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आतिशबाजी में उड़ा दिए २५ करोड़!.. ‘अमेरिका फर्स्ट’ या टैक्सपेयर्स के पैसे की बर्बादी?

मनमोहन सिंह

अमेरिका में ४ जुलाई स्वतंत्रता दिवस हमेशा से ऐतिहासिक रहा है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में ‘सैल्यूट टू अमेरिका’ के तहत इस उत्सव को जो नया रूप दिया गया, उसने देश में एक नई बहस को जन्म दे दिया। ट्रंप प्रशासन ने इसे ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति और राष्ट्रीय गौरव से जोड़कर पेश किया, जिसका उद्देश्य दुनिया को अमेरिका की निरंतर सैन्य और आर्थिक शक्ति का अहसास कराना था। इसके लिए पारंपरिक पैटर्न को बदलते हुए उत्सव में मिलिट्री टैंकों, लड़ाकू विमानों के फ्लाईपास्ट और गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज कराने की होड़ को शामिल किया गया।
जहां एक वर्ग इसे राष्ट्रवाद के लिए उचित मानता है, वहीं आलोचकों का एक बहुत बड़ा धड़ा है, जो इसे जनता की गाढ़ी कमाई यानी टैक्सपेयर्स के पैसे की खुली बर्बादी मानता है। आलोचकों के दृष्टिकोण से यह फिजूलखर्ची है।
प्रतीकात्मकता बनाम वास्तविक विकास आलोचकों का तर्क है कि आसमान में २५ करोड़ डॉलर (या इससे अधिक) की आतिशबाजी उड़ाकर या गिनीज रिकॉर्ड बुक में नाम दर्ज कराकर कोई देश महान नहीं बनता। देश की महानता उसके नागरिकों के जीवन स्तर, मजबूत बुनियादी ढांचे (सड़कें, पुल), बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाओं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से तय होती है, न कि आतिशबाजी के दिखावे से।
स्थानीय अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ
वॉशिंगटन डी.सी. जैसे शहरों के प्रशासन को इस भव्य आयोजन के कारण भारी सुरक्षा, यातायात प्रबंधन और आपातकालीन सेवाओं के लिए करोड़ों का अतिरिक्त कर्ज या बजट घाटा झेलना पड़ा, जिसका सीधा असर स्थानीय नागरिक सुविधाओं पर पड़ा। यह सच है कि अमेरिका जैसी महाशक्ति के लिए २५ करोड़ रुपए की राशि ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ जैसी है, लेकिन आलोचकों का विरोध राशि के आकार से ज्यादा प्रशासन की प्राथमिकताओं को लेकर था। उनका स्पष्ट मानना था कि ‘अमेरिका फर्स्ट’ का असली अर्थ अमेरिकी नागरिकों के अधिकारों और उनकी बुनियादी जरूरतों को प्राथमिकता देना होना चाहिए, न कि रिकॉर्ड बनाने की होड़ में जनता के पैसे को आतिशबाजी में उड़ाना।
बजट का राजनीतिकरण
बर्नार्ड सैंडर्स और कांग्रेस प्रतिनिधियों जैसे आलोचकों ने सवाल उठाया कि नेशनल पार्क सर्विस और स्थानीय सुरक्षा फंड का इस्तेमाल जनता की भलाई के बजाय एक व्यक्ति (राष्ट्रपति) के राजनीतिक प्रचार और आत्म-महिमामंडन के लिए किया गया। ४ जुलाई का जो उत्सव हमेशा से गैर-राजनीतिक और साझा राष्ट्रीय एकता का प्रतीक था, उसे ‘सैन्यवादी और पक्षपातपूर्ण तमाशा’ बना दिया गया।

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