मुख्यपृष्ठस्तंभसिर्फ आंकड़ों के लिए व्यापारियों का सर्वे या राजस्व जुटाने की तैयारी?

सिर्फ आंकड़ों के लिए व्यापारियों का सर्वे या राजस्व जुटाने की तैयारी?

अनिल तिवारी

-कानून में व्यक्तिगत विवरणों और सूचना प्रपत्रों के खुलासे पर प्रतिबंध तथा केवल कुछ निश्चित परिस्थितियों में उनके उपयोग की व्यवस्था की गई है। वास्तविक शोध या सांख्यिकीय उद्देश्यों के लिए भी विशेष शर्तों के तहत जानकारी उपलब्ध कराई जा सकती है।

मुंबई। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी एनएसओ के तहत होनेवाला एएसयूएसई देश के विनिर्माण, व्यापार और अन्य सेवा क्षेत्रों से जुड़े गैर-निगमित प्रतिष्ठानों का सर्वे करता है। निर्माण क्षेत्र को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य इन प्रतिष्ठानों की आर्थिक और परिचालन विशेषताओं का आकलन करना है। बड़ा सवाल यह है कि केंद्र सरकार एएसयूएसई सर्वे से क्या केवल देश की अर्थव्यवस्था का सही आकार जानना चाहती है या इसी डेटा के सहारे भविष्य में छोटे कारोबारों को औपचारिक आर्थिक और राजस्व व्यवस्था के दायरे में लाने के रास्ते भी तलाशे जा सकते हैं?
सरकार के अपने आंकड़े इस क्षेत्र की विशालता बताते हैं। एएसयूएसई २०२५ के परिणामों के मुताबिक, देश में करीब ७.९२ करोड़ गैर-निगमित गैर-कृषि प्रतिष्ठान होने का अनुमान लगाया गया था। ये करोड़ों लोगों को रोजगार और आजीविका देते हैं और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं। ऐसे में इस पूरे क्षेत्र का आर्थिक नक्शा सरकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
कमाई से खर्च तक,
सरकार जानना क्या चाहती है?
यह सर्वे केवल इतना पूछने तक सीमित नहीं है कि कोई व्यक्ति कौन-सा व्यवसाय करता है। एनएसओ की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, सर्वे में प्रतिष्ठान की स्थायी परिसंपत्तियों, कार्यशील पूंजी, प्राप्तियों और खर्च जैसी जानकारियों के लिए लाभ-हानि खाता, बही-खाता और कर रजिस्टर जैसे रिकॉर्ड भी उपयोगी हो सकते हैं। यानी सरकार को यह अनुमान लगाने का आधार मिलता है कि किसी श्रेणी के कारोबार में पैसा कितना आ रहा है, खर्च कितना हो रहा है और वास्तविक आर्थिक गतिविधि कितनी है।
पुराने राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के उद्यम सर्वेक्षण प्रपत्रों से भी स्पष्ट होता है कि ऐसे सर्वे में परिचालन खर्च, प्रमुख प्राप्तियां, अन्य प्राप्तियां, भंडार और कारोबार से जुड़ी दूसरी आर्थिक जानकारियों का विस्तृत संकलन किया जाता रहा है। यहीं से यह सवाल पैदा होता है कि इतनी बारीक आर्थिक जानकारी का भविष्य में इस्तेमाल केवल जीडीपी की गणना तक सीमित रहेगा या इससे सरकार को यह समझने में भी मदद मिलेगी कि अर्थव्यवस्था का कितना बड़ा हिस्सा अभी औपचारिक कर और नियामक ढांचे से बाहर है।
आज सर्वे, कल ‘औपचारिकीकरण’?
एएसयूएसई से एकत्र किए गए आंकड़े सरकार को यह बता सकते हैं कि किस क्षेत्र में कितने प्रतिष्ठान हैं, कितने लोगों को रोजगार मिलता है, कितनी आर्थिक गतिविधि पैदा होती है और व्यवसायों की औसत आय-व्यय संरचना वैâसी है। सरकार इसी आधार पर योजनाएं, ऋण नीतियां, रोजगार कार्यक्रम और आर्थिक नीतियां बना सकती है। एनएसओ स्वयं कहता है कि एएसयूएसई का उद्देश्य गैर-निगमित क्षेत्र की आर्थिक और परिचालन विशेषताओं तथा अर्थव्यवस्था में उसके योगदान का आकलन करना है। लेकिन नीति-निर्माण का दूसरा पहलू भी है। यदि सरकार को किसी क्षेत्र की वास्तविक आर्थिक क्षमता का अधिक सटीक अनुमान मिल जाता है तो वह भविष्य में औपचारिकीकरण, पंजीकरण और अनुपालन से संबंधित नीतियों को भी बेहतर ढंग से तैयार कर सकती है।
मसलन, सरकार यह जान सकती है कि किन प्रकार के छोटे कारोबारों की संख्या बहुत अधिक है, किस क्षेत्र में कारोबार का आकार तेजी से बढ़ रहा है और कहां बड़ी आर्थिक गतिविधि अभी असंगठित रूप में चल रही है। ऐसे आंकड़े भविष्य में कर-आधार या औपचारिक अर्थव्यवस्था बढ़ाने की रणनीति बनाने में अप्रत्यक्ष रूप से उपयोगी हो सकते हैं। हालांकि, अभी ऐसा कोई आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं है कि एएसयूएसई २०२६ को सीधे नए कर लगाने या व्यक्तिगत कारोबारियों को कर-जाल में लाने के लिए संचालित किया जा रहा है।
