" /> जिसे मैं मना नहीं कर सकी! काजोल

जिसे मैं मना नहीं कर सकी! काजोल

बॉलीवुड में अपना मकाम बनाए रखने के लिए किसी भी अभिनेत्री में खूबसूरती और ग्लैमर के साथ-साथ टैलेंट का होना भी बेहद जरूरी है। फिल्मों में अपना एक अलग मुकाम बना चुकीं काजोल अपने टैलेंट के बलबूते पर आज भी शिखर पर हैं। काजोल और अजय देवगन की शादी को २० वर्ष हो चुके हैं और वे दो बच्चों की मां हैं। काजोल अभिनीत फिल्म ‘तान्हाजी- द अनसंग वॉरियर’ ने ३०० करोड़ का क्लब पार कर लिया है। ४५ वर्षीय काजोल आज भी ‘ए’ लिस्ट स्टार्स में अव्वल नंबर पर हैं। पेश है काजोल से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
शॉर्ट फिल्म ‘देवी’ करने की क्या वजह रही?
१७ साल की उम्र में मैंने अपनी पहली फिल्म ‘बेखुदी’ पूरी की और २५ वर्ष की होते-होते शादी भी कर ली। शादी से पहले मैंने बहुत सारी फिल्में नहीं की। फिल्मों के मामले में मैं बेहद सिलेक्टिव थी। शादी के बाद मैंने अपने काम से ब्रेक ले लिया। लेकिन जब भी कोई कहानी या किरदार मुझे अच्छा लगा, मैंने उसे किया। ‘देवी’ शॉर्ट फिल्म है या फीचर फिल्म इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। इस फिल्म के माध्यम से महिलाओं को सशक्त मैसेज दिया गया है। फिल्म ‘देवी’ में मैंने एक साधारण महिला की भूमिका निभाई है। महिलाओं को देवी का दर्जा तो दिया जाता है लेकिन रीयल लाइफ में उन्हें वो सम्मान नहीं मिलता जिसकी वे हकदार हैं। महिला दिवस पूरे संसार में मनाया जाता है लेकिन आज भी हमारे देश ही नहीं पाकिस्तान, ईरान, इराक, अफगानिस्तान जैसे कई देश हैं जहां महिलाओं को पढ़ाना-लिखाना जरूरी नहीं समझा जाता। जब मुझे ‘देवी’ का ऑफर मिला तो मैं मना नहीं कर पाई।
क्या इंडस्ट्री में आपके साथ कभी भेदभाव हुआ?
मैं पहली ऐसी एक्ट्रेस नहीं हूं जिसने फिल्मों में पुरुष कलाकार और स्त्री कलाकारों के दरमियान भेदभाव महसूस किया हो। विश्वभर में महिलाओं के साथ भेदभाव होता है, पर समय के साथ-साथ उन्हें सफलता भी मिली है। महिलाओं ने आगे बढ़कर अपने आपको सिद्ध किया है और उन्हें सम्मान भी मिला है और इसमें मलाला भी शामिल है। कई ऐसे भी परिवार हैं जिन्होंने अपने बेटों की सही परवरिश की है और वे अपनी मां, बहन और पत्नी को सम्मान देते हैं। हालांकि ये बदलाव धीरे-धीरे हो रहा है लेकिन मुझे उम्मीद है कि इसका प्रभाव अगले कुछ वर्षों में अवश्य देखने को मिलेगा। अगर एक मां बेटा और बेटी में फर्क नहीं करती उनकी परवरिश एक जैसा करती है तो इससे पूरे समाज को फायदा होगा।
अभिनेता और अभिनेत्रियों के मेहनताने में काफी फर्क है क्या इसमें कभी बदलाव आएगा?
यह कहना मेरे लिए मुश्किल है। मेरी नानी (शोभना समर्थ) जब फिल्मों एक्टिव थीं तब भी यही सिलसिला था। केवल फिल्म इंडस्ट्री ही नहीं, हर क्षेत्र में महिलाओं को पुरुषों से कम आंका जाता है क्योंकि ये समाज पुरुष प्रधान है। प्रैक्टिकल और सेंसिबल एप्रोच से ही इसे सुधारा जा सकता है। इसके अलावा हमारा समाज काफी हद तक जिम्मेदार है, जो महिला प्रधान फिल्मों को भी पुरुष प्रधान फिल्मों की तरह ही प्यार नहीं देता।
क्या आपके और अजय के वैवाहिक जीवन में कभी ‘ईगो’ आड़े नहीं आया?
टचवुड! हमारे बीच कोई समानता नहीं है। अजय बहुत कम बोलते हैं और मुझे बोलना पसंद है लेकिन वक्त के साथ अजय बातूनी होते गए और मैं कम बोलने लगी। हम दोनों के बीच ईगो कभी आड़े नहीं आया। शायद ये हम दोनों की सोहबत का प्रभाव है कि हम दोनों एक-दूसरे को इतना बेहतर समझते हैं कि हमारे बीच तू तू-मैं मैं नहीं होता। बच्चों के सामने हम एक-दूसरे से ऊंची आवाज में नहीं बोलते। हम एक-दूसरे के काम में बिल्कुल भी दखलअंदाजी नहीं करते।
‘तान्हाजी’ की सफलता का श्रेय आप किसे देंगी?
निर्देशक ओम राऊत और अजय को। ‘तान्हाजी’ की सफलता एक टीम वर्क है। इस फिल्म को सफलता मिलेगी इसका हमें विश्वास था और ये विश्वास बहुत जल्द रंग लाया। मुझे खुशी है कि सावित्रीबाई का किरदार आम दर्शकों को पसंद आया।
जन्मतिथि – ५ अगस्त, जन्मस्थान – मुंबई
कद – ५ फुट ६ इंच, वजन – ५४ किग्रा.
प्रिय रंग – रेड, मरुन
मनपसंद परिधान – इंडियन ड्रेस पसंद है
पसंदीदा फूड – मराठी और बांग्ला फूड पसंद है
प्रिय शॉपिंग डेस्टिनेशन – लंदन, न्यूयॉर्क
घरेलू नाम – वैâडस