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संपादकीय: ममता बनर्जी पर हमला पश्चिम बंगाल में आग से खेल

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी पर बर्बर और कायरतापूर्ण हमला हुआ है। दंगाइयों ने ममता की गाड़ी रोककर उन पर पत्थर, लाठी और लोहे की छड़ों से हमला किया। वे शायद ममता बनर्जी को हमेशा के लिए खत्म करना चाहते थे, लेकिन मां काली की कृपा से ममता दीदी बच गईं। पश्चिम बंगाल में सत्ता खोने के बाद से तृणमूल कांग्रेस के नेताओं, विधायकों और सांसदों पर ऐसे हमले शुरू हो गए हैं। अभिषेक बनर्जी पर भी हमला हुआ। सांसद कल्याण बनर्जी पर हमला हुआ। एक तरफ तृणमूल कांग्रेस से बेईमानी करनेवाले २२ सांसदों को प्रधानमंत्री मोदी अपने आवास पर ‘दावत’ देने के लिए बुला रहे हैं और उनके साथ हंसते-मुस्कुराते तस्वीरों में दिखाई दे रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ जिस महिला ने इन सभी को सांसद बनाया, उसी महिला पर मोदी सरकार के गुंडे जानलेवा हमला कर रहे हैं। मोदी और शाह प. बंगाल में आकर कहते थे कि ममता का राज कानून का राज नहीं है तो अब जो राज प. बंगाल पर थोपा गया है, क्या उसे कानून का राज कहा जा सकता है? प. बंगाल में आजादी से पहले भी हिंसा और दंगे ही हुए थे और आज भी वही मंजर है। ममता बनर्जी पर हुआ यह बर्बर हमला मोदी-शाह और प. बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की ही मेहरबानी का नतीजा है। विधानसभा चुनाव के दौरान ‘ममता बनर्जी के लोग हिंसा करेंगे, लोगों को वोट नहीं डालने देंगे’, इस बहाने केंद्र सरकार ने प. बंगाल में साढ़े तीन लाख अर्धसैनिक बल उतार दिए थे तो अब जो हिंसा भड़की हुई है, उसे रोकने के लिए मोदी-शाह को कम से कम लाख भर अर्धसैनिक बल तो भेजने ही चाहिए। प. बंगाल में पूर्व मुख्यमंत्री, सांसदों और विधायकों पर हमले होना किसी बेहतर हुकूमत या अच्छी शासन व्यवस्था की निशानी नहीं है। ऊपर से भाजपा के वहां के प्रदेश अध्यक्ष कहते हैं, ‘इस हिंसा और ममता पर हुए हमले से भाजपा का
दूर-दूर तक कोई ताल्लुक
नहीं है। यह तृणमूल और जनता की लड़ाई है। तृणमूल ने जो बोया था, वही अब उसके सामने आ रहा है।’ भाजपा प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य का यह बयान बेहद चौंकानेवाला और बदले की नीयत से भरा है। अगर उनके मुताबिक, ममता पर हमला जनता और तृणमूल के बीच की जंग है तो सरकार होने के नाते इसे रोकना क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं है? इसका साफ मतलब यही है कि हुकूमत भाड़े के गुंडों के गिरोह को बढ़ावा दे रही है। यह एक तरह की अराजकता का माहौल है। अगर समिक भट्टाचार्य की बात को लफ्ज-ब-लफ्ज मान लिया जाए तो फिर यही कहना पड़ेगा कि ‘जंतर-मंतर’ पर जारी जंग देश के युवाओं और प्रधानमंत्री मोदी के बीच की जंग है। मोदी के खिलाफ लोगों के दिलों में जबरदस्त ग़ुस्सा और आक्रोश है, जो जंतर-मंतर के आंदोलन में लावे की तरह उबलता नजर आया। लेकिन उन नौजवानों को भाजपा ने गुंडा और देशद्रोही करार दे दिया, जबकि प. बंगाल में ममता पर हमला करने वालों को भाजपा ‘भोली-भाली जनता’ बता रही है। मोदी-शाह ने प. बंगाल का विधानसभा चुनाव सीधे रास्ते से नहीं जीता, बल्कि यह चुनाव