व्यक्तिगत डेटा से सीधे कर कार्रवाई? कानून यहां लगाता है ब्रेक
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू भी है। सांख्यिकी संग्रह अधिनियम, २००८ के तहत सांख्यिकीय उद्देश्यों के लिए एकत्र व्यक्तिगत सूचना की गोपनीयता के प्रावधान हैं। कानून में व्यक्तिगत विवरणों और सूचना प्रपत्रों के खुलासे पर प्रतिबंध तथा केवल कुछ निश्चित परिस्थितियों में उनके उपयोग की व्यवस्था की गई है। वास्तविक शोध या सांख्यिकीय उद्देश्यों के लिए भी विशेष शर्तों के तहत जानकारी उपलब्ध कराई जा सकती है।
सांख्यिकी संग्रह नियमों में सर्वे से जुड़े कर्मचारियों के लिए भी व्यक्तिगत जानकारी को अपने आधिकारिक कार्य के अलावा इस्तेमाल या उजागर न करने की जिम्मेदारी तय की गई है। इसलिए यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि ‘एएसयूएसई में जानकारी देने के बाद उसी आधार पर आयकर या जीएसटी विभाग दुकानदार के दरवाजे पर पहुंच जाएगा।’ इसके समर्थन में फिलहाल कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं है। लेकिन इससे बड़ा नीतिगत सवाल खत्म नहीं होता।
व्यक्ति नहीं, पूरी बिरादरी का
आर्थिक नक्शा
सरकार के लिए जरूरी नहीं कि किसी एक दुकानदार का नाम आयकर विभाग तक पहुंचाया जाए। यदि सर्वे के समग्र आंकड़े बता देते हैं कि किसी खास व्यापार में देशभर में कितने प्रतिष्ठान हैं, उनका औसत कारोबार कितना है, रोजगार कितना है और खर्च तथा आय का अनुपात क्या है, तो सरकार को उस पूरे क्षेत्र की आर्थिक क्षमता समझ में आ जाती है।
यही डेटा भविष्य में यह तय करने में सहायक हो सकता है कि कौन-से व्यवसाय सरकारी योजनाओं के दायरे में आएं, कहां पंजीकरण बढ़ाने की जरूरत है, किस क्षेत्र में ऋण उपलब्ध कराया जाए और किन क्षेत्रों में औपचारिक अर्थव्यवस्था का विस्तार किया जा सकता है। यानी सवाल किसी एक व्यक्ति पर कर लगाने का नहीं, बल्कि पूरे असंगठित कारोबार की आर्थिक तस्वीर सरकार के सामने खुलने का है।
क्यों चाहिए असंगठित अर्थव्यवस्था का इतना बारीक हिसाब?
भारत की अर्थव्यवस्था का एक विशाल हिस्सा आज भी छोटे दुकानदारों, कारीगरों, घरेलू उद्योगों, छोटे सेवा प्रदाताओं और स्वरोजगार करने वाले लोगों के जरिए चलता है। इनमें से बड़ी संख्या कॉरपोरेट बैलेंस शीट या बड़े संगठित आंकड़ा-भंडार में दिखाई नहीं देती। इसी कारण इस क्षेत्र के वास्तविक उत्पादन और रोजगार का अनुमान लगाना कठिन होता है।
एएसयूएसई इसी कमी को पूरा करता है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अनुसार, यह सर्वे राष्ट्रीय खातों और नीति-निर्माण के लिए महत्वपूर्ण आंकड़े उपलब्ध कराता है। लेकिन जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था डिजिटल और औपचारिक होती जा रही है, ऐसे डेटा का महत्व और बढ़ जाता है। सरकार के पास जितनी विस्तृत आर्थिक तस्वीर होगी, उतनी ही सटीक नीति वह बना सकेगी, चाहे वह सब्सिडी हो, ऋण हो, सामाजिक सुरक्षा हो या राजस्व नीति। एएसयूएसई को न तो सीधे ‘कर सर्वे’ कहना सही होगा और न ही यह मान लेना उचित होगा कि इसका आर्थिक नीति या भविष्य के सरकारी राजस्व से कोई संबंध ही नहीं हो सकता। सच्चाई इन दोनों के बीच है। आज सरकार आंकड़े इकट्ठे कर रही है। इन आंकड़ों का घोषित उद्देश्य जीडीपी, रोजगार और नीति-निर्माण है। लेकिन यही आंकड़े कल सरकार को यह समझने में भी मदद कर सकते हैं कि देश की असंगठित अर्थव्यवस्था में पैसा कहां और कितना घूम रहा है तथा उस विशाल आर्थिक गतिविधि को औपचारिक व्यवस्था में किस तरह लाया जा सकता है। और शायद इसीलिए छोटे कारोबारी के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि ‘सरकार मेरे बारे में क्या जानना चाहती है?’ असली सवाल है, ‘सरकार इन आंकड़ों को जानकर भविष्य में क्या करना चाहती है?’

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