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15 अगस्त- तीज पर विशेष

महिलाओं का उत्सव है तीज

रमेश सर्राफ धमोरा

तीज का उत्सव श्रावण मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। यह महिलाओं का उत्सव है। सावन में जब संपूर्ण प्रकृति हरी ओढ़नी से आच्छादित होती है, उस अवसर पर महिलाओं के मन मयूर नृत्य करने लगते हैं। वृक्षों की शाखाओं में झूले पड़ जाते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे कजली तीज के रूप में मनाते हैं। सुहागन स्त्रियों के लिए यह व्रत बहुत महत्व रखता है। आस्था, उमंग, सौंदर्य और प्रेम का यह उत्सव शिव-पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। चारों ओर हरियाली होने के कारण इसे हरियाली तीज कहते हैं। इस अवसर पर महिलाएं झूला झूलती हैं, लोकगीत गाती हैं और आनंद मनाती हैं।
सौंदर्य, प्रेम और आस्था के इस उत्सव का महिलाओं के लिए बड़ा महत्व है, विशेष रूप से नवविवाहिताओं के लिए। यह त्योहार मुख्य रूप से उत्तर भारत के राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में धूमधाम से मनाया जाता है। परंपरा के अनुसार नवविवाहिताएं पहला व्रत मायके में रखती हैं और इसके लिए झूले सजाए जाते हैं तथा लोकगीत गाए जाते हैं। देश के कई हिस्सों में मेले लगते हैं और माता पार्वती की सवारी निकाली जाती है।
वर्षा ऋतु में श्रावण के महीने में हमारे देश में चारों तरफ पानी बरसता रहता है। इस दौरान चारों तरफ हरियाली ही हरियाली नजर आती है। हरियाली के आगोश में प्रकृति इस तरह झूम उठती है, मानो पृथ्वी अपनी हरी-भरी बाहें फैलाकर सबका अभिनंदन कर रही हो। श्रावण के महीने को हिंदू धर्मावलंबी भगवान शिव का महीना मानकर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। कांवड़िए देशभर में विभिन्न नदियों और तालाबों से जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। गणगौर के बाद त्योहारों का सिलसिला रुक जाता है और वह एक बार फिर श्रावण मास की तीज से प्रारंभ हो जाता है। श्रावण का महीना महिलाओं के लिए विशेष उल्लास का महीना होता है। इस महीने में आने वाले अधिकांश लोकपर्व महिलाओं द्वारा ही मनाए जाते हैं।
श्रावण मास का आगमन ही इस त्योहार के आने की आहट सुनाने लगता है। समस्त सृष्टि सावन के अद्भुत सौंदर्य में भीगी हुई सी नजर आती है। यह पर्व भारतीय जनमानस के अटूट विश्वास को और अधिक प्रगाढ़ता प्रदान करने वाला पर्व है। इस पर्व में हरियाली शब्द से ही साफ है कि इसका ताल्लुक पेड़-पौधों और पर्यावरण से है। यह त्योहार जीवन में जश्न का प्रतीक है और हरियाली तीज का पर्व प्रकृति का त्योहार है। इस मौके पर महिलाएं अच्छी फसल के लिए भी प्रार्थना करती हैं।
सावन के महीने में सिंजारा, तीज, नागपंचमी एवं सावन के सोमवार जैसे लोकपर्व उत्साहपूर्वक मनाए जाते हैं। श्रावण के महीने में मनाई जाने वाली हरियाली तीज आस्था, प्रेम, सौंदर्य व उमंग का त्योहार है। तीज को मुख्यतः महिलाओं का त्योहार माना जाता है। यह पर्व महिलाओं की सांस्कृतिक मान्यताओं का प्रतीक है। सावन माह में मनाया जाने वाला हरियाली पर्व दंपतियों के वैवाहिक जीवन में समृद्धि, खुशी और तरक्की का प्रतीक है। तीज का त्योहार भारत के कोने-कोने में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह त्योहार भारत के उत्तरी क्षेत्र में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