चुराया गया है। हार के बावजूद जब उन्होंने देखा कि ममता सड़कों पर उतरकर लड़ाई लड़ रही हैं और उन्हें अवाम की ताकत और समर्थन मिल रहा है, तो उन्हें खत्म करने की साजिश रची गई। एक तरफ मोदी सरकार बांग्लादेश की पदच्युत प्रधानमंत्री शेख हसीना को पनाह देती दिख रही है, तो दूसरी तरफ प. बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता पर खूनी हमले करवाए जा रहे हैं। विरोधियों को जान से मार देने की नीति किसी शैतानी हुकूमत में ही देखने को मिल सकती है और वही मंजर आज भारत में दिखाई दे रहा है। लोकतंत्र में हार-जीत तो चलती रहती है, लेकिन पूर्व हुक्मरानों पर इस तरह के हमले करवाना और फिर उन हमलों का पक्ष लेना पूरी तरह लोकतंत्र के खिलाफ है। दरअसल, मोदी-शाह ने भारतीय राजनीति में इस विकृति को ही संस्कृति का रूप देकर देश को तबाह कर दिया है। ‘जंतर-मंतर’ पर उनकी पुलिस ने छात्रों पर पैलेट गन चलाईं। झारखंड के छात्र आंदोलन में नेहा बोरा पर स्याही फेंककर हमला किया गया। अभिजीत दीपके को धमकियां दी जा रही हैं। यह सब अंग्रेजों और औरंगजेब के जुल्मी दौर को भी शर्मसार करने वाली करतूतें हैं। प. बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री पर हमले हो रहे हैं, लेकिन देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के मुंह से हमदर्दी का एक शब्द तक नहीं निकलता। प. बंगाल के मुख्यमंत्री ऐसी हिंसा की निंदा तक नहीं करते। ऐसी हुकूमत को क्या कहा जाए? ऐसा लगता है मानो लोकतंत्र का जनाजा निकल चुका है और मोदी-शाह उस पर बैठकर जलेबियां खा रहे हैं। लोकतंत्र में विपक्षी दल का वजूद बेहद अहम होता है, लेकिन यहां विरोधियों का नामो-निशान तक नहीं छोड़ने की नीति है। ‘फोड़ो, खरीदो या खत्म कर दो’, मोदी-शाह का यह राष्ट्रीय रुख एकदम साफ नजर आ रहा है। मोदी-शाह ने जगह-जगह, राज्य-राज्य में गुंडों के हाथों में सत्ता की बागडोर सौंप दी है और उन्हें मनमाना उपद्रव मचाने की छूट दे रखी है। हिंदुत्व और संस्कृति पर सिर्फ लच्छेदार प्रवचन छांटने हैं, लेकिन अमल के नाम पर सब ढाक के तीन पात। पंडित नेहरू से लेकर गांधी परिवार तक के तहजीब और शिष्टाचार का एक अंश भी आज के हुक्मरानों के पास नहीं है। सत्ता का नशा इस कदर सर चढ़कर बोल रहा है कि ये तमाम लोग बेकाबू और बेसुध हो चुके हैं, मानो सत्ता का अमरपट्टा ही अपने नाम लिखाकर पैदा हुए हों। प. बंगाल, महाराष्ट्र, असम और उत्तर प्रदेश में इस बेलगाम रवैये ने हदें पार कर दी हैं। उत्तर प्रदेश में गुंडा प्रवृत्ति के लोगों को बिना किसी जांच-पड़ताल के गोलियों से भून दिया जाता है तो प. बंगाल में सरकार ऐसे ही गुंडों को ‘गुस्सैल नागरिक’ बताकर उनकी पीठ ठोक रही है। मणिपुर की हिंसा रोकने की हिम्मत मोदी-शाह में बची नहीं है; वहां पिछले चार सालों से कानून की धज्जियां उड़ रही हैं। अब प. बंगाल में भी वही मंजर दोहराया जा रहा है। मोदी-शाह और कानून व्यवस्था का आपस में छत्तीस का आंकड़ा है। प. बंगाल में कानून की बागडोर भाड़े के गुंडों के हाथों में थमाकर सरकार सीधे आग से खेल रही है। और अगर इस आग ने भयानक दावानल का रूप ले लिया, तो मोदी-शाह का वजूद भी सलामत नहीं बचेगा!

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