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४३ हजार किमी सड़कें गड्ढों में, फिर भी पीडब्ल्यूडी की ‘अंदाजित’ रिपोर्ट!

-सचिव शरद राजभोज के आंकड़ों ने खोली विभाग की पोल
-अधिकारी-कर्मचारियों की पूरी फौज के बावजूद सड़कों की हालत बदहाल

सुनील ओसवाल / मुंबई

महाराष्ट्र में गड्ढों से भरी सड़कों पर वाहन चालक रोज जोखिम उठा रहे हैं। अब सार्वजनिक निर्माण विभाग के सचिव शरद राजभोज की ओर से पेश आंकड़ों ने विभाग की निगरानी व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में करीब ४३ हजार किलोमीटर सड़कें गड्ढों से प्रभावित हैं—लेकिन यह संख्या भी ‘अंदाजित’ बताई गई है।
विभाग के अधीन १,०५,५२७ किलोमीटर सड़कें हैं। इतनी बड़ी सड़क व्यवस्था की देखरेख के लिए मुख्य अभियंता से लेकर अधीक्षक और कार्यकारी अभियंता तक का तंत्र मौजूद है। फिर भी विभाग यह स्पष्ट नहीं बता पा रहा कि कितनी सड़कें वास्तव में खराब हैं, कहां गड्ढे हैं और उनकी गंभीरता क्या है। राज्य के पीडब्ल्यूडी के अनुसार, उसका सड़क नेटवर्क एक लाख पांच हजार किलोमीटर से अधिक है।
शिकायतें गिनने की व्यवस्था, सड़कों का पूरा हिसाब क्यों नहीं?
विभाग के मुताबिक, गड्ढों को लेकर १,२७७ शिकायतें मिलीं। इनमें १,२५७ पर कार्रवाई और २० लंबित हैं। शिकायत दर्ज करने के लिए पीडब्ल्यूडी का झ्ण्Rए ऐप भी है। लेकिन सवाल यह है कि शिकायत आने के बाद गड्ढा भरना ही सड़क प्रबंधन है? विभाग के पास शिकायतों की ऑनलाइन निगरानी की व्यवस्था है, फिर सड़कों की वास्तविक स्थिति का जिलावार और सड़कवार ब्योरा जनता के सामने क्यों नहीं?
अधिकारियों की फौज, जवाबदेही किसकी?
बारिश के दौरान चौबीसों घंटे अधिकारी उपलब्ध रखने, कंट्रोल रूम चलाने और रोजाना रिपोर्ट भेजने के दावे किए गए हैं। इसके बावजूद ४३ हजार किलोमीटर सड़कें गड्ढों से प्रभावित होने का ‘अंदाज’ सामने आना विभाग की निगरानी पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। आखिर किस अधिकारी की जिम्मेदारी थी कि सड़कें समय पर दुरुस्त रहें? हर मानसून के बाद मरम्मत की भागदौड़ क्यों शुरू होती है?
हर साल वही सड़कें क्यों टूटती हैं?
विभाग का कहना है कि अक्टूबर २०२६ तक सड़कों को गड्ढामुक्त रखने के निर्देश दिए गए हैं और मरम्मत निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। लेकिन हर बारिश में सड़कें फिर उखड़ती हैं और गड्ढे दोबारा बन जाते हैं। यदि निर्माण गुणवत्ता और रखरखाव ठीक है, तो यही सड़कें हर साल बदहाल क्यों होती हैं? दोष दायित्व अवधि में आने वाली सड़कों पर ठेकेदारों की जवाबदेही कितनी तय हुई?

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