श्रावण में चारों ओर हरियाली की चादर सी बिखर जाती है, जिसे देखकर सबका मन झूम उठता है। सावन का महीना एक अलग ही मस्ती और उमंग लेकर आता है। श्रावण के सुहावने मौसम के मध्य में आता है तीज का त्योहार। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को श्रावणी तीज कहते हैं। उत्तर भारत में यह हरियाली तीज के नाम से भी जानी जाती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए इस व्रत का पालन किया था। परिणामस्वरूप भगवान शिव ने उनके तप से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया था। माना जाता है कि श्रावण शुक्ल तृतीया के दिन माता पार्वती ने सौ वर्षों के तप के उपरांत भगवान शिव को पति रूप में पाया था। इसी मान्यता के अनुसार स्त्रियां माता पार्वती का पूजन करती हैं। हाथों में रची मेहंदी की तरह ही प्रकृति पर भी हरियाली की चादर सी बिछ जाती है। इस नयनाभिराम सौंदर्य को देखकर मन में स्वतः ही मधुर झनकार सी बजने लगती है और हृदय पुलकित होकर नाच उठता है। इस समय वर्षा ऋतु की बौछारें प्रकृति को पूर्ण रूप से भिगो देती हैं। सावन की तीज में महिलाएं व्रत रखती हैं। इस व्रत को अविवाहित कन्याएं योग्य वर को पाने के लिए करती हैं तथा विवाहित महिलाएं अपने सुखी दांपत्य की कामना के लिए करती हैं।
तीज पर मेहंदी लगाने, चूड़ियां पहनने, झूला झूलने तथा लोकगीत गाने का विशेष महत्व है। तीज के त्योहार वाले दिन खुले स्थानों पर बड़े-बड़े वृक्षों की शाखाओं पर, घर की छत पर या बरामदे में झूले लगाए जाते हैं, जिन पर स्त्रियां झूला झूलती हैं। हरियाली तीज के दिन अनेक स्थानों पर मेलों का भी आयोजन होता है।
राजस्थान में जिन कन्याओं की सगाई हो गई होती है, उन्हें अपने होने वाले सास-ससुर से एक दिन पहले ही भेंट मिलती है। इस भेंट को स्थानीय भाषा में सिंझारा कहते हैं। सिंझारा में मेहंदी, लाख की चूड़ियां, लहरिया नामक विशेष वेश-भूषा, घेवर नामक मिठाई जैसी कई वस्तुएं होती हैं। पीहर पक्ष द्वारा अपनी विवाहित पुत्री को भी सिंजारा भेजा जाता है, जिसे पूजा के बाद सास को सुपुर्द कर दिया जाता है। राजस्थान में नवविवाहिता युवतियों को सावन में ससुराल से मायके बुलाने की भी परंपरा है।
तीज के अवसर पर नवयुवतियां हाथों में मेहंदी रचाते हुए गीत गाती हैं। समूचा वातावरण शृंगार से अभिभूत हो उठता है। इस त्योहार की सबसे बड़ी विशेषता है महिलाओं के हाथों पर विभिन्न प्रकार से बेल-बूटे बनाकर मेहंदी रचाना। राजस्थान में हाथों व पैरों में भी विवाहिताएं मेहंदी रचाती हैं, जिसे मेहंदी मांडना कहते हैं। इस दिन राजस्थानी बालाएं दूर देश गए अपने पति के तीज पर आने की कामना करती हैं, जो उनके लोकगीतों में भी मुखरित होती है।
राजस्थान के गांवों में पहले लड़कियां गुड्डे-गुड़िया का खेल खेलती थीं। तीज के दिन से गुड्डे-गुड़िया का खेल खेलना बंद कर देती थीं। इसलिए गांव की लड़कियां एक साथ एकत्रित होकर अपने पुराने गुड्डे-गुड़िया को गांव के पास की नदी, तालाब या जोहड़ में बहा देती थीं। इसे गुड्डी बहावना कहा जाता था।
अपने सुखी दांपत्य जीवन की कामना के लिए स्त्रियां यह व्रत किया करती हैं। इस दिन उपवास कर भगवान शंकर-पार्वती की बालू से मूर्ति बनाकर षोडशोपचार पूजन किया जाता है, जो रात्रि भर चलता है। स्त्रियों द्वारा सुंदर वस्त्र धारण किए जाते हैं तथा घर को सजाया जाता है। इसके बाद मंगल गीतों से रात्रि जागरण किया जाता है। इस व्रत को करने वाली स्त्रियों को पार्वती के समान सुख प्राप्त होता है। तीज का आगमन वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही आरंभ हो जाता है। आसमान काले मेघों से आच्छादित हो जाता है और वर्षा की फुहार पड़ते ही हर वस्तु नवरूप को प्राप्त करती है। ऐसे में भारतीय लोकजीवन में हरियाली तीज या कजली तीज महोत्सव का बहुत गहरा प्रभाव देखा जा सकता है।
आज के दौर में ये सब बीती बातें बनकर रह गई हैं। राजस्थान में मान्यता है कि गणगौर के साथ ही पर्व-त्योहार मनाना बंद हो जाते हैं। वे तीज के दिन से पुनः मनाए जाने लगते हैं। तीज से शुरू होने के बाद त्योहारों का सिलसिला गणगौर तक चलता है। इसीलिए राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है—‘तीज त्योहारा बावड़ी ले डूबी गणगौर।’
आलेख : रमेश सर्राफ धमोरा
(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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