अजय भट्टाचार्य
संसद में ‘वंदे मातरम प्रोटेक्शन बिल’ पेश करने वाली है। इस प्रस्तावित बिल के अनुसार, राष्ट्रगान में खलल डालने वालों को ३ साल तक की जेल हो सकती है। देश के सामने इस समय मौजूद कई गंभीर समस्याओं में से, यह शायद सबसे अहम मुद्दा है जो गृह मंत्री अमित शाह को लगता है। देश के हित में किसी और मुद्दे को पहले हल नहीं किया जाना चाहिए। जो लोग खुद को ‘वंदे मातरम’ का रक्षक मानकर सड़कों पर उतरते हैं, वे इस गीत की चार लाइनें भी ठीक से नहीं गा सकते और इस समय इस गीत का विरोध या रुकावट कौन डाल रहा है और वे इस बिल को इतनी जल्दी क्यों ला रहे हैं? फर्जी राष्ट्रवाद का आजादी की लड़ाई में कोई योगदान न देने के बावजूद, ये लोग अब ‘वंदे मातरम’ को अपनी देशभक्ति की राजनीति में लपेटकर उस पर मालिकाना हक जताने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। मोटाभाई, अपनी खरीद-फरोख्त का धंधा जारी रखो और विरोधी पार्टियों के विधायक-सांसद और खरीदो; वंदे मातरम का इतना छोटा सा काम बीच में क्यों है? या एक समुदाय विशेष को इस नए बिल का हथियार बनाकर जेल में डालने की कोई नई पहल शुरू करना चाहते हो?
बांकीपुर की झांकी
बांकीपुर उपचुनाव से पहले भाजपा के अंदर की सियासत गरमा गई है। नितिन नवीन की समीक्षा बैठक में नाराजगी खुलकर सामने आने की चर्चा है। पता चला है की स्थानीय चेहरे इस बैठक से गायब थे। एक पुराने दिग्गज ने तो एलानिया किया है कि हम ३६ साल से पार्टी के लिए खटे हैं, हमारा कुछ हक है कि नहीं। इसी बीच सवाल उठ रहे हैं कि पार्टी के कई बड़े चेहरे प्रचार अभियान से आखिर दूर क्यों हैं? क्या यह सिर्फ रणनीति है या अंदरूनी असंतोष का संकेत?
व्हाट्सअपिये देशभक्त
किसान खालिस्तानी है, छात्र आतंकवादी हैं। सरकार के खिलाफ बोलने वाला हर नागरिक हिंदू विरोधी और देशद्रोही है। बस ये जो अधेड़ उमर के कांग्रेस के जमाने में पढ़े लिखे लोग हैं, जो व्हॉट्सऐप यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट होकर सोशल मीडिया पर बैठे हैं, ये सब देशभक्त और सनातन रक्षक हैं। जिस दिन अपना बच्चा निराशा में सड़क पर आएगा, जिस दिन कोई अपना सिस्टम की नाकामी से थक कर पंखे से उतारा जाएगा, उस दिन सबका नशा उतरेगा। लेकिन तब तक बहुत देर हो जाएगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)
