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अंदर की बात: कुर्सी पर परेश की नजर, लोकल की पटरी, महायुति में खलबली!

राजन पारकर

मुंबई की राजनीति में इन दिनों तीन अलग-अलग दृश्य दिखाई दे रहे हैं, लेकिन तीनों के पीछे एक ही सवाल छिपा है- सिस्टम आखिर चलता किसके इशारे पर है? एक तरफ ईमानदारी और नियमों के नाम पर कार्रवाई करनेवाले अधिकारी तुकाराम मुंढे की कुर्सी को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है और अभिनेता परेश रावल ने सीधे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुंढे को हटने से बचाने की गुहार लगाई है। दूसरी तरफ मुंबई की लोकल ने सोमवार की सुबह नौकरीपेश लोगों को ‘तकनीकी खराबी’ के नाम पर सरकारी वक्त की कीमत समझा दी। और तीसरी तरफ महायुति के भीतर वनमंत्री गणेश नाईक के ‘तमाचे’ वाले बयान ने राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी को तेज कर दिया है। सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय में फाइलें चलने से ज्यादा इन दिनों कुर्सियों के भविष्य की चर्चा चल रही है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन नाराज है; असली सवाल यह है कि अगली चाल किसकी होगी?
मुंढे की कुर्सी पर ‘परेश’ नजर…
तुकाराम मुंढे का नाम महाराष्ट्र की प्रशासनिक व्यवस्था में किसी परिचय का मोहताज नहीं। जहां मुंढे पहुंचते हैं, वहां फाइलों की धूल झाड़ने से लेकर व्यवस्था की धुलाई तक शुरू हो जाती है और यही बात शायद कई लोगों को हजम नहीं होती!
इDA आयुक्त के रूप में उनकी कार्रवाई चर्चा में है। नियमों की किताब हाथ में लेकर चलनेवाले अधिकारी को देखकर जिन लोगों की दुकानें नियमों के बाहर चलती हैं, उनके माथे पर पसीना आना स्वाभाविक है।
लेकिन अब कहानी में बॉलीवुड का तड़का लग गया है। परेश रावल ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को टैग करते हुए आग्रह किया है कि मुंढे को उनके वर्तमान विभाग से हटाया या बाहर न किया जाए और उन्हें अपना काम जारी रखने दिया जाए।
अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जब किसी अधिकारी की कुर्सी बचाने के लिए अभिनेता को मुख्यमंत्री से सार्वजनिक अपील करनी पड़े तो मामला सिर्फ एक अधिकारी की बदली का नहीं रह जाता, बल्कि वह प्रशासन की कार्यशैली पर भी सवाल बन जाता है।
अंदर की बात यह है कि मुंढे जैसे अधिकारी की सबसे बड़ी ताकत उनकी कुर्सी नहीं, बल्कि कुर्सी पर बैठकर नियम लागू करने की उनकी आदत है। और यही आदत सत्ता के गलियारों में कभी प्रशंसा तो कभी परेशानी का कारण बनती है। कहते हैं, महाराष्ट्र में अधिकारी बदलना सरकार के हाथ में है; लेकिन जनता के मन में किसी अधिकारी की छवि बदलना इतना आसान नहीं। अब देखना यह है कि मुंढे की फाइल मंत्रालय में कितनी तेजी से चलती है और उनकी कुर्सी कितनी मजबूती से टिकती है!
मुंबई लोकल : रेल्वे उपवास!
मुंबई की लोकल को मुंबई की जीवनरेखा कहा जाता है। लेकिन सोमवार की सुबह इस जीवनरेखा ने ही लाखों मुंबईकरों की धड़कन बढ़ा दी।
पश्चिम रेलवे पर अलग-अलग स्थानों पर तकनीकी खराबी, पॉइंट में गड़बड़ी और उसके बाद लोकल ट्रेनों की लेटलतीफी। वसई रोड से लेकर दादर तक यात्रियों को
प्लेटफॉर्म पर इंतजार और ट्रेनों में ठसाठस भीड़ का सामना करना पड़ा।
मुंबईकरों के लिए यह कोई नई कहानी नहीं है।
