमतों का झटका, डॉलर की मजबूती और अंतर्राष्ट्रीय पूंजी प्रवाह में बदलाव जैसी परिस्थितियां भारत ही नहीं, कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर असर डाल रही हैं। लेकिन गर्ग जैसे पूर्व शीर्ष आर्थिक अधिकारी का कहना है कि मजबूत नीति-ढांचा ऐसी बाहरी चुनौतियों के सामने ढाल का काम करता है, जबकि भारत में नीति-निर्णय अधिकतर अल्पकालिक राहत और राजनीतिक प्रबंधन तक सीमित दिखाई देते हैं। इसलिए अर्थव्यवस्था पर बहस अब केवल ‘भारत तेज बढ़ रहा है’ बनाम ‘भारत संकट में है’ जैसी सरल रेखा में नहीं समेटी जा सकती। असली सवाल यह है कि क्या भारत की वृद्धि टिकाऊ, रोजगार-सृजनकारी और बाहरी झटकों को झेलने योग्य है? गर्ग की चेतावनी इसी प्रश्न को केंद्र में लाती है। उनका आरोप है कि मोदी सरकार के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था ने संभावनाओं के बावजूद वह संस्थागत मजबूती हासिल नहीं की, जिसकी जरूरत एक बड़े, आयात-निर्भर और वैश्विक पूंजी पर निर्भर देश को होती है। आज रुपए की कमजोरी, महंगाई की वापसी, विदेशी निवेश की अनिश्चितता और ऊर्जा आयात पर निर्भरता मिलकर यह संकेत दे रहे हैं कि भारत को केवल विकास दर के आंकड़ों से संतोष करने के बजाय आर्थिक सुरक्षा, नीति-विश्वसनीयता और दीर्घकालिक स्थिरता पर नए सिरे से विचार करना होगा। गर्ग की टिप्पणी इसी बड़े आर्थिक विमर्श की तीखी शुरुआत मानी जा सकती है।

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