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पारे ‘टिक्स’

सोलह दूनी आठ!
मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा को भाजपा की ग्वालियर रैली के मंच से किसने दूर करवा दिया, ये खबर सत्ता के गलियारों में खूब गर्म है। और तो और ग्वालियर में चल रहे सदस्यता अभियान से भी उन्हें दूर ही रखा गया। भाजपा के वरिष्ठ नेता अनूप मिश्रा का भी मंच पर न होना कई अटकलों को जन्म दे रहा है। ताज्जुब ये है कि ग्वालियर-चंबल के इस कद्दावर नेता और प्रदेश के गृहमंत्री की इस महत्वपूर्ण रैली में उपेक्षा, किस के कहने पर हुई? मामला गड़बड़ है क्योंकि जब ये रैली हो रही थी नरोत्तम मिश्रा ठीक इसके बाजू में अपने गृह क्षेत्र डबरा और दतिया में कार्यकर्ताओं की बैठकें ले रहे थे।
आडवाणी, जोशी के बाद अब ताई की बारी?
आयु सीमा की गाइड लाइन का असर दिखने लगा है। लगता है मार्गदर्शक मंडल में दिनोंदिन ज्यादा आयु के नेताओं की संख्या में इजाफा होने वाला है। इसकी शुरुआत इंदौर में देखने को मिली जब इंदौर में दो दिन पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की खास मौजूदगी में दस मंजिला हॉस्पिटल का उद्घाटन किया। समारोह में शिवराज मंत्रिमंडल के सदस्य, स्थानीय सांसद और भारतीय जनता पार्टी के कई नेता विशेष रूप से मौजूद थे। समारोह में पूर्व लोकसभा अध्यक्षा और इंदौर से चालीस साल से सांसद रही सुमित्रा महाजन को ही नहीं बुलाया गया। ताई की गैर मौजूदगी इंदौर के लोगों को अखर रही है। बताया जा रहा है कि इतनी वरिष्ठ नेता को इतने बड़े कार्यक्रम में न बुलाए जाने और उपेक्षा किए जाने की शिकायत प्रधानमंत्री से लेकर संगठन के बड़े नेताओं को की गई है। इस भारी भूल के पीछे स्थानीय सांसद को जिम्मेदार माना जा रहा है। हद ये थी कि इस कार्यक्रम में सुमित्रा महाजन का कहीं जिक्र भी नहीं किया गया।
टास्क, डेलिगेशन और रोल प्ले!
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को अपनी टीम बनाने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। हाल ही में विश्वस्त सूत्रों के अनुसार प्रदेश अध्यक्ष के बारे में बोला जा रहा है कि वो `अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ वाले माइंड सेट से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। दूसरे शब्दों में वो भाजपा को उसी ढंग से चलाना चाहते हैं, इसको लेकर बहुत कुछ छापा गया और ये भी बताया गया कि राष्ट्रीय स्तर के एक अधिकारी ने इस पर उनको समझाइश भी दी है। सवाल ये है कि क्या संघ के सभी अनुषांगिक संगठनों में दिए जाने वाले प्रशिक्षण और भाजपा की कार्यशैली में फर्क आ गया है, जो अब समन्वय में दिक्कतें आ रही हैं? क्या विचारधारा और क्रियान्वयन में बहुत बड़ा कोई गैप आ गया है? तब तो समस्या की शुरुआत हुई समझिए यदि हां तो अब भाजपा को आधुनिक मैनजमेंट गुरुओं की आवश्यकता पड़ेगी जो टास्क, डेलिगेशन और रोल प्ले की बारीकियां सिखाएंगे। वैसे बहुत पहले एक बहुत सम्मानीय केंद्रीय मंत्री को ये सिखाया गया था कि संघ के प्रचारक होने में और केंद्र सरकार में मंत्री होने में फर्क है। दरअसल एक बहुत बड़ी बहुराष्ट्रीय एग्रीकल्चर कंपनी के प्रस्ताव को मान लेने का जबरदस्त दबाव उन पर डाला जा रहा था, इसके बाद वो सज्जन काम ठीक से नहीं कर पाए और वो अब इस नश्वर दुनिया में नहीं हैं तो यह मानने का कोई कारण नहीं बचा कि `फर्क’ शब्द बहुत नीचे तक परिलक्षित होने लगा है बल्कि अच्छे से डाउनलोड भी हो गया है। नाम ना छापने की शर्त पर बताया गया कि अंतर सांगठनिक कार्यशैली के मतभेदों को जानबूझ कर उभारा जा रहा है। फिलहाल इस बारे में कोई कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। फिलहाल संगठन में विस्तार उपचुनावों तक टाल दिया गया है और ये भी खबर है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा में इस मामले में सहमति भी बन गई है।
सूबेदारी या दिल्ली दरबार?
घटना पुरानी है पर प्रासंगिक है। प्रसिद्ध मराठी साहित्यकार नागनाथ इनामदार का एक ऐतिहासिक उपन्यास है `प्रतिघात’। ये उपन्यास बताता है कि मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों की सूबेदारी को लेकर होलकर और सिंधिया घराने में लंबी जंग छिड़ गई थी। इंदौर के होलकरों को सिंधिया लोगों ने लड़ाई में बुरी तरह परास्त किया था। इस भीषण संघर्ष में यशवंत राव होलकर जैसे-तैसे बच निकले और उन्होंने फिर सिंधिया सरदारों को पूरे चंबल और मालवा से बुरी तरह खदेड़ दिया। यशवंत राव होलकर का यश आज भी चंबल और मालवा में गाया जाता है।  सिंधिया घराने की बात की जाए तो मध्यप्रदेश में सूबेदारी का दावा उनका बहुत पुराना है। तो सवाल बहुत बड़ा है कि क्या संघ ने सिंधिया को मध्यप्रदेश की सूबेदारी दे दी है?  सूबेदारी कभी थाली में सजाकर नहीं मिलती थी, इसके लिए युद्ध करो, जीतो और सूबेदारी ले लो, ऐसी व्यवस्था थी। खुसुर-फुसुर ये भी है कि केंद्र में भी सिंधिया को जगह दी जा सकती है। फिलहाल ये माना जा रहा है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी बहुत बड़ी जंग जीतने की जवाबदारी दी गई है। यदि सूबेदारी चाहिए तो श्रीमंत को उपचुनावों की जंग तो जीतनी पड़ेगी। फिर ज्योतिरादित्य संघ कार्यालय नागपुर में भी हो आए हैं लेकिन इधर बंगाल में खुद को `मल्हारराव’ साबित कर चुके वैâलाश विजयवर्गीय को क्या मिलेगा?  ये सवाल लाख टके का है। सोचनेवाली बात ये है कि क्या इंदौर और ग्वालियर आज इतिहास के उसी मोड़ पर तो नहीं खड़े हैं?