ट्रेन लेट हो तो तकनीकी खराबी, सड़क पर ट्रैफिक हो तो बारिश, पुल पर जाम हो तो काम चल रहा है और प्रशासन से सवाल पूछो तो ‘स्थिति नियंत्रण में है’! मुंबई का नौकरीपेशा रोज समय पर ऑफिस पहुंचने के लिए घर से निकलता है। लेकिन रेलवे की घड़ी और मुंबईकर की घड़ी में शायद वर्षों से कोई समझौता नहीं हुआ है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मुंबई को ‘विश्वस्तरीय’ बनाने की घोषणाएं तो बहुत होती हैं, मगर रोजाना लोकल में पिसने वाले आम मुंबईकर की दुनिया अभी भी उसी पुराने सवाल में अटकी है।
साहब ट्रेन समय पर कब आएगी? अंदर की बात यह है कि मुंबई की लोकल को सिर्फ तकनीकी सुधार नहीं, जवाबदेही की भी जरूरत है। क्योंकि मुंबईकर के समय की कीमत किसी सरकारी फाइल से कम नहीं है।
गणेश नाईक का ‘तमाचा’… महायुति के चेहरे पर लाल निशान?
महायुति सरकार बाहर से जितनी मजबूत दिखाई देती है अंदर से उतनी ही शांत है, ऐसा मानने वालों को गणेश नाईक के बयान ने शायद चौंका दिया होगा!
वनमंत्री गणेश नाईक ने बिना नाम लिए उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि बिल्डरों के पीछे भागकर महाराष्ट्र को दस साल पीछे ले जाया गया। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि जनता को गृहीत मानकर कोई ‘नाटक’ करेगा तो उसका तमाशा जनता को दिखाया जाएगा और हमें बुद्धू समझकर ‘टपली’ मारनेवाले का हाथ पकड़कर उसकी ‘लायकी’ दिखाने की ताकत हमारे पास है। अब राजनीति में नाम लेना जरूरी नहीं होता। इशारा काफी होता है और जब इशारा इतना जोरदार हो कि पूरा राजनीतिक गलियारा समझ जाए कि तीर किस दिशा में छोड़ा गया है तो फिर सफाई देने वालों की लाइन लग जाती है।
राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि नई मुंबई की राजनीति में जमीन, विकास और बिल्डर लॉबी का सवाल केवल विकास का नहीं, बल्कि सत्ता के प्रभाव का भी सवाल है।
गणेश नाईक का राजनीतिक वजन किसी से छिपा नहीं है इसलिए उनका ‘टपली’ वाला बयान सिर्फ भाषण की गर्मी समझना राजनीतिक भूल होगी। अंदर की बात यह है कि महायुति में सीटें भले एक हों, लेकिन महत्वाकांक्षाएं अनेक हैं और जब महत्वाकांक्षाएं टकराती हैं, तब पहले बयान निकलते हैं, फिर इशारे होते हैं और आखिर में कुर्सियों का हिसाब शुरू होता है। अब सवाल यह है कि नाईक साहब का यह ‘तमाचा’ केवल भाषण तक सीमित रहेगा या नवी मुंबई की राजनीति में इसका अगला अध्याय भी लिखा जाएगा?
मुंढे की कुर्सी, मुंबई लोकल की लेटलतीफी और महायुति की अंदरूनी खींचतान, इन तीनों मामलों में आम आदमी एक ही चीज तलाश रहा है: जवाबदेही।
अधिकारी काम करे तो उसकी कुर्सी सुरक्षित रहेगी या नहीं? रेलवे गलती करे तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? और सत्ता में बैठे नेता आपस में भिड़ें तो उसका नुकसान आखिर किसका होगा?
सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय और राजनीतिक गलियारों में आनेवाले दिनों में कुछ और ‘कुर्सी-कहानियां’ सुनाई दे सकती हैं। किसकी कुर्सी हिलेगी, किसका पत्ता कटेगा और किसकी नाराजगी टिकट के गणित को बदल देगी, इसका जवाब आने वाला वक्त देगा। लेकिन अंदर की बात यही है कि राजनीति में तमाचा हमेशा हाथ से नहीं पड़ता। कभी-कभी एक बयान ही काफी होता है!

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